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Basti News: स्लीपर कोच बन गए जनरल... सीट के भी लाले

Fri, 20 Dec 2024 12:21 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती Updated Fri, 20 Dec 2024 12:21 AM IST
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The general became a sleeper coach... also the son of the seat.
बस्ती रेलवे स्टेशन पर मुंबई जाने वाली ट्रेन में बैठने के लिए जद्दोजहद करते यात्री
संवाद न्यूज एजेंसी
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बस्ती। सहालग और रबी की बोवाई खत्म होने के बाद नौकरी पर लौटना मुसीबत भरा हो गया है। इन दिनों दिल्ली-मुंबई की ट्रेनों में इस कदर भीड़ है कि स्लीपर कोच भी जनरल बन गए हैं। भीड़ की वजह से जैसे-तैसे यात्री अपनी सीट तक पहुंच पा रहे हैं। मगर, वहां पहुंचकर भी खड़े रहना पड़ता है। क्योंकि सीट पर पहले से कब्जा रहता है। ऐसे में आरक्षित टिकट के बावजूद लंबी दूरी के यात्रियों को कई-कई किमी तक खड़े होकर यात्रा करनी पड़ती है।
यदि किसी ने सीट खाली कराने की जुर्रत कर ली तो पहले से सीट पर काबिज लोग झुंड़ मेंं उसके ऊपर टूट पड़ते हैं। ऐसे में वे चुप रहना ही बेहतर समझते हैं।
बृहस्पतिवार को दिल्ली से आई सत्याग्रह एक्सप्रेस के स्लीपर कोच में ठसाठस भीड़ थी। यात्रियों के उतरने के दौरान ही गोरखपुर, बगहा, बेतिया आदि बिहार के शहरों के यात्री चढ़ने का प्रयास करने लगे। ट्रेन पहले से ही फुल थी।
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स्लीपर कोच में रक्सौल तक का टिकट लिए उमर दरवाजे पर जूझ रहे थे। वह सामान समेत अंदर नहीं घुस पा रहे थे।
बार-बार चिल्ला रहे थे कि इसी कोच में उनका कंफर्म सीट है। मगर, अंदर के यात्री उन्हें दूसरे गेट से घुसने को कह रहे थे।
एसी थर्ड में भी अतिरिक्त यात्री सवार देखे गए। एसी थर्ड की हालत स्लीपर कोच जैसी लग रही थी।बाघ एक्सप्रेस की हालत तो और भी दयनीय थी। इस ट्रेन की जनरल बोगी में चढ़ने के लिए मारामारी मची थी, जिसे जहां जगह मिल रही थी, वहीं से अंदर घुसने का प्रयास कर रहा था।
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एसी सेकेंड क्लास तक यात्री घुसे हुए थे। नरोत्तम तिवारी ने बताया कि जनरल टिकट है, टीटी ने फाइन भरने को कहा है। जगह नहीं मिल रही है तो फाइन भरकर ही चले जाएंगे। यह किसी एक-दो ट्रेन की हालत नहीं है, बल्कि बड़े शहरों को आने और जाने वाली ट्रेनों की इन दिनों यही हालत है।
मुंबई से लौटे यात्री प्रमोद कुमार सिंह ने बताया कि ट्रेनों में सीट दिलाने का गिरोह सक्रिय है, जो पहले से ट्रेन में सवार होकर आता है। उसके साथ के लोग अंदर से दरवाजा बंद कर लेते हैं।
वे तब तक दरवाजा नहीं खोलते जब तक उनका आदमी बाहर से इशारे न करे। अंदर कई सीटों पर उनका कब्जा होता है। वे सीटें लोग तीन से पांच सौ रुपये लेकर बेचते हैं। बिना रुपये दिए कोई बैठने की कोशिश करे तो उससे दुर्व्यवहार भी करते हैं।
बैठे लोगों को उठाकर दे देते हैं सीट ­ः मुंबई से लौटे मेवालाल बताते हैं कि लोकमान्य तिलक स्टेशन से वह जनरल बोगी में बैठे। सीट भी मिल गई थी। मगर, कुछ देर बाद तीन-चार लोग पहुंचे। उनमें एक कुली भी था।

वे लोग सभी से सीट से खड़े होने के लिए कह रहे थे, जो उनकी बात नहीं मानता था उनका हाथ पकड़कर उठा देते थे। उनके साथ दूसरे यात्री पीछे खड़े थे, जो उन लोगों को रुपये दिए हुए थे। दूसरों को उठाकर जिन लोगों ने रुपये दिए थे, उन्हें बैठा रहे थे।
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