{"_id":"696d38111c50acd1830905a9","slug":"nursing-homes-operating-in-narrow-streets-are-breaking-standards-basti-news-c-207-1-bst1005-151503-2026-01-19","type":"story","status":"publish","title_hn":"Basti News: संकरी गलियों में संचालित नर्सिंग होम में मानक तोड़ रहा दम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Basti News: संकरी गलियों में संचालित नर्सिंग होम में मानक तोड़ रहा दम
विज्ञापन
मालवीय रोड पर कुछ इस तरह से संचालित हो रहे हैं अस्पताल संवाद
- फोटो : महिलाओं को जागरूक करती महिला आरक्षी।
बस्ती। जिले में अस्पताल के नाम पर लोगों के जीवन से खिलवाड़ किया जा रहा है। मानक को ताक पर रखकर संकरी गलियों और छोटे घरों में नर्सिंग होम खोल लिए हैं। यहां आपातकाल में सुरक्षा और बचाव के कोई इंतजाम नहीं है। आग की घटना होने पर बचाव के इंतजाम में रैंप, आग बुझाने के लिए उपकरण और पानी का टैंक तक नहीं बने हैं। इसके बावजूद भी इन अस्पतालों को लाइसेंस जारी कर दिए हैं।
स्वास्थ्य विभाग में करीब 300 चिकित्सकीय संस्थान पंजीकृत हैं, जिनमें 190 के करीब नर्सिंग होम/अस्पताल हैं। सूत्रों के अनुसार, इनमें से करीब 15 से 20 फीसदी अस्पताल घरों में चल रहे हैं। मालवीय रोड, पचपेड़िया रोड, आवास विकास कॉलोनी, कैली रोड, जिला अस्पताल और महिला अस्पताल समेत टीबी अस्पताल व दक्षिण दरवाजा स्टेशन रोड पर यह समस्या अधिक है। इनमें चिकित्सकीय मानकों के हिसाब से इमारत नहीं बनी है। आवासीय भवनों में ही अधिकांश निजी अस्पताल चल रहे हैं। इनमें आईसीयू और एनआईसीयू भी संचालित हो रहे हैं।
जानकारों ने बताया कि दूसरी-तीसरी मंजिल पर मरीज भर्ती हैं लेकिन उनके लिए रैंप तक नहीं बनी है। अस्पताल में स्मॉक डिटेक्टर, अतिरिक्त निकास मार्ग तक नहीं है। अस्पतालों में आग बुझाने के लिए पानी का टैंक भी नहीं बनाया है। फायर फाइटिंग सिस्टम भी नहीं लगे हैं। आग बुझाने के नाम पर सिलिंडर रखकर औपचारिकता की जा रही है। इससे यहां आग की घटना होने पर मरीजों की जान का खतरा बना हुआ है।
विज्ञापन
ये अस्पताल सिर्फ जुगाड़ पर पंजीकृत होकर मरीजों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। सकरी गली और सकरे भवन में जानवरों की तरह ही मरीज भर्ती किए जा रहे हैं। ऐसे में घटना के समय अफरा-तफरी जैसी स्थिति का होना तय है। बताया गया कि पहले डॉक्टर अपना आवास बनाते हैं, फिर उसमें में अस्पताल खोल ले रहे हैं।
-- -
इलाज भी बन गया है धंधा, भूसे की तरह भरे रहते हैं मरीज
इलाज भी अब धंधा बन गया है। न कोई मानक न कोई डिग्री। कहीं लोग डॉक्टर बन गए हैं तो कहीं बगैर पंजीयन और मानक विहीन अस्पताल संचालित कर रहे हैं। एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, खून जांच तक में भी डिग्री धारकों से आगे होकर धंधेबाज कदमताल कर रहे हैं। विभाग इस धंधे पर अंकुश नहीं लगा पा रहा है। मरीज जान खतरे में डालकर ऐसे अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं, जहां रास्ता और इमरजेंसी द्वार तक नहीं है। भूसे की तरह मरीज भरे हैं। पार्किंग सुविधा नहीं है। फुटपाथ को पार्किंग बना लिए हैं। कई अस्पताल सकरी गलियों में चल रहे, जहां इमरजेंसी में एंबुलेंस व वाहन नहीं पहुंच पाते, लेकिन कथित दलाल वहां मरीज जरूर पहुंचाकर अपना जेब गरम कर रहे हैं।
-- -
15 मीटर से कम ऊंचाई वाले भवनों में संचालित अस्पतालों के मानक
पहुंच मार्ग : अस्पताल में 6 मीटर का रास्ता हो, जिससे अग्निशमन वाहन आसानी से पहुंच सके।
निकास मार्ग : 1.2 मीटर की चौड़ाई का अतिरिक्त निकास मार्ग होना चाहिए, जिससे आपात स्थिति में उतर सकें।
धुएं का प्रबंधन : धुएं में दम घुटने से ज्यादा मौत होती हैं, ऐेसे में प्राकृतिक वेंटिलेशन और धुएं को निकालने के लिए एग्जॉस्ट सिस्टम होने चाहिए।
पानी का टैंक : अस्पताल में 75 हजार लीटर पानी की क्षमता का टैंक होना चाहिए। इसे भूमिगत-छत पर बना सकते हैं।
स्प्रिंकलर सिस्टम : अस्पतालों में स्प्रिंकलर सिस्टम भी नहीं लगे हैं कि आग पर पानी की बौछार कर बुझा दें।
-- -
टीम बनाकर अस्पतालों में कराएंगे ऑडिट
सीएमओ डॉ. राजीव निगम ने बताया कि अस्पतालों में अग्निशमन विभाग की एनओसी, उपकरण और आईसीयू में चिकित्सकीय मानकों की जांच के लिए टीम बनाई जाएगी। जो भवन अस्पताल के मानक पर नहीं पाए जाएंगे, उन्हें नोटिस देकर उनका पंजीयन निलंबित किया जाएगा। उसके बाद भी सुधार न होने पर लाइसेंस निरस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। मरीजों के जीवन के साथ खिलवाड़ कोई भी अस्पताल संचालक नहीं कर सकता।
-- -
अस्पताल बदलते ही बदल देते हैं विशेषज्ञता
मेडिकल के क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवा के नाम लंबा झोल है। प्रतिष्ठित नर्सिंग होम में कुछ दिनों तक डॉक्टर और फार्मासिस्ट के सहायक के तौर काम करने वालों का हाल भी अजब-गजब है। अस्पताल में डॉक्टर जुड़ते हैं लेकिन, जब वहां से छोड़ते हैं और दूसरे अस्पताल में पहुंचते हैं तो विशेषज्ञता भी बदल जाती है। एमबीबीएस डिग्री वाले डॉक्टर न्यूरोलॉजिस्ट, यूरोलॉजिस्ट बने बैठे हैं। यह देखना है तो मालवीय रोड पर एक चर्चित अस्पताल पर दिख जाएगा। यहां भाड़े पर डॉक्टर बुलाकर उनका नाम बोर्ड पर लिखवा दिया गया है।
-- -
बिना डॉक्टर के हो रहा अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे
कारोबार बढ़ते ही छदम किस्म के अस्पतालों में जांच की भी व्यवस्था बनाई जा रही है। मशीनों की उपलब्धता सुनिश्चित कर जांच अयोग्य लोग कर रहे हैं। ऐसे सेंटर भी कई बार पकड़ में आए हैं। जिला महिला चिकित्सालय के सामने, जिला अस्पताल और कैली रोड पर बिना योग्य डॉक्टर के अस्पताल संचालित पाए जा चुके हैं। यह तो बानगी मात्र जिले के अधिकांश निजी नर्सिंग होम में अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे और खून जांच की व्यवस्था बिना चिकित्सक के संचालित हो रही है। कार्रवाई से बचने के लिए कुछ संचालकों ने जांच सेंटरों का पंजीकरण जरूर करवाया है लेकिन संबंधित चिकित्सक मौके पर मौजूद नहीं मिलते हैं।
-- -
स्थायी तौर पर नहीं हैं एनेथिसिया
बड़े-बड़े प्रतिष्ठित निजी नर्सिंग होम हो या घर दुकान में चलाए जा रहे अस्पताल हर जगह ऑपरेशन कराने वाले मरीजों को भर्ती कर उपचार किया जा रहा है लेकिन अधिकांश निजी अस्पतालों में बेहोशी के डॉक्टर (एनेथिसिया) स्थायी रूप से नहीं है। इसकी व्यवस्था अस्थायी तौर पर की जाती है, जबकि बेहोशी के डॉक्टर के बगैर ऑपरेशन संभव नहीं होता है। सर्जरी कराने वाले अस्पताल में बेहोशी के नियमित चिकित्सकों की पड़ताल नहीं होती है।
-- -
ऐसे हो रहा चिकित्सकों का इंतजाम
निजी अस्पतालों में सर्जरी एवं बेहोशी के चिकित्सकों को प्रति केस दर निर्धारित करके बुलाया जाता है। इसमें सरकारी चिकित्सक भी शामिल रहते हैं। अस्पताल ड्यूटी के बाद निजी अस्पतालों में उनकी ड्यूटी शाम चार से पांच बजे के बाद शुरू हो जाती है। यह चिकित्सक एक साथ चार से पांच केस इकट्ठा होने पर पहुंचते हैं। जानकारों के मुताबिक प्रति केस बेहोशी के चिकित्सक को ढाई से तीन हजार और सर्जन को आठ से 10 हजार रुपये तत्काल मिलता है। यह धनराशि अस्पताल संचालक मुहैया कराते हैं। मरीज और उनके तीमारदार को यह पता नहीं चल पाता है। विभाग इन तथ्यों की जांच-पड़ताल करने से परहेज करता है।
कोट
निजी अस्पताल, पैथोलॉजी और अल्ट्रासाउंड सेंटरों की जांच लगातार कराई जा रही है। जहां चिकित्सक और पंजीकरण नहीं मिल रहा है उन्हें नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा जा रहा है। जिन अस्पतालों के पास पार्किंग, मानक पर भवन नहीं है ऐसे अस्पतालों की जांच कर उनका पंजीयन निरस्त कराया जाएगा।
-डॉ. राजीव निगम, सीएमओ, बस्ती।
विज्ञापन
स्वास्थ्य विभाग में करीब 300 चिकित्सकीय संस्थान पंजीकृत हैं, जिनमें 190 के करीब नर्सिंग होम/अस्पताल हैं। सूत्रों के अनुसार, इनमें से करीब 15 से 20 फीसदी अस्पताल घरों में चल रहे हैं। मालवीय रोड, पचपेड़िया रोड, आवास विकास कॉलोनी, कैली रोड, जिला अस्पताल और महिला अस्पताल समेत टीबी अस्पताल व दक्षिण दरवाजा स्टेशन रोड पर यह समस्या अधिक है। इनमें चिकित्सकीय मानकों के हिसाब से इमारत नहीं बनी है। आवासीय भवनों में ही अधिकांश निजी अस्पताल चल रहे हैं। इनमें आईसीयू और एनआईसीयू भी संचालित हो रहे हैं।
विज्ञापन
जानकारों ने बताया कि दूसरी-तीसरी मंजिल पर मरीज भर्ती हैं लेकिन उनके लिए रैंप तक नहीं बनी है। अस्पताल में स्मॉक डिटेक्टर, अतिरिक्त निकास मार्ग तक नहीं है। अस्पतालों में आग बुझाने के लिए पानी का टैंक भी नहीं बनाया है। फायर फाइटिंग सिस्टम भी नहीं लगे हैं। आग बुझाने के नाम पर सिलिंडर रखकर औपचारिकता की जा रही है। इससे यहां आग की घटना होने पर मरीजों की जान का खतरा बना हुआ है।
विज्ञापन
ये अस्पताल सिर्फ जुगाड़ पर पंजीकृत होकर मरीजों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। सकरी गली और सकरे भवन में जानवरों की तरह ही मरीज भर्ती किए जा रहे हैं। ऐसे में घटना के समय अफरा-तफरी जैसी स्थिति का होना तय है। बताया गया कि पहले डॉक्टर अपना आवास बनाते हैं, फिर उसमें में अस्पताल खोल ले रहे हैं।
इलाज भी बन गया है धंधा, भूसे की तरह भरे रहते हैं मरीज
इलाज भी अब धंधा बन गया है। न कोई मानक न कोई डिग्री। कहीं लोग डॉक्टर बन गए हैं तो कहीं बगैर पंजीयन और मानक विहीन अस्पताल संचालित कर रहे हैं। एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, खून जांच तक में भी डिग्री धारकों से आगे होकर धंधेबाज कदमताल कर रहे हैं। विभाग इस धंधे पर अंकुश नहीं लगा पा रहा है। मरीज जान खतरे में डालकर ऐसे अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं, जहां रास्ता और इमरजेंसी द्वार तक नहीं है। भूसे की तरह मरीज भरे हैं। पार्किंग सुविधा नहीं है। फुटपाथ को पार्किंग बना लिए हैं। कई अस्पताल सकरी गलियों में चल रहे, जहां इमरजेंसी में एंबुलेंस व वाहन नहीं पहुंच पाते, लेकिन कथित दलाल वहां मरीज जरूर पहुंचाकर अपना जेब गरम कर रहे हैं।
15 मीटर से कम ऊंचाई वाले भवनों में संचालित अस्पतालों के मानक
पहुंच मार्ग : अस्पताल में 6 मीटर का रास्ता हो, जिससे अग्निशमन वाहन आसानी से पहुंच सके।
निकास मार्ग : 1.2 मीटर की चौड़ाई का अतिरिक्त निकास मार्ग होना चाहिए, जिससे आपात स्थिति में उतर सकें।
धुएं का प्रबंधन : धुएं में दम घुटने से ज्यादा मौत होती हैं, ऐेसे में प्राकृतिक वेंटिलेशन और धुएं को निकालने के लिए एग्जॉस्ट सिस्टम होने चाहिए।
पानी का टैंक : अस्पताल में 75 हजार लीटर पानी की क्षमता का टैंक होना चाहिए। इसे भूमिगत-छत पर बना सकते हैं।
स्प्रिंकलर सिस्टम : अस्पतालों में स्प्रिंकलर सिस्टम भी नहीं लगे हैं कि आग पर पानी की बौछार कर बुझा दें।
टीम बनाकर अस्पतालों में कराएंगे ऑडिट
सीएमओ डॉ. राजीव निगम ने बताया कि अस्पतालों में अग्निशमन विभाग की एनओसी, उपकरण और आईसीयू में चिकित्सकीय मानकों की जांच के लिए टीम बनाई जाएगी। जो भवन अस्पताल के मानक पर नहीं पाए जाएंगे, उन्हें नोटिस देकर उनका पंजीयन निलंबित किया जाएगा। उसके बाद भी सुधार न होने पर लाइसेंस निरस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। मरीजों के जीवन के साथ खिलवाड़ कोई भी अस्पताल संचालक नहीं कर सकता।
अस्पताल बदलते ही बदल देते हैं विशेषज्ञता
मेडिकल के क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवा के नाम लंबा झोल है। प्रतिष्ठित नर्सिंग होम में कुछ दिनों तक डॉक्टर और फार्मासिस्ट के सहायक के तौर काम करने वालों का हाल भी अजब-गजब है। अस्पताल में डॉक्टर जुड़ते हैं लेकिन, जब वहां से छोड़ते हैं और दूसरे अस्पताल में पहुंचते हैं तो विशेषज्ञता भी बदल जाती है। एमबीबीएस डिग्री वाले डॉक्टर न्यूरोलॉजिस्ट, यूरोलॉजिस्ट बने बैठे हैं। यह देखना है तो मालवीय रोड पर एक चर्चित अस्पताल पर दिख जाएगा। यहां भाड़े पर डॉक्टर बुलाकर उनका नाम बोर्ड पर लिखवा दिया गया है।
बिना डॉक्टर के हो रहा अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे
कारोबार बढ़ते ही छदम किस्म के अस्पतालों में जांच की भी व्यवस्था बनाई जा रही है। मशीनों की उपलब्धता सुनिश्चित कर जांच अयोग्य लोग कर रहे हैं। ऐसे सेंटर भी कई बार पकड़ में आए हैं। जिला महिला चिकित्सालय के सामने, जिला अस्पताल और कैली रोड पर बिना योग्य डॉक्टर के अस्पताल संचालित पाए जा चुके हैं। यह तो बानगी मात्र जिले के अधिकांश निजी नर्सिंग होम में अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे और खून जांच की व्यवस्था बिना चिकित्सक के संचालित हो रही है। कार्रवाई से बचने के लिए कुछ संचालकों ने जांच सेंटरों का पंजीकरण जरूर करवाया है लेकिन संबंधित चिकित्सक मौके पर मौजूद नहीं मिलते हैं।
स्थायी तौर पर नहीं हैं एनेथिसिया
बड़े-बड़े प्रतिष्ठित निजी नर्सिंग होम हो या घर दुकान में चलाए जा रहे अस्पताल हर जगह ऑपरेशन कराने वाले मरीजों को भर्ती कर उपचार किया जा रहा है लेकिन अधिकांश निजी अस्पतालों में बेहोशी के डॉक्टर (एनेथिसिया) स्थायी रूप से नहीं है। इसकी व्यवस्था अस्थायी तौर पर की जाती है, जबकि बेहोशी के डॉक्टर के बगैर ऑपरेशन संभव नहीं होता है। सर्जरी कराने वाले अस्पताल में बेहोशी के नियमित चिकित्सकों की पड़ताल नहीं होती है।
ऐसे हो रहा चिकित्सकों का इंतजाम
निजी अस्पतालों में सर्जरी एवं बेहोशी के चिकित्सकों को प्रति केस दर निर्धारित करके बुलाया जाता है। इसमें सरकारी चिकित्सक भी शामिल रहते हैं। अस्पताल ड्यूटी के बाद निजी अस्पतालों में उनकी ड्यूटी शाम चार से पांच बजे के बाद शुरू हो जाती है। यह चिकित्सक एक साथ चार से पांच केस इकट्ठा होने पर पहुंचते हैं। जानकारों के मुताबिक प्रति केस बेहोशी के चिकित्सक को ढाई से तीन हजार और सर्जन को आठ से 10 हजार रुपये तत्काल मिलता है। यह धनराशि अस्पताल संचालक मुहैया कराते हैं। मरीज और उनके तीमारदार को यह पता नहीं चल पाता है। विभाग इन तथ्यों की जांच-पड़ताल करने से परहेज करता है।
कोट
निजी अस्पताल, पैथोलॉजी और अल्ट्रासाउंड सेंटरों की जांच लगातार कराई जा रही है। जहां चिकित्सक और पंजीकरण नहीं मिल रहा है उन्हें नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा जा रहा है। जिन अस्पतालों के पास पार्किंग, मानक पर भवन नहीं है ऐसे अस्पतालों की जांच कर उनका पंजीयन निरस्त कराया जाएगा।
-डॉ. राजीव निगम, सीएमओ, बस्ती।