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कब पूरा होगा ट्रॉमा सेंटर का सपना
basti
Updated Fri, 24 Nov 2017 11:16 PM IST
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स्वास्थ्य
- फोटो : amar ujala
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राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे पड़ने वाले जिलों में शासन ने एक दशक पूर्व ट्रॉमा सेंटर स्थापित कराने का निर्णय लिया था। निर्णय के क्रम में जिला मुख्यालय पर ट्रॉमा सेंटर के भवन के निर्माण पर 67 लाख रुपये खर्च कर दिया गया। भवन तैयार हो गया मगर जब लंबे समय तक ट्रॉमा सेंटर चलाने के लिए संसाधन नहीं पहुंचा तो बिल्डिंग रख-रखाव के अभाव में खराब होने लगी। इसे देखते हुए तत्कालीन एसआईसी ने पांच साल पहले भवन में आपातकालीन सेवा शुरू करा दी। तब से अब तक यह इमरजेंसी यहां चल रही है। शासन की मंशा और यहां के लोगों का ट्रॉमा सेंटर स्थापित होने का सपना अब तक पूरा नहीं हो सका है।
हाईवे पर दुर्घटनाओं का सिलसिला तमाम प्रयासों के बाद नहीं थम रहा है। दुर्घटनाओं में घायलों को तत्काल बेहतर इलाज मिल सके। इसी के चलते जिला मुख्यालय में भी ट्रॉमा सेंटर के निर्माण को शासन ने हरी झंडी दी थी। तय समय सीमा के मुताबिक भवन निर्माण पूरा हो गया मगर कुछ तकनीकी कमियों के कारण स्वास्थ्य महकमा से लेने को तैयार नहीं हो रहा था। पांच वर्ष पूर्व जब इस तकनीकी कमी को निर्माण एजेंसी ने दूर कर लिया तो भवन हस्तगत हो गया मगर संसाधनों का टोटा तब भी बना रहा। देख-रेख के अभाव में भवन खस्ताहाल न हो जाए इसी के तहत यहां जिला अस्पताल की इमरजेंसी शुरू कर दी गई मगर तब से लेकर अब तक यहां ट्रॉमा सेंटर की औपचारिकताएं पूरी नहीं हो पाईं। नतीजतन, यहां के लोगों के लिए ट्रॉमा सेंटर अब भी सपना ही है। गंभीर दुर्घटनाओं में मरीजों को तत्काल लखनऊ रेफर किया जाता है। जिम्मेदारों की मानें तो ट्रॉमा सेंटर के लिए संसाधनों के अलावा डॉक्टरों की एक पूरी टीम भी 24 घंटे यहां तैनात रहती है। इसके लिए पूरी व्यवस्था अलग रखे जाने का प्रस्ताव था, मगर न तो संसाधन उपलब्ध हो पाए और न ही डॉक्टर। ऐसे में भवन से कोई भी सेंटर नहीं चल सकता था। नतीजतन, अब यहां इमरजेंसी स्थानांतरित कर भवन को व्यवस्थित रखा जा रहा है। एसआईसी डॉ. एके श्रीवास्तव ने कहा कि ज्वाइन करने के बाद से कई पत्र शासन को भेजा जा चुका है मगर अभी संसाधन और डॉक्टर नहीं मिल सके हैं। ऐसे में भवन की सुरक्षा और सफाई आदि के लिए यहां अलग से स्टाफ रखने के बजाय इमरजेंसी सेवा दी जा रही है। ताकि अस्पताल के कर्मी यहां की सफाई आदि कर सकें। जैसे ही ट्रॉमा सेंटर की औपचारिकताएं पूरी होंगी उसे शुरू कर दिया जाएगा।
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राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे पड़ने वाले जिलों में शासन ने एक दशक पूर्व ट्रॉमा सेंटर स्थापित कराने का निर्णय लिया था। निर्णय के क्रम में जिला मुख्यालय पर ट्रॉमा सेंटर के भवन के निर्माण पर 67 लाख रुपये खर्च कर दिया गया। भवन तैयार हो गया मगर जब लंबे समय तक ट्रॉमा सेंटर चलाने के लिए संसाधन नहीं पहुंचा तो बिल्डिंग रख-रखाव के अभाव में खराब होने लगी। इसे देखते हुए तत्कालीन एसआईसी ने पांच साल पहले भवन में आपातकालीन सेवा शुरू करा दी। तब से अब तक यह इमरजेंसी यहां चल रही है। शासन की मंशा और यहां के लोगों का ट्रॉमा सेंटर स्थापित होने का सपना अब तक पूरा नहीं हो सका है।
हाईवे पर दुर्घटनाओं का सिलसिला तमाम प्रयासों के बाद नहीं थम रहा है। दुर्घटनाओं में घायलों को तत्काल बेहतर इलाज मिल सके। इसी के चलते जिला मुख्यालय में भी ट्रॉमा सेंटर के निर्माण को शासन ने हरी झंडी दी थी। तय समय सीमा के मुताबिक भवन निर्माण पूरा हो गया मगर कुछ तकनीकी कमियों के कारण स्वास्थ्य महकमा से लेने को तैयार नहीं हो रहा था। पांच वर्ष पूर्व जब इस तकनीकी कमी को निर्माण एजेंसी ने दूर कर लिया तो भवन हस्तगत हो गया मगर संसाधनों का टोटा तब भी बना रहा। देख-रेख के अभाव में भवन खस्ताहाल न हो जाए इसी के तहत यहां जिला अस्पताल की इमरजेंसी शुरू कर दी गई मगर तब से लेकर अब तक यहां ट्रॉमा सेंटर की औपचारिकताएं पूरी नहीं हो पाईं। नतीजतन, यहां के लोगों के लिए ट्रॉमा सेंटर अब भी सपना ही है। गंभीर दुर्घटनाओं में मरीजों को तत्काल लखनऊ रेफर किया जाता है। जिम्मेदारों की मानें तो ट्रॉमा सेंटर के लिए संसाधनों के अलावा डॉक्टरों की एक पूरी टीम भी 24 घंटे यहां तैनात रहती है। इसके लिए पूरी व्यवस्था अलग रखे जाने का प्रस्ताव था, मगर न तो संसाधन उपलब्ध हो पाए और न ही डॉक्टर। ऐसे में भवन से कोई भी सेंटर नहीं चल सकता था। नतीजतन, अब यहां इमरजेंसी स्थानांतरित कर भवन को व्यवस्थित रखा जा रहा है। एसआईसी डॉ. एके श्रीवास्तव ने कहा कि ज्वाइन करने के बाद से कई पत्र शासन को भेजा जा चुका है मगर अभी संसाधन और डॉक्टर नहीं मिल सके हैं। ऐसे में भवन की सुरक्षा और सफाई आदि के लिए यहां अलग से स्टाफ रखने के बजाय इमरजेंसी सेवा दी जा रही है। ताकि अस्पताल के कर्मी यहां की सफाई आदि कर सकें। जैसे ही ट्रॉमा सेंटर की औपचारिकताएं पूरी होंगी उसे शुरू कर दिया जाएगा।
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