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Basti News: अपनों के इंतजार में थम गईं सांसें, अंतिम विदाई में चार कंधे भी नसीब नहीं

Thu, 13 Aug 2026 01:01 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Thu, 13 Aug 2026 01:01 AM IST
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The breath stopped waiting for loved ones, not even four shoulders were available for the final farewell.
मृतक सीमादेवी व मूलचंद फाइल फोटो - फोटो : 1
हर्रैया। उम्र के आखिरी पड़ाव पर जब किसी अपने के सहारे की जरूरत थी तब हर्रैया के आसरा आवास में रह रहे मूलचंद और सीमा देवी के हिस्से में अकेलापन आया। तबीयत बिगड़ने पर छह जुलाई को दोनों को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इसके बाद भी अपनों का इंतजार खत्म नहीं हुआ। इलाज के दौरान एक अगस्त को सीमा देवी की माैत हो गई। पुलिस ने 10 अगस्त को उनका अंतिम संस्कार करा दिया। वहीं मूलचंद की आठ अगस्त को माैत हो गई। चार दिन मोर्चरी में पड़ा रहा। कोई वारिस नहीं आया तो पुलिस ने 12 अगस्त को अंतिम संस्कार कराया।
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मूलचंद ने वर्ष 1983 में गांव की जमीन-जायदाद बेच दी थी। इसके बाद हर्रैया में पान की गुमटी खोली और कस्बे में ही रहने लगे। उम्र बढ़ने के साथ हालात बदले और वह आसरा आवास में रहने लगे। दूसरी ओर अचेतावस्था में मिलीं सीमादेवी के बारे में पता चला कि कस्बे का रहने वाला दिलीप नाम का व्यक्ति उन्हें ब्याह कर लाया था। पति की मौत के बाद वह बेसहारा हो गईं और आसरा आवास में रहने लगीं। जब तक शरीर ने साथ दिया, दोनों किसी तरह रोटी-कपड़े का इंतजाम करते रहे। करीब एक साल से उम्र हौसले पर भारी पड़ने लगी तो बाहर निकलना कम हो गया। धीरे-धीरे दोनों अपने-अपने कमरों तक सिमट गए। पड़ोस में रहने वाले जितेंद्र और उनकी पत्नी श्यामा ही वक्त-बेवक्त उनका सहारा बनते रहे। वे दोनों बुजुर्गों के लिए भोजन-पानी पहुंचा दिया करते थे।
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बोलीं स्टाफ नर्स और स्वीपर, झांकने तक नहीं आए लोग
छह जुलाई को भर्ती कराए गए दोनों बुजुर्गों को देखने के लिए कोई परिजन झांकने तक नहीं आया। जो आया भी वह फोटो खिंचवाने के बाद चला गया। यह कहना है वार्ड इंचार्ज का। उन्होंने बताया कि वार्ड में स्वीपर नीलम ही दोनों की देखरेख करती रहीं। घर से कपड़े लाकर पहनाए गए। अंतिम क्षणों में भी दोनों की आंखें अपनों को तलाशती रहीं। पुलिस के जरिये परिजनों को सूचना दी गई लेकिन कोई नहीं आया।
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समाज के लिए चिंतन का विषय
यह चिंताजनक पहलू है। समाज और सरकार के लिए सोचनीय विषय है। अंतिम क्षण में किसी का सहारा न मिलना बेहद पीड़ादायक स्थिति है। सरकार और स्वयंसेवी संगठनों को इस दिशा में प्रयास करना चाहिए कि ऐसे बुजुर्ग जो निराश्रित और लाचार हैं, उन्हें चिह्नित कर उनकी देखभाल की जिम्मेदारी उठाई जाए। ऐसा तंत्र विकसित किया जाना चाहिए जिससे कोई बुजुर्ग लावारिस न रहे और उसके जीवन के अंतिम क्षण सम्मान के साथ गुजरें। ऐसे मामलों में परिवार और समाज, दोनों की जिम्मेदारी बनती है। बुजुर्गों की देखभाल के लिए सामाजिक स्तर पर मजबूत व्यवस्था की जरूरत है, ताकि जीवन के अंतिम पड़ाव पर कोई व्यक्ति अकेला और असहाय महसूस न करे।

- प्रेम प्रकाश पांडेय, समाजशास्त्री

वर्जन
जिला अस्पताल में भर्ती सीमादेवी और मूलचंद्र के शव 72 घंटे तक अस्पताल की मोर्चरी में सुरक्षित रखे गए। कोई वारिस नहीं आया तो पुलिस ने दोनों शवों का अंतिम संस्कार करा दिया।
- बृजानंद सिंह, कोतवाल, बस्ती
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