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Basti News: निजी अस्पतालों के संचालकों ने नहीं दिया नोटिस का जवाब
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बस्ती। जिले में 190 निजी अस्पताल ही पंजीकरण करा पाए हैं, जबकि 135 को खामियां दूर करने निर्देश दिए गए हैं। लेकिन, संचालकों ने न तो जवाब दिया न ही नए सिरे से आवेदन ही किया। आवेदनों को पोर्टल से डिलीट करने की कार्रवाई ठंडे बस्ते में डाल दी गई है।
बता दें कि चालू सत्र में 325 ने इस साल आवेदन किया था, जिसमें मानक पर 190 ही खरे उतर पाए थे। शेष इससे चूक गए। हालांकि, विभाग ने खामियां दूर कर फिर से आवेदन के लिए कहा, लेकिन कोई संचालक आगे नहीं आया। लेकिन, गुपचुप तरीके से अस्पताल चल रहे, जहां मरीजों को भर्ती कर उपचार किया जा रहा है।
जांच में खामियां मिलने के बाद भी कार्रवाई नहीं हो रही है। कहीं घर में क्लीनिक चल रही है तो कहीं दुकान में। बिना योग्य चिकित्सक के ये अस्पताल मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं। बताते हैं कि ठोस कार्रवाई न होने से उनके हौसले नहीं टूट रहे।
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पिछले साल मिले थे 30 अवैध अस्पताल : पिछले साल सीएमओ के निरीक्षण में इस तरह के कई मामले सामने आए थे। 50 से अधिक अस्पतालों की जांच हुई थी, जिसमें करीब 30 अस्पताल जुगाड़ वाले मिले। इनमें एक दर्जन तो ऐसे अस्पताल थे जो बिना पंजीकरण और मानक पूरा किए संचालित किए जा रहे थे। कई अस्पताल ऐसे भी थे जहां पंजीकरण में उल्लेखित डॉक्टर मौजूद ही नहीं थे। इन अस्पतालों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आ सकी थी। विभाग सिर्फ नोटिस जारी करने तक ही सीमित रहा।
बेहोशी के डॉक्टर नहीं रहते, फिर भी हो जाती है सर्जरी : जानकारों ने बताया कि कई बड़े अस्पताल भी ऐसे हैं। जहां सर्जरी होती है, लेकिन बेहोशी के डॉक्टर की स्थायी व्यवस्था नहीं है। अधिकतर छोटे-बड़े अस्पतालों में सर्जरी और बेहोशी के चिकित्सकों को प्रति केस रेट तय करके बुलाया जाता है। ऐसी सेवा देने वाले कुछ सरकारी चिकित्सक भी हैं। सरकारी अस्पताल में ड्यूटी के बाद शाम चार से पांच बजे के बाद ये निजी अस्पतालों में सेवाएं देते हैं। ये चिकित्सक चार से पांच केस इकट्ठा होने पर पहुंचते हैं। जानकारों के मुताबिक प्रति केस बेहोशी के चिकित्सक को ढाई से तीन हजार और सर्जन को 10 से 15 हजार रुपये तत्काल मिलता है।
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बता दें कि चालू सत्र में 325 ने इस साल आवेदन किया था, जिसमें मानक पर 190 ही खरे उतर पाए थे। शेष इससे चूक गए। हालांकि, विभाग ने खामियां दूर कर फिर से आवेदन के लिए कहा, लेकिन कोई संचालक आगे नहीं आया। लेकिन, गुपचुप तरीके से अस्पताल चल रहे, जहां मरीजों को भर्ती कर उपचार किया जा रहा है।
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जांच में खामियां मिलने के बाद भी कार्रवाई नहीं हो रही है। कहीं घर में क्लीनिक चल रही है तो कहीं दुकान में। बिना योग्य चिकित्सक के ये अस्पताल मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं। बताते हैं कि ठोस कार्रवाई न होने से उनके हौसले नहीं टूट रहे।
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पिछले साल मिले थे 30 अवैध अस्पताल : पिछले साल सीएमओ के निरीक्षण में इस तरह के कई मामले सामने आए थे। 50 से अधिक अस्पतालों की जांच हुई थी, जिसमें करीब 30 अस्पताल जुगाड़ वाले मिले। इनमें एक दर्जन तो ऐसे अस्पताल थे जो बिना पंजीकरण और मानक पूरा किए संचालित किए जा रहे थे। कई अस्पताल ऐसे भी थे जहां पंजीकरण में उल्लेखित डॉक्टर मौजूद ही नहीं थे। इन अस्पतालों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आ सकी थी। विभाग सिर्फ नोटिस जारी करने तक ही सीमित रहा।
बेहोशी के डॉक्टर नहीं रहते, फिर भी हो जाती है सर्जरी : जानकारों ने बताया कि कई बड़े अस्पताल भी ऐसे हैं। जहां सर्जरी होती है, लेकिन बेहोशी के डॉक्टर की स्थायी व्यवस्था नहीं है। अधिकतर छोटे-बड़े अस्पतालों में सर्जरी और बेहोशी के चिकित्सकों को प्रति केस रेट तय करके बुलाया जाता है। ऐसी सेवा देने वाले कुछ सरकारी चिकित्सक भी हैं। सरकारी अस्पताल में ड्यूटी के बाद शाम चार से पांच बजे के बाद ये निजी अस्पतालों में सेवाएं देते हैं। ये चिकित्सक चार से पांच केस इकट्ठा होने पर पहुंचते हैं। जानकारों के मुताबिक प्रति केस बेहोशी के चिकित्सक को ढाई से तीन हजार और सर्जन को 10 से 15 हजार रुपये तत्काल मिलता है।