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ग्राम प्रधान बेटियों को सिखा रहीं स्वावलंबी बनने का हुनर
Mon, 14 Jan 2019 11:20 PM IST
राकेश पांडेय
basti
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Published by: राकेश पांडेय
Updated Mon, 14 Jan 2019 11:20 PM IST
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स्कूल में छुट्टी होने के बाद बच्चों को पढ़ातीं प्रधान अर्चना वर्मा।
- फोटो : amar ujala
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भानपुर। रामनगर ब्लॉक के सीमावर्ती गांव खाजेपुर की ग्राम प्रधान अर्चना वर्मा अपने कार्यों से एक मिसाल पेश कर रही हैं। वह गांव की बेटियों को पढ़ाने के साथ ही साथ उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होकर स्वावलंबी बनने का हुनर भी सिखा रही हैं।
ग्राम प्रधान इसके लिए घर-परिवार से समय निकालती हैं। गांव में प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय है। इसमें छुट्टी होने के बाद कक्षाएं चलाती हैं। जहां स्कूल आने वाली और जो किन्हीं कारणों से स्कूल नहीं जातीं उन्हें किताबी ज्ञान के साथ ही सिलाई-कढ़ाई, मेहंदी लगाना, घर में बेकार कपड़ों से उपयोगी चीजें बनाने का हुनर सिखा रही हैं। समाज शास्त्र से परास्नातक अर्चना कहती हैं कि किसी भी व्यक्ति के शिक्षा का महत्व तभी है जब वह लोगों का भला कर समाज को एक सार्थक दिशा दे सके। बताया कि यह कार्य पिछले एक साल से करती आ रही हैं। बताया कि गांव की बच्चियों में भी प्रतिभा है जरूरत है तो सिर्फ उन्हें निखारने की। अगर कुछ बच्चियां ही इस शिक्षा और प्रशिक्षण से अपने पैर पर खड़ी होकर परिवार को सुदृढ़ कर लेंगी तो मेरी सेवा सार्थक हो जाएगी। अर्चना बताती हैं कि पहले तो इस काम का तमाम विरोध झेलना पड़ा लेकिन बाद में सभी का सहयोग मिलने लगा। पति दिलीप चौधरी भी हर मदद को तैयार रहते हैं। कहा कि इसकी प्रेरणा उन्हें अपनी मां ममता वर्मा से मिली है। मायके में पढ़ा-लिखा माहौल होने के नाते वह भी दूसरों की सेवा में हमेशा लगी रहती थीं। कहा कि इसके लिए गांव की पूजा चौधरी और मंजू गुप्ता का भी सहयोग लेती हैं। वह खुद एक बेटी और महिला हैं। गांव के माहौल में बेटियों को कैसी परेशानी झेलनी पड़ती है कैसे उसमें रहा जा सकता है। इस पर भी चर्चा की जाती है।
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ग्राम प्रधान इसके लिए घर-परिवार से समय निकालती हैं। गांव में प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय है। इसमें छुट्टी होने के बाद कक्षाएं चलाती हैं। जहां स्कूल आने वाली और जो किन्हीं कारणों से स्कूल नहीं जातीं उन्हें किताबी ज्ञान के साथ ही सिलाई-कढ़ाई, मेहंदी लगाना, घर में बेकार कपड़ों से उपयोगी चीजें बनाने का हुनर सिखा रही हैं। समाज शास्त्र से परास्नातक अर्चना कहती हैं कि किसी भी व्यक्ति के शिक्षा का महत्व तभी है जब वह लोगों का भला कर समाज को एक सार्थक दिशा दे सके। बताया कि यह कार्य पिछले एक साल से करती आ रही हैं। बताया कि गांव की बच्चियों में भी प्रतिभा है जरूरत है तो सिर्फ उन्हें निखारने की। अगर कुछ बच्चियां ही इस शिक्षा और प्रशिक्षण से अपने पैर पर खड़ी होकर परिवार को सुदृढ़ कर लेंगी तो मेरी सेवा सार्थक हो जाएगी। अर्चना बताती हैं कि पहले तो इस काम का तमाम विरोध झेलना पड़ा लेकिन बाद में सभी का सहयोग मिलने लगा। पति दिलीप चौधरी भी हर मदद को तैयार रहते हैं। कहा कि इसकी प्रेरणा उन्हें अपनी मां ममता वर्मा से मिली है। मायके में पढ़ा-लिखा माहौल होने के नाते वह भी दूसरों की सेवा में हमेशा लगी रहती थीं। कहा कि इसके लिए गांव की पूजा चौधरी और मंजू गुप्ता का भी सहयोग लेती हैं। वह खुद एक बेटी और महिला हैं। गांव के माहौल में बेटियों को कैसी परेशानी झेलनी पड़ती है कैसे उसमें रहा जा सकता है। इस पर भी चर्चा की जाती है।
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