फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Bhadohi News ›   जनता से दिल की दूरी कम नहीं कर सके मस्त

जनता से दिल की दूरी कम नहीं कर सके मस्त

Wed, 27 Mar 2019 12:40 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 27 Mar 2019 12:40 AM IST
विज्ञापन
जनता से दिल की दूरी कम नहीं कर सके मस्त
विज्ञापन

ज्ञानपुर। भदोही सांसद वीरेंद्र सिंह का टिकट बदले जाने के बाद जिले की सियासत में हलचल बढ़ गई है। भाजपा शीर्ष नेतृत्व के अपने सिटिंग एमपी पर दोबारा भरोसा न जताने को लेकर सियासी जगत में आकलन तेज हो गया है। पार्टी का यह फैसला अप्रत्याशित नहीं माना जा रहा है। जातिगत मतों के बिखराव को नियंत्रित करने की चुनौती ने भाजपा शीर्ष नेतृत्व को भदोही सीट पर प्रत्याशी चयन को लेकर संजीदगी से सोचने पर मजबूर कर दिया था।
भाजपा ने मंगलवार को लोकसभा उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की तो भदोही सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त का नाम बलिया सीट से लड़ने के लिए निर्धारित किया गया। इसके बाद यहां से चुनाव मैदान में आने वाले प्रत्याशी को लेकर चल रही कयासबाजियों का दौर चरम पर पहुंच गया। भाजपा ने मंगलवार को जो सूची जारी की, तो भदोही सीट पर किसी का नाम नहीं है। इससे अब नए प्रत्याशी को लेकर सस्पेंस बढ़ गया है।
विज्ञापन

मस्त का टिकट भदोही से बदलकर बलिया करने के फैसले के सियासी जगत में कई निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। सियासत के जानकारों से बातचीत में यह बात छनकर आई कि मस्त ने भले ही अपनी निधि दिल खोलकर खर्च की हो, लेकिन जनता के बीच वह स्थान बनाने में शायद कामयाब नहीं हो पाए, जो उन्हें इस बार भी जीत दिला सके। 1991, 98 में मिर्जापुर-भदोही और फिर 2014 में भदोही सीट से सांसद चुनकर तीन बार भदोही की जनता का संसद में प्रतिनिधित्व कर चुके मस्त पर भाजपा हाईकमान में सांसद रहते हुए भी भरोसा नहीं किया, इस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व जिला मीडिया प्रभारी राजीव गोयल कहते हैं कि अब तक के जिन चुनावों में मस्त को जीत मिली थी, उन पर नजर डालें तो पता चलता है कि वह किसी न किसी लहर में ही जीतते रहे हैं। 1991 में राम लहर, 98 में अटल बिहारी की छवि और 2014 में मोदी लहर में जीत कर संसद पहुंचे। 1989 और 96 के चुनाव में वह भदोही-मिर्जापुर सीट से चुनाव लड़कर हार भी चुके थे। राजनीतिक जानकार प्रभुनाथ शुक्ला कहते हैं कि सपा-बसपा गठबंधन के बाद भदोही सीट पर बने जातिगत समीकरण में मस्त पार्टी की नजर में फिट नहीं बैठ रहे थे। भाजपा शीर्ष नेतृत्व किसी भी कीमत पर प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र के आसपास की सीटों पर शिकस्त देखना नहीं चाहता। साथ ही पार्टी के अलग-अलग सर्वे में इनका पक्ष मजबूत नहीं हो पा रहा था।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed