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Basti News: शोहदों के सब्जबाग से दहलीज लांघ रही किशोरियां, साल भर में 154 केस
Sun, 31 Dec 2023 11:28 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Sun, 31 Dec 2023 11:28 PM IST
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बस्ती। किशोरियों को सब्जबाग दिखाकर भगा ले जाने के मामले इस वर्ष भी कम नहीं हुए। वर्ष 2023 में जिले के 16 थानों में 65 सौ एफआईआर दर्ज की गई। जिनमें आधे केस तो मारपीट के हैं। इसकी वजह जमीन को लेकर विवाद बताया जा रहा है। इसके बाद सबसे ज्यादा मामले किशोरियों के गायब होने के हैं। हर तीसरे दिन किसी न किसी किशोरी के गायब होने की खबर आई। औसतन हर महीने 15 से 16 नाबालिगों का अपहरण हो रहा है। एक साल में ऐसी 154 किशोरियों का अपहरण हो चुका है। पुलिस की जांच में पाया गया कि इनमें से 99 फीसदी मामलों में प्रेम प्रसंग के कारण किशोरियां खुद ही झांसे में आकर घर छोड़कर जा रही हैं।
इसे फिल्मों व वेब सीरीज का असर कहें या सोशल मीडिया का प्रभाव। शोहदे भोलीभाली किशोरियों को शिकार बना रहे हैं। सही-गलत में फर्क करने की समझ कम होने का फायदा उठाकर ऐसा सब्जबाग दिखाते हैं कि किशोरियां उनके साथ जीने-मरने की कसमें खाने लगती हैं। ऐसे शोहदों के इशारे पर कुछ भी करने को तैयार कई किशोरियां घर की दहलीज लांघने तक में देर नहीं लगा रही हैं। मगर उनके पैरों तले जमीन तब सरकने लगती है, जब शोहदे अपना असली रंग दिखाने लगते हैं। कई तो दरिंदगी की शिकार होकर जान तक गंवा रही हैं। इस साल ऐसे मामलों की भरमार रही।
आए दिन सामने आ रहे हैं मामले
हर महीने इस तरह के आठ से दस मामले सामने आ रहे हैं। पहले इस तरह के मामलों में शामिल किशोरियां कम पढ़ी-लिखी होती थीं। लेकिन पिछले तीन से चार महीने में पढ़ी-लिखी छात्राओं के इस तरह के मामलों में फंसने के केस आए हैं। मोबाइल फोन के बढ़ते चलन ने स्थितियों को और बिगाड़ा है। इसकी वजह यह है कि अभिभावक समाज में आ रहे बदलाव को समझ नहीं रहे हैं। आज देखते-देखते बच्चा कब परिवार से दूर हो जाता है, अभिभावकों को इसका पता ही नहीं चलता।
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15 साल की एक किशोरी से उसकी कोचिंग के पास रहने वाले 25 साल के आरुष ने मदद के बहाने बातचीत शुरू की। बातचीत का यह सिलसिला तब शुरू हुआ जब कोचिंग के बाहर किशोरी को एक अनजान युवक ने छेड़ा और आरुष किशोरी की मदद के लिए आगे आया। धीरे-धीरे बातचीत दोस्ती से बढ़कर प्यार में तब्दील हो गई। करीब छह महीने बाद किशोरी को इस बात का पता चला कि आरुष का वास्तविक नाम अरफान है। किशोरी ने सच छिपाने का विरोध किया। आगे रिश्ते में रहने से इन्कार किया तो अरफान और उसके दोस्तों ने किशोरी के स्कूल, कोचिंग और घर के आसपास उसकी फोटो और वीडियो शेयर करना शुरू कर दिया।
16 साल की एक किशोरी के साथ भी इसी तरह का मामला सामने आया है। करीब डेढ़ साल पहले समीर नाम के 34 साल के युवक ने उसे कोचिंग पढ़ाना शुरू किया। समीर किशोरी की कक्षा के अन्य छात्रों के जरिये बतौर ट्यूशन टीचर किशोरी के संपर्क में आया। पढ़ाई के दौरान ही समीर ने किशोरी से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी। दोस्ती के बहाने ही उसे देश-दुनिया की बातें बताना, कॅरियर के विकल्प बताना, आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने समेत ऐसी कई चीजें कीं। इससे किशोरी के मन में यह बात बैठ गई कि समीर एक अच्छा व्यक्ति है। उसने इसी बीच नजदीकियां बढ़ाईं और शारीरिक संबंध बनाए। उसे यह धमकी दी कि किसी को बताने पर उसका समाज में तमाशा बन जाएगा। कुछ दिनों बाद समीर ने उससे खुद ही बात करना बंद कर दिया। तनाव के चलते किशोरी को कई शारीरिक दिक्कतों ने घेर लिया। परिजनों को मनोविज्ञानी से काउंसलिंग के दौरान मामले का पता चला।
ताकि शिकार न हो जाएं आपकी बेटियां
मनोविज्ञानी डाॅ. वेद प्रकाश बताते हैं कि बच्चों से दोस्ताना संवाद बढ़ाएं। दिनचर्या पर नजर रखें और उनसे बात करें। गुस्से पर नियंत्रण रखें और बच्चे को भी समझें। शांत मन से बात करें। उसकी सुनें, अपनी कहें। बच्चों के मामले में बाहरी को बोलने का हक न दें। बाहरी व्यक्ति के सामने बच्चे का दोष न गिनाएं।
बिना संकोच सही-गलत समझाना जरूरी
समाजशास्त्री डॉ. रघुवर पांडेय बताते हैं कि 14 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चे तमाम तरह के बदलावों के दौर से गुजरते हैं। उनके मन में कई तरह की जिज्ञासा जागृत होती है। दोस्तों की फेहरिस्त बढ़ाने में उनकी रुचि ज्यादा होती है। गर्लफ्रेंड-ब्वायफ्रेंड कल्चर के बढ़ने की वजह से उनके बहकने की आशंका बढ़ जाती है। सोशल मीडिया के आकर्षण में फंसकर उनकी संगति कई बार गलत लोगों से हो जाती है। वहीं धोखा होने लगता है। ऐसे में बिना संकोच के उन्हें सही-गलत के बारे में समझाना जरूरी होता है।
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इसे फिल्मों व वेब सीरीज का असर कहें या सोशल मीडिया का प्रभाव। शोहदे भोलीभाली किशोरियों को शिकार बना रहे हैं। सही-गलत में फर्क करने की समझ कम होने का फायदा उठाकर ऐसा सब्जबाग दिखाते हैं कि किशोरियां उनके साथ जीने-मरने की कसमें खाने लगती हैं। ऐसे शोहदों के इशारे पर कुछ भी करने को तैयार कई किशोरियां घर की दहलीज लांघने तक में देर नहीं लगा रही हैं। मगर उनके पैरों तले जमीन तब सरकने लगती है, जब शोहदे अपना असली रंग दिखाने लगते हैं। कई तो दरिंदगी की शिकार होकर जान तक गंवा रही हैं। इस साल ऐसे मामलों की भरमार रही।
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आए दिन सामने आ रहे हैं मामले
हर महीने इस तरह के आठ से दस मामले सामने आ रहे हैं। पहले इस तरह के मामलों में शामिल किशोरियां कम पढ़ी-लिखी होती थीं। लेकिन पिछले तीन से चार महीने में पढ़ी-लिखी छात्राओं के इस तरह के मामलों में फंसने के केस आए हैं। मोबाइल फोन के बढ़ते चलन ने स्थितियों को और बिगाड़ा है। इसकी वजह यह है कि अभिभावक समाज में आ रहे बदलाव को समझ नहीं रहे हैं। आज देखते-देखते बच्चा कब परिवार से दूर हो जाता है, अभिभावकों को इसका पता ही नहीं चलता।
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15 साल की एक किशोरी से उसकी कोचिंग के पास रहने वाले 25 साल के आरुष ने मदद के बहाने बातचीत शुरू की। बातचीत का यह सिलसिला तब शुरू हुआ जब कोचिंग के बाहर किशोरी को एक अनजान युवक ने छेड़ा और आरुष किशोरी की मदद के लिए आगे आया। धीरे-धीरे बातचीत दोस्ती से बढ़कर प्यार में तब्दील हो गई। करीब छह महीने बाद किशोरी को इस बात का पता चला कि आरुष का वास्तविक नाम अरफान है। किशोरी ने सच छिपाने का विरोध किया। आगे रिश्ते में रहने से इन्कार किया तो अरफान और उसके दोस्तों ने किशोरी के स्कूल, कोचिंग और घर के आसपास उसकी फोटो और वीडियो शेयर करना शुरू कर दिया।
16 साल की एक किशोरी के साथ भी इसी तरह का मामला सामने आया है। करीब डेढ़ साल पहले समीर नाम के 34 साल के युवक ने उसे कोचिंग पढ़ाना शुरू किया। समीर किशोरी की कक्षा के अन्य छात्रों के जरिये बतौर ट्यूशन टीचर किशोरी के संपर्क में आया। पढ़ाई के दौरान ही समीर ने किशोरी से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी। दोस्ती के बहाने ही उसे देश-दुनिया की बातें बताना, कॅरियर के विकल्प बताना, आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने समेत ऐसी कई चीजें कीं। इससे किशोरी के मन में यह बात बैठ गई कि समीर एक अच्छा व्यक्ति है। उसने इसी बीच नजदीकियां बढ़ाईं और शारीरिक संबंध बनाए। उसे यह धमकी दी कि किसी को बताने पर उसका समाज में तमाशा बन जाएगा। कुछ दिनों बाद समीर ने उससे खुद ही बात करना बंद कर दिया। तनाव के चलते किशोरी को कई शारीरिक दिक्कतों ने घेर लिया। परिजनों को मनोविज्ञानी से काउंसलिंग के दौरान मामले का पता चला।
ताकि शिकार न हो जाएं आपकी बेटियां
मनोविज्ञानी डाॅ. वेद प्रकाश बताते हैं कि बच्चों से दोस्ताना संवाद बढ़ाएं। दिनचर्या पर नजर रखें और उनसे बात करें। गुस्से पर नियंत्रण रखें और बच्चे को भी समझें। शांत मन से बात करें। उसकी सुनें, अपनी कहें। बच्चों के मामले में बाहरी को बोलने का हक न दें। बाहरी व्यक्ति के सामने बच्चे का दोष न गिनाएं।
बिना संकोच सही-गलत समझाना जरूरी
समाजशास्त्री डॉ. रघुवर पांडेय बताते हैं कि 14 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चे तमाम तरह के बदलावों के दौर से गुजरते हैं। उनके मन में कई तरह की जिज्ञासा जागृत होती है। दोस्तों की फेहरिस्त बढ़ाने में उनकी रुचि ज्यादा होती है। गर्लफ्रेंड-ब्वायफ्रेंड कल्चर के बढ़ने की वजह से उनके बहकने की आशंका बढ़ जाती है। सोशल मीडिया के आकर्षण में फंसकर उनकी संगति कई बार गलत लोगों से हो जाती है। वहीं धोखा होने लगता है। ऐसे में बिना संकोच के उन्हें सही-गलत के बारे में समझाना जरूरी होता है।