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ट्यूबवेल के लिए खर्च 50 लाख पानी में
basti
Updated Wed, 02 May 2018 11:06 PM IST
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समस्याा
- फोटो : amar ujala
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शहर में पेयजल को व्यवस्थित करने की कवायद को एक के बाद एक झटका लगा है। जलकल के पंपों को चलाने के लिए यहां तकरीबन तीन वर्ष पूर्व ऑटोमेटिक सिस्टम से जोड़ा गया। इस पर करीब पचास लाख रुपये खर्च हुए, मगर यह धन पानी में चल गया। सिस्टम यूं तो पूरी तरह बंद है, मगर कागज में दो पंपों का संचालन आज भी इसी सिस्टम से किया जा रहा है। यह अलग बात है कि सब कुछ मैनुअल संचालित होता है।
शहर के छह वाटरहेड टैंकों को भरने के लिए तत्कालीन अधिकारियों ने अत्याधुनिक सुविधाओं के तहत पंपों को ऑटोमाइजेशन कराया। इसके तहत शास्त्री चौक, कटेश्वर पार्क के पीछे, मालवीय मार्ग नाला के निकट, स्टेडियम कालोनी, शहीद भगत सिंह पार्क और पुराना डाकखाना स्थित पंपों को मोबाइल सिस्टम से जोड़कर घर बैठे इसके संचालन की व्यवस्था बनाई गई। मोबाइल के माध्यम से इसे संचालित करने की जिम्मेदारी जलकल अभियंता को दी गई। कार्य पूरा हुआ तो इस पर करीब पचास लाख रुपये खर्च आया, जिसे नगर पालिका ने वहन किया और ऑटोमाइजेशन सिस्टम रन करने की कवायद शुरू हो गई। चंद रोज के बाद यह सिस्टम किन्हीं कारणों से तकनीकी दिक्कत में आ गया तो इसका संचालन मैनुअल होने लगा। धीरे-धीरे छहों स्थानों के पंप इस सिस्टम से कट गए और अत्याधुनिक व्यवस्था ध्वस्त हो गई। करीब तीन साल पहले शुरू और फिर कुछ ही दिनों में खराब यह सिस्टम आज तक नहीं चल सका है। ऐसे में सभी पंपों का संचालन मैनुअल कराया जा रहा है। सारी कवायद ध्वस्त हो गई और सिस्टम विकास के लिए खर्च किए गए रुपये पानी में डूब गए।
इस संबंध में अवर अभियंता योगेंद्र तिवारी कहते हैं कि शहर के दो पंप आज भी ऑटोमाइजेशन सिस्टम पर हैं, मगर अन्य चार में पुराना डाकखाना को रिबोर कराने के लिए प्रस्ताव किया गया है, जबकि अन्य संचालित हो रहे हैं, जिसे मैनुअल संचालित किया जा रहा है। इस संबंध में प्रभारी ईओ केके चौबे ने कहा कि ऑटोमाइजेशन का मामला संज्ञान में है। इसकी जांच कराई जाएगी। आखिर जब इतना धन खर्च हुआ तो क्यों सिस्टम फेल हो गया। इसमें किसकी जिम्मेदारी थी, यह भी देखा जाएगा।
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शहर में पेयजल को व्यवस्थित करने की कवायद को एक के बाद एक झटका लगा है। जलकल के पंपों को चलाने के लिए यहां तकरीबन तीन वर्ष पूर्व ऑटोमेटिक सिस्टम से जोड़ा गया। इस पर करीब पचास लाख रुपये खर्च हुए, मगर यह धन पानी में चल गया। सिस्टम यूं तो पूरी तरह बंद है, मगर कागज में दो पंपों का संचालन आज भी इसी सिस्टम से किया जा रहा है। यह अलग बात है कि सब कुछ मैनुअल संचालित होता है।
शहर के छह वाटरहेड टैंकों को भरने के लिए तत्कालीन अधिकारियों ने अत्याधुनिक सुविधाओं के तहत पंपों को ऑटोमाइजेशन कराया। इसके तहत शास्त्री चौक, कटेश्वर पार्क के पीछे, मालवीय मार्ग नाला के निकट, स्टेडियम कालोनी, शहीद भगत सिंह पार्क और पुराना डाकखाना स्थित पंपों को मोबाइल सिस्टम से जोड़कर घर बैठे इसके संचालन की व्यवस्था बनाई गई। मोबाइल के माध्यम से इसे संचालित करने की जिम्मेदारी जलकल अभियंता को दी गई। कार्य पूरा हुआ तो इस पर करीब पचास लाख रुपये खर्च आया, जिसे नगर पालिका ने वहन किया और ऑटोमाइजेशन सिस्टम रन करने की कवायद शुरू हो गई। चंद रोज के बाद यह सिस्टम किन्हीं कारणों से तकनीकी दिक्कत में आ गया तो इसका संचालन मैनुअल होने लगा। धीरे-धीरे छहों स्थानों के पंप इस सिस्टम से कट गए और अत्याधुनिक व्यवस्था ध्वस्त हो गई। करीब तीन साल पहले शुरू और फिर कुछ ही दिनों में खराब यह सिस्टम आज तक नहीं चल सका है। ऐसे में सभी पंपों का संचालन मैनुअल कराया जा रहा है। सारी कवायद ध्वस्त हो गई और सिस्टम विकास के लिए खर्च किए गए रुपये पानी में डूब गए।
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इस संबंध में अवर अभियंता योगेंद्र तिवारी कहते हैं कि शहर के दो पंप आज भी ऑटोमाइजेशन सिस्टम पर हैं, मगर अन्य चार में पुराना डाकखाना को रिबोर कराने के लिए प्रस्ताव किया गया है, जबकि अन्य संचालित हो रहे हैं, जिसे मैनुअल संचालित किया जा रहा है। इस संबंध में प्रभारी ईओ केके चौबे ने कहा कि ऑटोमाइजेशन का मामला संज्ञान में है। इसकी जांच कराई जाएगी। आखिर जब इतना धन खर्च हुआ तो क्यों सिस्टम फेल हो गया। इसमें किसकी जिम्मेदारी थी, यह भी देखा जाएगा।
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