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Basti News: मरीजों को लेकर दौड़ रहे निजी एंबुलेंस... स्थायी केयर टेकर न उपचार की जानकारी
Sun, 15 Sep 2024 12:14 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Sun, 15 Sep 2024 12:14 AM IST
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संचालित हो रहे तीन तरह के एंबुलेंस, कुछ मामलों में निजी एंबुलेंस असुरक्षित
स्टॉफ का सटीक ब्योरा तक नहीं, तीमारदारों से मुंहमांगा वसूल रहे किराया
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। मरीजों के साथ दुश्वारियां सिर्फ इलाज की नहीं हैं, बल्कि एक अस्पताल से दूसरे तक पहुंचाना भी चुनौतीपूर्ण है। रेफर होने के बाद सरकारी एंबुलेंस आसानी से उपलब्ध नहीं होते हैं। लोकल स्तर पर यह मिल जाते हैं, लेकिन लखनऊ या गोरखपुर के लिए सरकारी एंबुलेंस लंबी प्रक्रिया के बाद मिलते हैं। यह सामान्य लोगों के लिए संभव नहीं है। विवशता में लोग प्राइवेट एंबुलेंस का सहारा लेते हैं। मगर, यहां समस्या और बढ़ जाती है। मुंहमांगा किराया देना पड़ता है और असुरक्षित यात्रा करनी पड़ती है।
जिले में तीन तरह के एंबुलेंस चल रहे हैं। एक सरकारी सेवा 108 और 102 हैं। इसके अलावा एडवांस लाइफ सिक्योरिटी वाले भी चार सरकारी एंबुलेंस हैं। परिवहन विभाग में कुल पंजीकृत एंबुलेंस की संख्या 146 हैं। इनमें 108 और 102 सेवा की 73 एंबुलेंस भी शामिल हैं। जबकि चार एएलएस हैं। 10 से 12 की संख्या में विभाग के अपने एंबुलेंस भी हैं। 50 से अधिक एंबुलेंस निजी क्षेत्र के सक्रिय हैं।
लखनऊ एवं गोरखपुर के लिए सरकारी एंबुलेंस तत्काल न उपलब्ध होने के कारण लोग निजी क्षेत्र के एंबुलेंस का सहारा ले रहे हैं। रेफर मरीज को पहुंचाने के नाम पर बड़ा खेल होता है। मरीज माफिया के नेटवर्क से जुड़े इन निजी क्षेत्रों के एंबुलेंस में चालक और केयर टेकर प्रशिक्षित नहीं रहते हैं। मरीज को आवश्यकता पड़ने पर इनके द्वारा प्राथमिक उपचार तक की सुविधा नहीं दी जाती है। कुछ एंबुलेंस की स्थिति ठीक न होने के कारण यात्रा भी असुरक्षित रहती है। इसके बावजूद तीमारदारों को महंगे किराया अदाकर इन एंबुलेंस से मरीजों को ले जाना पड़ रहा है।
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चालक एवं स्टॉफ का ब्योरा नहीं
निजी क्षेत्र के एंबुलेंस को संचालित करने के लिए नियमित चालक नहीं होते हैं। आवश्यकता पड़ने पर किसी भी वाहन चालक को एंबुलेंस की स्टेयरिंग थमा दी जा रही है। इनके पास मरीज की देखभाल एवं उपचार में आवश्यक मदद पहुंचाने का कोई अनुभव नहीं होता है। इसके अलावा प्राइवेट एंबुलेंस चालकों का कोई विवरण स्वास्थ्य एवं पंजीयन विभाग में उपलब्ध नहीं रहता है। इस वजह से मरीज और तीमारदारों के साथ अप्रिय घटनाएं भी हो रही हैं।
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मरीज माफिया के इशारे पर किया जा रहा गुमराह
निजी क्षेत्र के कुछ एंबुलेंस यहां से लेकर लखनऊ और गोरखपुर तक मरीज माफिया के इशारे पर संचालित हो रहे हैं। गंभीर मरीजों को लखनऊ ले जाने के बहाने बैठाते हैं और कुछ ही दूर निकलने के बाद चालक तीमारदारों को भरोसे में लेकर अमुक अस्पताल में भर्ती कराने की सलाह देते हैं। बात बन गई तो आसपास के सेटिंग के अस्पतालों में मरीज ले जाकर पहुंचा देते हैं। इस दौरान बेहतर इलाज का झांसा देकर अच्छी खासी बीलिंग तैयार होने लगती है। इसमें एंबुलेंस चालक का भी कमीशन सेट रहता है। कुछ निजी अस्पतालों के एंबुलेंस भी सेटिंग पर चल रहे हैं। यदि मरीज संबंधित अस्पताल के नियंत्रण में नहीं है तो उसे लखनऊ या गोरखपुर के सेटिंग के निजी अस्पताल खुद के एंबुलेंस से भेज दिया जा रहा है। इसमें महंगा किराया के अलावा संबंधित अस्पताल से कमीशन भी मिल रहा है। इस पैटर्न पर निजी क्षेत्र के अधिकतर एंबुलेंस चल रहे हैं।
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ऐसे लेते हैं चार्ज
निजी एंबुलेंस दूरी के हिसाब से अलग-अलग चार्ज निर्धारित करते हैं। बस्ती से लखनऊ तक मरीज को पहुंचाने के लिए नान एसी एंबुलेंस में ऑक्सीजन के साथ 6 से 7 हजार रुपये लिए जा रहे हैं। एसी एंबुलेंस का किराया 8 हजार रुपये है। वहीं गोरखपुर के लिए नान एसी एंबुलेंस का 3500 से 4000 रुपये तक किराया है। इस बीच यदि तीमारदार बहकावे में आ गए तो और बात और बन जाती है, उन्हें सेटिंग के अस्पताल में पहुंचाने पर कमीशन अलग से बन जाता है।
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नहीं मिल पा रहा सरकारी एंबुलेंस
जिला अस्पताल एवं ओपेक चिकित्सालय कैली से मरीज को लखनऊ या गोरखपुर मेडिकल कॉलेज रेफर होने पर सरकारी एंबुलेंस नहीं मिल पाता है। तीमारदार 102 या 108 सेवा पर फोन करते हैं। पहले बात सेंट्रल कार्यालय में होती है। वहां से मरीज का विवरण पूछा जाता है। जैसे बस्ती से लखनऊ मेडिकल कॉलेज ले जाने की बात कही जाती है, उधर से नजदीक के मेडिकल कॉलेज में पहुंचाने का उत्तर आता है। तीमारदार के आग्रह के बाद रेफर करने वाले डॉक्टर की सहमति मांगी जाती है। जब डॉक्टर कॉल पर सहमति देते हैं, तभी एंबुलेंस मिल पाता है। अक्सर डॉक्टर इस प्रक्रिया से बचते हैं। इसलिए लोग परेशान होते हैं।
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केस- एक
हाल की घटना है सिद्धार्थनगर की एक महिला अपने बीमार पति को एंबुलेंस से लेकर लखनऊ से घर के लिए चली। एंबुलेंस चालक और हेल्पर ने महिला को ड्राइवर केबिन में बैठा लिया। हाईवे पर महिला के साथ अश्लील हरकतें हुईं। महिला ने शोर मचाया तो रात के समय जिले के छावनी थाना क्षेत्र के पौधशाला के पास एंबुलेंस चालक और हेल्पर ने महिला के बीमार पति को निकालकर बाहर जमीन पर रख दिया और दोनों बीच रास्ते में छोड़कर भाग निकले। एंबुलेंस चालक का यह अमानवीय कृत्य सुर्खियों में हैं।
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केस- दो
छह माह पहले ओपेक चिकित्सालय कैली से रेफर एक महिला मरीज को प्राइवेट एंबुलेंस चालक ने कोतवाली क्षेत्र के जामडीह स्थित सेटिंग के एक निजी अस्पताल में लाकर भर्ती करा दिया। जहां महिला की इलाज के दौरान मौत हो गई थी। परिजनों ने हंगामा किया तो अस्पताल संचालक के खिलाफ केस तक दर्ज हुआ था।
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कोट
रेफर मरीजों को आवश्यकता पड़ने पर ही लखनऊ या गोरखपुर ले जाने की सलाह दी जाती है। जरूरत के हिसाब से संबंधित डॉक्टर एंबुलेंस कॉल पर अपनी सहमति देते हैं। जहां तक प्राइवेट एंबुलेंस की बात है तो इनकी जांच कराई जाएगी।
-डॉ. आरएस दुबे, सीएमओ
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स्टॉफ का सटीक ब्योरा तक नहीं, तीमारदारों से मुंहमांगा वसूल रहे किराया
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। मरीजों के साथ दुश्वारियां सिर्फ इलाज की नहीं हैं, बल्कि एक अस्पताल से दूसरे तक पहुंचाना भी चुनौतीपूर्ण है। रेफर होने के बाद सरकारी एंबुलेंस आसानी से उपलब्ध नहीं होते हैं। लोकल स्तर पर यह मिल जाते हैं, लेकिन लखनऊ या गोरखपुर के लिए सरकारी एंबुलेंस लंबी प्रक्रिया के बाद मिलते हैं। यह सामान्य लोगों के लिए संभव नहीं है। विवशता में लोग प्राइवेट एंबुलेंस का सहारा लेते हैं। मगर, यहां समस्या और बढ़ जाती है। मुंहमांगा किराया देना पड़ता है और असुरक्षित यात्रा करनी पड़ती है।
जिले में तीन तरह के एंबुलेंस चल रहे हैं। एक सरकारी सेवा 108 और 102 हैं। इसके अलावा एडवांस लाइफ सिक्योरिटी वाले भी चार सरकारी एंबुलेंस हैं। परिवहन विभाग में कुल पंजीकृत एंबुलेंस की संख्या 146 हैं। इनमें 108 और 102 सेवा की 73 एंबुलेंस भी शामिल हैं। जबकि चार एएलएस हैं। 10 से 12 की संख्या में विभाग के अपने एंबुलेंस भी हैं। 50 से अधिक एंबुलेंस निजी क्षेत्र के सक्रिय हैं।
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लखनऊ एवं गोरखपुर के लिए सरकारी एंबुलेंस तत्काल न उपलब्ध होने के कारण लोग निजी क्षेत्र के एंबुलेंस का सहारा ले रहे हैं। रेफर मरीज को पहुंचाने के नाम पर बड़ा खेल होता है। मरीज माफिया के नेटवर्क से जुड़े इन निजी क्षेत्रों के एंबुलेंस में चालक और केयर टेकर प्रशिक्षित नहीं रहते हैं। मरीज को आवश्यकता पड़ने पर इनके द्वारा प्राथमिक उपचार तक की सुविधा नहीं दी जाती है। कुछ एंबुलेंस की स्थिति ठीक न होने के कारण यात्रा भी असुरक्षित रहती है। इसके बावजूद तीमारदारों को महंगे किराया अदाकर इन एंबुलेंस से मरीजों को ले जाना पड़ रहा है।
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चालक एवं स्टॉफ का ब्योरा नहीं
निजी क्षेत्र के एंबुलेंस को संचालित करने के लिए नियमित चालक नहीं होते हैं। आवश्यकता पड़ने पर किसी भी वाहन चालक को एंबुलेंस की स्टेयरिंग थमा दी जा रही है। इनके पास मरीज की देखभाल एवं उपचार में आवश्यक मदद पहुंचाने का कोई अनुभव नहीं होता है। इसके अलावा प्राइवेट एंबुलेंस चालकों का कोई विवरण स्वास्थ्य एवं पंजीयन विभाग में उपलब्ध नहीं रहता है। इस वजह से मरीज और तीमारदारों के साथ अप्रिय घटनाएं भी हो रही हैं।
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मरीज माफिया के इशारे पर किया जा रहा गुमराह
निजी क्षेत्र के कुछ एंबुलेंस यहां से लेकर लखनऊ और गोरखपुर तक मरीज माफिया के इशारे पर संचालित हो रहे हैं। गंभीर मरीजों को लखनऊ ले जाने के बहाने बैठाते हैं और कुछ ही दूर निकलने के बाद चालक तीमारदारों को भरोसे में लेकर अमुक अस्पताल में भर्ती कराने की सलाह देते हैं। बात बन गई तो आसपास के सेटिंग के अस्पतालों में मरीज ले जाकर पहुंचा देते हैं। इस दौरान बेहतर इलाज का झांसा देकर अच्छी खासी बीलिंग तैयार होने लगती है। इसमें एंबुलेंस चालक का भी कमीशन सेट रहता है। कुछ निजी अस्पतालों के एंबुलेंस भी सेटिंग पर चल रहे हैं। यदि मरीज संबंधित अस्पताल के नियंत्रण में नहीं है तो उसे लखनऊ या गोरखपुर के सेटिंग के निजी अस्पताल खुद के एंबुलेंस से भेज दिया जा रहा है। इसमें महंगा किराया के अलावा संबंधित अस्पताल से कमीशन भी मिल रहा है। इस पैटर्न पर निजी क्षेत्र के अधिकतर एंबुलेंस चल रहे हैं।
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ऐसे लेते हैं चार्ज
निजी एंबुलेंस दूरी के हिसाब से अलग-अलग चार्ज निर्धारित करते हैं। बस्ती से लखनऊ तक मरीज को पहुंचाने के लिए नान एसी एंबुलेंस में ऑक्सीजन के साथ 6 से 7 हजार रुपये लिए जा रहे हैं। एसी एंबुलेंस का किराया 8 हजार रुपये है। वहीं गोरखपुर के लिए नान एसी एंबुलेंस का 3500 से 4000 रुपये तक किराया है। इस बीच यदि तीमारदार बहकावे में आ गए तो और बात और बन जाती है, उन्हें सेटिंग के अस्पताल में पहुंचाने पर कमीशन अलग से बन जाता है।
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नहीं मिल पा रहा सरकारी एंबुलेंस
जिला अस्पताल एवं ओपेक चिकित्सालय कैली से मरीज को लखनऊ या गोरखपुर मेडिकल कॉलेज रेफर होने पर सरकारी एंबुलेंस नहीं मिल पाता है। तीमारदार 102 या 108 सेवा पर फोन करते हैं। पहले बात सेंट्रल कार्यालय में होती है। वहां से मरीज का विवरण पूछा जाता है। जैसे बस्ती से लखनऊ मेडिकल कॉलेज ले जाने की बात कही जाती है, उधर से नजदीक के मेडिकल कॉलेज में पहुंचाने का उत्तर आता है। तीमारदार के आग्रह के बाद रेफर करने वाले डॉक्टर की सहमति मांगी जाती है। जब डॉक्टर कॉल पर सहमति देते हैं, तभी एंबुलेंस मिल पाता है। अक्सर डॉक्टर इस प्रक्रिया से बचते हैं। इसलिए लोग परेशान होते हैं।
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केस- एक
हाल की घटना है सिद्धार्थनगर की एक महिला अपने बीमार पति को एंबुलेंस से लेकर लखनऊ से घर के लिए चली। एंबुलेंस चालक और हेल्पर ने महिला को ड्राइवर केबिन में बैठा लिया। हाईवे पर महिला के साथ अश्लील हरकतें हुईं। महिला ने शोर मचाया तो रात के समय जिले के छावनी थाना क्षेत्र के पौधशाला के पास एंबुलेंस चालक और हेल्पर ने महिला के बीमार पति को निकालकर बाहर जमीन पर रख दिया और दोनों बीच रास्ते में छोड़कर भाग निकले। एंबुलेंस चालक का यह अमानवीय कृत्य सुर्खियों में हैं।
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केस- दो
छह माह पहले ओपेक चिकित्सालय कैली से रेफर एक महिला मरीज को प्राइवेट एंबुलेंस चालक ने कोतवाली क्षेत्र के जामडीह स्थित सेटिंग के एक निजी अस्पताल में लाकर भर्ती करा दिया। जहां महिला की इलाज के दौरान मौत हो गई थी। परिजनों ने हंगामा किया तो अस्पताल संचालक के खिलाफ केस तक दर्ज हुआ था।
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कोट
रेफर मरीजों को आवश्यकता पड़ने पर ही लखनऊ या गोरखपुर ले जाने की सलाह दी जाती है। जरूरत के हिसाब से संबंधित डॉक्टर एंबुलेंस कॉल पर अपनी सहमति देते हैं। जहां तक प्राइवेट एंबुलेंस की बात है तो इनकी जांच कराई जाएगी।
-डॉ. आरएस दुबे, सीएमओ