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Basti News: जुगाड़ पर शटरिंग का तानाबाना, बिना सुरक्षा काम करने को मजबूर हैं मजदूर
Tue, 07 Nov 2023 12:37 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Tue, 07 Nov 2023 12:37 AM IST
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काम चलाऊ सामान के भरोसे लाद देते हैं भारी भरकम वजन
भानपुर के बनटिकरा में हो चुकी है खराब शटरिंग के चलते मिस्त्री की मौत
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। सरकारी, गैर सरकारी भवनों के छत ढलाई में लगने वाली ज्यादातर शटरिंग का पूरा तानाबाना जुगाड़ पर टंगा हुआ है। भारी-भरकम वजन लादने वाले इस प्रयोजन में अत्यंत काम चलाऊ ढांचा तैयार किया जा रहा है। कई बार ठेकेदार के पास मजबूत बांस9बल्ली नहीं होती है। मजदूर जोखिम में जान डालकर उसके नीचे काम करने को मजबूर हैं। ऐसे मजदूरों का न तो कोई प्रशिक्षण होता है और न ही बीमा। हेलमेट, ग्लब्स तक नहीं होता है। इससे आए दिन हादसे होते रहते हैं।
तीन दिन पहले भानपुर के बनटिकरा गांव में निमार्णाधीन मिनी स्टेडियम की छत की ढलाई करते समय शटरिंग ढहने की घटना इसी कामचलाऊ व्यवस्था का परिणाम थी। इसमें एक मिस्त्री की मौत हो गई थी। इस घटना के पीछे जांच में शटरिंग लगाने में लापरवाही सामने आई है। वहां जिस जमीन पर शटरिंग की बल्ली लगाई गई थी, वह गीली थी। बावजूद इसके शटरिंग का ढांचा खड़ा कर दिया गया।
जानकार बताते हैं कि यहां ज्यादातर छतों की ढलाई बांस-बल्ली के सहारे खड़ी की जाने वाली शटरिंग से की जा रही है। जो कब टूट जाए या खिसक जाए, इसका कोई ठिकाना नहीं होता। निर्माण विभाग के अभियंता आशीष श्रीवास्तव बताते हैं कि लोहे के पाइप या चैनल की शटरिंग काफी सुरक्षित होती हैए लेकिन अपेक्षकृत महंगी होने की वजह से लोग इसका उपयोग कम करते हैं। वजन में भारी होने की वजह से इसके परिवहन में भी दिक्कत आती है। इसलिए बांस-बल्ली और प्लाईउड की शटरिंग का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। जबकि यह काफी खतरनाक होता है। असंगठित स्तर के इस काम पर लगाम लगाने के लिए कोई विभाग आगे नहीं आता।
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पटरा लगाकर बढ़ाते हैं ऊंचाई
- शटरिंग कारीगर राम कृपाल बाते हैं कि कई जगह घरों में छत लगाते समय जब दीवार की ऊंचाई जमीन से ज्यादा हो जाती है तो बल्ली के नीचे कई कारीगर एक इंच मोटा पटरा ठोंक देते हैं। जो ऊपर से भर पड़ने पर कई बार टूट जाते हैं। शटरिंग से होने वाली दुर्घटना में यही सबसे आम वजह है। ऊंचाई बढ़ाने के लिए बल्ली के नीचे ईंट भी रख दिया जाता है। उसे भी खिसकने का डर रहता है।
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दो तरह का लोड नहीं सह पाते फाउंडेशन
- जानकार बताते हैं कि छत की ढलाई के समय शटरिंग के ऊपर ढलाई के समय दो तरह का लोड होता है। एक डेड लोड और दूसरा लाइव लोड। लाइव लोड यानी ढलाई के समय मजदूर, मिस्त्री, बिजली वायरिंग कारीगर आदि शटरिंग के ऊपर खड़े होते हैं या चलते हैं। डेड लोड कंक्रीट, सीमेंट, मोरंग, पानी, सरिया आदि का लोड शामिल होता है। इसके मद्देनजर शटरिंग का बेस मजबूत न होने पर दुर्घटना की संभावना बन जाती है।
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मजदूरों की सुरक्षा नहीं है कोई प्रबंध
- शटरिंग और ढलाई करने वाले मजदूरों की सुरक्षा का कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। कई मंजिल ऊंची बिल्डिंग के ऊपर भी उन्हें बिना सुरक्षा बेल्ट, हेलमेट के चढ़ा दिया जाता है। दिहाड़ी के मजदूरों को खुद भी इसकी परवाह नहीं रहती मगर हादसा होने पर उनकी जान तक चली जाती है। शटरिंग का काम करने वाले विंदेश्वरी प्रसाद बताते हैं कि किसी ठेकेदार के पास इस तरह के संसाधन नहीं होते हैं। हम लोगों की मजबूरी यह है कि इसके अलावा दूसरा काम नहीं जानते हैं।
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भानपुर के बनटिकरा में हो चुकी है खराब शटरिंग के चलते मिस्त्री की मौत
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। सरकारी, गैर सरकारी भवनों के छत ढलाई में लगने वाली ज्यादातर शटरिंग का पूरा तानाबाना जुगाड़ पर टंगा हुआ है। भारी-भरकम वजन लादने वाले इस प्रयोजन में अत्यंत काम चलाऊ ढांचा तैयार किया जा रहा है। कई बार ठेकेदार के पास मजबूत बांस9बल्ली नहीं होती है। मजदूर जोखिम में जान डालकर उसके नीचे काम करने को मजबूर हैं। ऐसे मजदूरों का न तो कोई प्रशिक्षण होता है और न ही बीमा। हेलमेट, ग्लब्स तक नहीं होता है। इससे आए दिन हादसे होते रहते हैं।
तीन दिन पहले भानपुर के बनटिकरा गांव में निमार्णाधीन मिनी स्टेडियम की छत की ढलाई करते समय शटरिंग ढहने की घटना इसी कामचलाऊ व्यवस्था का परिणाम थी। इसमें एक मिस्त्री की मौत हो गई थी। इस घटना के पीछे जांच में शटरिंग लगाने में लापरवाही सामने आई है। वहां जिस जमीन पर शटरिंग की बल्ली लगाई गई थी, वह गीली थी। बावजूद इसके शटरिंग का ढांचा खड़ा कर दिया गया।
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जानकार बताते हैं कि यहां ज्यादातर छतों की ढलाई बांस-बल्ली के सहारे खड़ी की जाने वाली शटरिंग से की जा रही है। जो कब टूट जाए या खिसक जाए, इसका कोई ठिकाना नहीं होता। निर्माण विभाग के अभियंता आशीष श्रीवास्तव बताते हैं कि लोहे के पाइप या चैनल की शटरिंग काफी सुरक्षित होती हैए लेकिन अपेक्षकृत महंगी होने की वजह से लोग इसका उपयोग कम करते हैं। वजन में भारी होने की वजह से इसके परिवहन में भी दिक्कत आती है। इसलिए बांस-बल्ली और प्लाईउड की शटरिंग का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। जबकि यह काफी खतरनाक होता है। असंगठित स्तर के इस काम पर लगाम लगाने के लिए कोई विभाग आगे नहीं आता।
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पटरा लगाकर बढ़ाते हैं ऊंचाई
- शटरिंग कारीगर राम कृपाल बाते हैं कि कई जगह घरों में छत लगाते समय जब दीवार की ऊंचाई जमीन से ज्यादा हो जाती है तो बल्ली के नीचे कई कारीगर एक इंच मोटा पटरा ठोंक देते हैं। जो ऊपर से भर पड़ने पर कई बार टूट जाते हैं। शटरिंग से होने वाली दुर्घटना में यही सबसे आम वजह है। ऊंचाई बढ़ाने के लिए बल्ली के नीचे ईंट भी रख दिया जाता है। उसे भी खिसकने का डर रहता है।
दो तरह का लोड नहीं सह पाते फाउंडेशन
- जानकार बताते हैं कि छत की ढलाई के समय शटरिंग के ऊपर ढलाई के समय दो तरह का लोड होता है। एक डेड लोड और दूसरा लाइव लोड। लाइव लोड यानी ढलाई के समय मजदूर, मिस्त्री, बिजली वायरिंग कारीगर आदि शटरिंग के ऊपर खड़े होते हैं या चलते हैं। डेड लोड कंक्रीट, सीमेंट, मोरंग, पानी, सरिया आदि का लोड शामिल होता है। इसके मद्देनजर शटरिंग का बेस मजबूत न होने पर दुर्घटना की संभावना बन जाती है।
मजदूरों की सुरक्षा नहीं है कोई प्रबंध
- शटरिंग और ढलाई करने वाले मजदूरों की सुरक्षा का कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। कई मंजिल ऊंची बिल्डिंग के ऊपर भी उन्हें बिना सुरक्षा बेल्ट, हेलमेट के चढ़ा दिया जाता है। दिहाड़ी के मजदूरों को खुद भी इसकी परवाह नहीं रहती मगर हादसा होने पर उनकी जान तक चली जाती है। शटरिंग का काम करने वाले विंदेश्वरी प्रसाद बताते हैं कि किसी ठेकेदार के पास इस तरह के संसाधन नहीं होते हैं। हम लोगों की मजबूरी यह है कि इसके अलावा दूसरा काम नहीं जानते हैं।