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पुलिस की पकड़ से दूर साइबर अपराधी
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पुलिस की पकड़ से दूर साइबर अपराधी
बस्ती। पिछले तीन महीने में साइबर क्राइम के नौ मामलों में पुलिस की साइबर टीम को कामयाबी मिली। लेकिन, किसी में भी अपराधी नहीं पकड़ा गया। सभी में सिर्फ फ्रॉड की गई रकम वापस हो पाई।
जानकारों का कहना है कि साइबर अपराधियों के हौसले इसलिए और भी ज्यादा बुलंद हैं। क्योंकि वे आसानी से पुलिस की गिरफ्त में नहीं आते। ज्यादातर मामलों में वे पुलिस की पहुंच से काफी दूर होते हैं। जिसके कारण उन तक पुलिस पहुंच नहीं पाती। हालांकि साइबर सेल शिकायत मिलने पर ज्यादातर मामलों में रकम वापस कराने में कामयाब हो जाती है, लेकिन अपराधी बच निकलता है। एसपी आशीष श्रीवास्तव का कहना है कि ऐसे मामलों में लोग सिर्फ शिकायती पत्र देते हैं। उनसे सिर्फ अपनी रकम वापस मिलने भर से मतलब होता है। यदि वे मुकदमा दर्ज कराते तो पुलिस अपराधियों को गिरफ्तार करती। वहीं, शिकायत कर्ताओं का कहना है कि पुलिस उन्हें समझाती है कि रकम वापस मिल जाए तो मुकदमा दर्ज कराने का क्या फायदा होगा। दरअसल इस तरह का अपराध करने वाला या तो बहुत दूर बैठा होता है या पुलिस पकड़ने के लिए प्रयास करने से बचती है।
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इन तरीकों से चपत लगाते हैं साइबर अपराधी
एटीएम का पिन पता करके या उसका क्लोन बनाकर, बातों में उलझाकर चार अंकों का कोड पूछकर, लाटरी या इनाम जीतने के बहाने आदि करके साइबर अपराधी लोगों को चूना लगाते आ रहे हैं। ऐसे मामलों में जानकारी होने पर संबंधित व्यक्ति पुलिस अधिकारी के पास प्रार्थनापत्र लेकर पहुंचता है। अधिकारी वह प्रार्थनापत्र साइबर सेल को संदर्भित कर देते हैं। जिसके बाद साइबर सेल अपने तरीकों से छानबीन करता है। उच्च तकनीकी इस्तेमाल करके संबंधित फ्राड करने वाले व्यक्ति का खाता फ्रीज करवाकर रकम वापस ठगी किए गए खाते में मंगवा लिया जाता है। अमूमन अपने रुपये वापस पाकर लोग निश्चिंत हो जाते हैं।
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गरीबों के खाते का करते हैं इस्तेमाल
साइबर सेल प्रभारी मजहर हुसैन के मुताबिक ऑनलाइन बैंक में खाता खोलने के अलावा ठगी की वारदात को अंजाम देने के लिए साइबर अपराधी गरीबों के बैंक खातों का इस्तेमाल कर रहे हैं। खाताधारक को मालूम ही नहीं होता है कि वो किसी आपराधिक वारदात का हिस्सा बनने जा रहे हैं। साइबर ठगी के अस्सी फीसदी मामले में पुलिस के सामने यही तथ्य सामने आए हैं। उनसे बैंक खाते का पूरा ब्योरा और एटीएम कार्ड हासिल कर लेते हैं। इसके आधार पर नेट बैंकिंग की सुविधा भी वो ले लेते हैं। जबकि खाताधारक को इसकी जानकारी नहीं होती है, उसे केवल इतना बताया जाता है कि कुछ रकम उसके खाते में आएगी, जिसे वो निकाल लेंगे। इसके बदले में खाताधारक को तीन-चार हजार रुपये थमा दिए जाते हैं। ये धनराशि भी उनके खाते में छोड़ दी जाती है।
बरतें सावधानियां
- शिकार होने पर एफआईआर दर्ज कराएं
- सबूत सहेज कर रखें
- संबंधित अथॉरिटी को शिकायत करें
- क्रेडिट कार्ड से निकासी की सीमा रखें
- अनचाहे लिंक्स पर क्लिक न करें
- पिन-पासवर्ड बदलते रहें
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बस्ती। पिछले तीन महीने में साइबर क्राइम के नौ मामलों में पुलिस की साइबर टीम को कामयाबी मिली। लेकिन, किसी में भी अपराधी नहीं पकड़ा गया। सभी में सिर्फ फ्रॉड की गई रकम वापस हो पाई।
जानकारों का कहना है कि साइबर अपराधियों के हौसले इसलिए और भी ज्यादा बुलंद हैं। क्योंकि वे आसानी से पुलिस की गिरफ्त में नहीं आते। ज्यादातर मामलों में वे पुलिस की पहुंच से काफी दूर होते हैं। जिसके कारण उन तक पुलिस पहुंच नहीं पाती। हालांकि साइबर सेल शिकायत मिलने पर ज्यादातर मामलों में रकम वापस कराने में कामयाब हो जाती है, लेकिन अपराधी बच निकलता है। एसपी आशीष श्रीवास्तव का कहना है कि ऐसे मामलों में लोग सिर्फ शिकायती पत्र देते हैं। उनसे सिर्फ अपनी रकम वापस मिलने भर से मतलब होता है। यदि वे मुकदमा दर्ज कराते तो पुलिस अपराधियों को गिरफ्तार करती। वहीं, शिकायत कर्ताओं का कहना है कि पुलिस उन्हें समझाती है कि रकम वापस मिल जाए तो मुकदमा दर्ज कराने का क्या फायदा होगा। दरअसल इस तरह का अपराध करने वाला या तो बहुत दूर बैठा होता है या पुलिस पकड़ने के लिए प्रयास करने से बचती है।
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इन तरीकों से चपत लगाते हैं साइबर अपराधी
एटीएम का पिन पता करके या उसका क्लोन बनाकर, बातों में उलझाकर चार अंकों का कोड पूछकर, लाटरी या इनाम जीतने के बहाने आदि करके साइबर अपराधी लोगों को चूना लगाते आ रहे हैं। ऐसे मामलों में जानकारी होने पर संबंधित व्यक्ति पुलिस अधिकारी के पास प्रार्थनापत्र लेकर पहुंचता है। अधिकारी वह प्रार्थनापत्र साइबर सेल को संदर्भित कर देते हैं। जिसके बाद साइबर सेल अपने तरीकों से छानबीन करता है। उच्च तकनीकी इस्तेमाल करके संबंधित फ्राड करने वाले व्यक्ति का खाता फ्रीज करवाकर रकम वापस ठगी किए गए खाते में मंगवा लिया जाता है। अमूमन अपने रुपये वापस पाकर लोग निश्चिंत हो जाते हैं।
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गरीबों के खाते का करते हैं इस्तेमाल
साइबर सेल प्रभारी मजहर हुसैन के मुताबिक ऑनलाइन बैंक में खाता खोलने के अलावा ठगी की वारदात को अंजाम देने के लिए साइबर अपराधी गरीबों के बैंक खातों का इस्तेमाल कर रहे हैं। खाताधारक को मालूम ही नहीं होता है कि वो किसी आपराधिक वारदात का हिस्सा बनने जा रहे हैं। साइबर ठगी के अस्सी फीसदी मामले में पुलिस के सामने यही तथ्य सामने आए हैं। उनसे बैंक खाते का पूरा ब्योरा और एटीएम कार्ड हासिल कर लेते हैं। इसके आधार पर नेट बैंकिंग की सुविधा भी वो ले लेते हैं। जबकि खाताधारक को इसकी जानकारी नहीं होती है, उसे केवल इतना बताया जाता है कि कुछ रकम उसके खाते में आएगी, जिसे वो निकाल लेंगे। इसके बदले में खाताधारक को तीन-चार हजार रुपये थमा दिए जाते हैं। ये धनराशि भी उनके खाते में छोड़ दी जाती है।
बरतें सावधानियां
- शिकार होने पर एफआईआर दर्ज कराएं
- सबूत सहेज कर रखें
- संबंधित अथॉरिटी को शिकायत करें
- क्रेडिट कार्ड से निकासी की सीमा रखें
- अनचाहे लिंक्स पर क्लिक न करें
- पिन-पासवर्ड बदलते रहें