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पूर्वांचल की लक्ष्मीबाई थीं रानी तलाश कुंवरि
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फाइल फोटो रानी तलाश कुंवरि। संवाद
- फोटो : BASTI
पूर्वांचल की लक्ष्मीबाई थीं रानी तलाश कुंवरि
रानी तलाश कुंवरि ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन को बना दिया था जनक्रांति
अमोढ़ा रियासत की अंतिम शासक के रूप में भी है पहचान
रानी को जिंदा नहीं पकड़ पाए अंग्रेज
बस्ती/विक्रमजोत। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन को जनक्रांति का रूप देने वाली अमोढ़ा रियासत की रानी तलाश कुंवरि को पूर्वांचल में गर्व से याद किया जाता है। आंदोलन में रानी ने पूरी ताकत से अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ी। उन्हें पूर्वांचल की रानी लक्ष्मीबाई के रूप में भी जाना जाता है। इससे खफा अंग्रेजों ने रानी के सिपहसालारों और सैकड़ों क्रांतिकारियों को छावनी में पीपल के पेड़ से बांधकर फंदे से लटका दिया था।
इसके बावजूद क्रांतिकारियों के हौसले नहीं टूटे और अंग्रेजों के खिलाफ जंग जारी रखी। जब देश अमृत महोत्सव के तहत स्वतंत्रता सप्ताह मना रहा है तो रानी तलाश कुंवरि के बलिदान को याद किया जाना नितांत आवश्यक है। वह अमोढ़ा रियासत की अंतिम शासक थीं। रानी की बहादुरी ने इतिहास के पन्नों पर अमिट छाप छोड़ी है।
एसआर पीजी कॉलेज दसिया के कार्यवाहक प्राचार्य व इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र श्रीवास्तव ने बस्ती स्वतंत्रता आंदोलन पर लंबे समय तक शोध किया। स्वतंत्रता संग्राम में बस्ती मंडल का योगदान शीर्षक से पुस्तक भी लिखी है। वह बताते हैं कि 1852 में महाराजा जंगबहादुर सिंह के निधन के बाद रानी तलाश कुंवरि को रियासत की बागडोर संभालनी पड़ी।
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उस समय अंग्रेज अपने राज्य विस्तार में पूरी ताकत लगाए हुए थे। ब्रिटिश हुकूमत की नजर एकाएक अमोढ़ा रियासत पर पड़ी। उन्होंने अमोढ़ा को हथियाने का कुचक्र रचना शुरू कर दिया। रानी अंग्रेजों का कुचक्र समझ गईं। तब आसपास की रियासतों ने मिलकर एक संगठन बनाया। इसमें अमोढ़ा भी शामिल हुआ। सभी रियासतों ने अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ जंग शुरू की।
इधर, रानी की बढ़ती ताकत से तिलमिलाए अंग्रेजों ने विद्रोह को दबाने के लिए 1858 में कर्नल ह्यूज के नेतृत्व में ब्रिटिश फौज को अमोढ़ा पर आक्रमण के लिए भेजा। सैनिकों के साथ रानी ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। संवाद
रानी को जिंदा नहीं पकड़ा पाए अंग्रेज
डॉ. वीरेंद्र बताते हैं कि अंग्रेज रानी को जिंदा पकड़ना चाहते थे। लेकिन रानी ने सौगंध ले रखी थी कि वह जीते जी अंग्रेजों के हाथ नहीं लगेंगी। अंग्रेजों से युद्ध करते रानी पखेरवा कुंवर स्थित समय माता के स्थान पर पहुंचीं। सिपहसालारों को बुलाया और बोलीं, अब प्राण बचाना मुश्किल है। यहीं पर उन्होंने दो मार्च 1858 को छाती में कटार घोंपकर जान दे दी।
रानी की मौत के बाद उनके शव को सिपहसालारों ने छिपा दिया। बाद में शव को अमोढ़ा राज्य की कुल देवी समय माता भवानी चौरा के पास दफना दिया गया। यह जगह आज रानी चौरा के टीले नाम से प्रसिद्ध है। जबकि पखेरवा में रानी के घोड़े को दफनाया गया है। जहां आज भी एक पीपल का पेड़ मौजूद है। डॉ. वीरेंद्र बताते हैं कि रानी तलाश कुंवरि की वीरता किसी मायने में रानी लक्ष्मीबाई से कम नहीं है।
क्रांतिकारियों की फांसी का गवाह है पीपल
रानी की शहादत के बाद भी उनकी रियासत के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। तब अंग्रेजों की सेना ने गांव-गांव जाकर रानी के सैनिकों और उनके सहयोगियों को पकड़ा। अंग्रेजों ने करीब डेढ़ सौ सैनिकों को छावनी में पीपल के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी। डॉ. वीरेंद्र बतातेे हैं कि करीब पांच सौ क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने फांसी दी। 1972 में प्रदेश सरकार ने इस जगह को संरक्षित कराया। जो अब छावनी शहीद स्थल के नाम से प्रसिद्ध है। इस स्थल पर 1992 से शहीदों के नाम पर मेले का आयोजन किया जाता है। शहीद स्थल पर मौजूद शिलालेख पर महारानी का जीवन परिचय लिखा है और क्रांतिकारियों का उल्लेख है। हालांकि, शिलालेख पर सिर्फ 19 शहीदों के ही नाम अंकित हैं।
डॉ. रमा ने बनाया रानी तलाश कुंवरि का छह फीट का चित्र
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती । आजादी की 75वीं वर्षगाँठ पर डॉ. रमा शर्मा ने रानी तलाश कुंवरि की छह फीट की तस्वीर बनाई। डॉक्टर रमा ने बताया कि रानी तलाश कुंवरि का चित्र बनाना आसान नहीं था। इतिहास के दस्तावेज में रानी का कोई भी चित्र नहीं है। स्वयं अमोढ़ा जाकर स्थानीय वरिष्ठ जनों की बातचीत और अन्य साक्ष्यों के आधार पर महान व्यक्तित्व को छह फीट लंबी और तीन फीट चौड़े कैनवास पर एक्रेलिक रंगों के माध्यम से कलाकृति के रूप में सृजित करने का प्रयास किया है।
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रानी तलाश कुंवरि ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन को बना दिया था जनक्रांति
अमोढ़ा रियासत की अंतिम शासक के रूप में भी है पहचान
रानी को जिंदा नहीं पकड़ पाए अंग्रेज
बस्ती/विक्रमजोत। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन को जनक्रांति का रूप देने वाली अमोढ़ा रियासत की रानी तलाश कुंवरि को पूर्वांचल में गर्व से याद किया जाता है। आंदोलन में रानी ने पूरी ताकत से अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ी। उन्हें पूर्वांचल की रानी लक्ष्मीबाई के रूप में भी जाना जाता है। इससे खफा अंग्रेजों ने रानी के सिपहसालारों और सैकड़ों क्रांतिकारियों को छावनी में पीपल के पेड़ से बांधकर फंदे से लटका दिया था।
इसके बावजूद क्रांतिकारियों के हौसले नहीं टूटे और अंग्रेजों के खिलाफ जंग जारी रखी। जब देश अमृत महोत्सव के तहत स्वतंत्रता सप्ताह मना रहा है तो रानी तलाश कुंवरि के बलिदान को याद किया जाना नितांत आवश्यक है। वह अमोढ़ा रियासत की अंतिम शासक थीं। रानी की बहादुरी ने इतिहास के पन्नों पर अमिट छाप छोड़ी है।
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एसआर पीजी कॉलेज दसिया के कार्यवाहक प्राचार्य व इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र श्रीवास्तव ने बस्ती स्वतंत्रता आंदोलन पर लंबे समय तक शोध किया। स्वतंत्रता संग्राम में बस्ती मंडल का योगदान शीर्षक से पुस्तक भी लिखी है। वह बताते हैं कि 1852 में महाराजा जंगबहादुर सिंह के निधन के बाद रानी तलाश कुंवरि को रियासत की बागडोर संभालनी पड़ी।
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उस समय अंग्रेज अपने राज्य विस्तार में पूरी ताकत लगाए हुए थे। ब्रिटिश हुकूमत की नजर एकाएक अमोढ़ा रियासत पर पड़ी। उन्होंने अमोढ़ा को हथियाने का कुचक्र रचना शुरू कर दिया। रानी अंग्रेजों का कुचक्र समझ गईं। तब आसपास की रियासतों ने मिलकर एक संगठन बनाया। इसमें अमोढ़ा भी शामिल हुआ। सभी रियासतों ने अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ जंग शुरू की।
इधर, रानी की बढ़ती ताकत से तिलमिलाए अंग्रेजों ने विद्रोह को दबाने के लिए 1858 में कर्नल ह्यूज के नेतृत्व में ब्रिटिश फौज को अमोढ़ा पर आक्रमण के लिए भेजा। सैनिकों के साथ रानी ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। संवाद
रानी को जिंदा नहीं पकड़ा पाए अंग्रेज
डॉ. वीरेंद्र बताते हैं कि अंग्रेज रानी को जिंदा पकड़ना चाहते थे। लेकिन रानी ने सौगंध ले रखी थी कि वह जीते जी अंग्रेजों के हाथ नहीं लगेंगी। अंग्रेजों से युद्ध करते रानी पखेरवा कुंवर स्थित समय माता के स्थान पर पहुंचीं। सिपहसालारों को बुलाया और बोलीं, अब प्राण बचाना मुश्किल है। यहीं पर उन्होंने दो मार्च 1858 को छाती में कटार घोंपकर जान दे दी।
रानी की मौत के बाद उनके शव को सिपहसालारों ने छिपा दिया। बाद में शव को अमोढ़ा राज्य की कुल देवी समय माता भवानी चौरा के पास दफना दिया गया। यह जगह आज रानी चौरा के टीले नाम से प्रसिद्ध है। जबकि पखेरवा में रानी के घोड़े को दफनाया गया है। जहां आज भी एक पीपल का पेड़ मौजूद है। डॉ. वीरेंद्र बताते हैं कि रानी तलाश कुंवरि की वीरता किसी मायने में रानी लक्ष्मीबाई से कम नहीं है।
क्रांतिकारियों की फांसी का गवाह है पीपल
रानी की शहादत के बाद भी उनकी रियासत के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। तब अंग्रेजों की सेना ने गांव-गांव जाकर रानी के सैनिकों और उनके सहयोगियों को पकड़ा। अंग्रेजों ने करीब डेढ़ सौ सैनिकों को छावनी में पीपल के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी। डॉ. वीरेंद्र बतातेे हैं कि करीब पांच सौ क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने फांसी दी। 1972 में प्रदेश सरकार ने इस जगह को संरक्षित कराया। जो अब छावनी शहीद स्थल के नाम से प्रसिद्ध है। इस स्थल पर 1992 से शहीदों के नाम पर मेले का आयोजन किया जाता है। शहीद स्थल पर मौजूद शिलालेख पर महारानी का जीवन परिचय लिखा है और क्रांतिकारियों का उल्लेख है। हालांकि, शिलालेख पर सिर्फ 19 शहीदों के ही नाम अंकित हैं।
डॉ. रमा ने बनाया रानी तलाश कुंवरि का छह फीट का चित्र
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती । आजादी की 75वीं वर्षगाँठ पर डॉ. रमा शर्मा ने रानी तलाश कुंवरि की छह फीट की तस्वीर बनाई। डॉक्टर रमा ने बताया कि रानी तलाश कुंवरि का चित्र बनाना आसान नहीं था। इतिहास के दस्तावेज में रानी का कोई भी चित्र नहीं है। स्वयं अमोढ़ा जाकर स्थानीय वरिष्ठ जनों की बातचीत और अन्य साक्ष्यों के आधार पर महान व्यक्तित्व को छह फीट लंबी और तीन फीट चौड़े कैनवास पर एक्रेलिक रंगों के माध्यम से कलाकृति के रूप में सृजित करने का प्रयास किया है।