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Basti News: रेफर के बाद राहत नहीं... बेड-वेंटिलेटर मिलना कठिन
Sat, 14 Sep 2024 12:45 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Sat, 14 Sep 2024 12:45 AM IST
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एंबुलेंस से मरीज को ले जाते हुए।
मरीज के साथ लखनऊ तीमारदार, रिश्तेदारों को लगानी पड़ रही दौड़
बस्ती से हायर मेडिकल सेंटर लखनऊ में जाने वाले गंभीर मरीजों को नहीं मिल रहा त्वरित इलाज
डॉ. राम मनोहर लोहिया मेडिकल संस्थान, केजीएमयू जैसे हायर सेंटर पर दम तोड़ रहे मरीज
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। गंभीर मरीजों को जिले से रेफर होने के बाद राहत तो छोड़िए, नए तरह की चुनौती से आमना-सामना होने लगता है। परिजन किसी तरह रुपये, संसाधन आदि की जुगत कर लखनऊ के हायर शासकीय मेडिकल सेंटरों तक पहुंचा तो जा रहे हैं लेकिन, वहां मुसीबत और बढ़ जा रही है। मरीज को त्वरित इलाज की सुविधा दिलाने के लिए तीमारदार दो-दो दिन तक गिड़गिड़ा रहते हैं। वहां उनकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं है।
लखनऊ के हायर मेडिकल सेंटरों पर जिससे भी मिलों बस एक ही तरह का जवाब- अभी इमरजेंसी खाली नहीं है। आईसीयू फुल है..। आपका मरीज सीरियस है, कहीं और लेकर जाइए.. जहां वेंटिलेटर की सुविधा मिल जाए। यह सुनते-सुनते सामान्य व्यक्ति थक हारकर निराशा के गर्त में डूब जाता है। यह दास्तां एक की नहीं, कइयों की हैं। जिले से प्रतिदिन जाने वाले चार से पांच मरीजों में से दो-तीन मरीजों को इसी दौर से गुजरना पड़ रहा है।
डॉ. राम मनोहर लोहिया संस्थान, बलरामपुर हॉस्पिटल, केजीएमयू और एसजीपीजीआई तक जिले से जाने वाले गंभीर रोगियों के साथ एक जैसी ही दुश्वारी खड़ी हो रही है। तत्काल बेड, आईसीयू, भर्ती आदि की सुविधा न मिलने से हायर सेंटरों के छत के नीचे ही कुछ मरीजों की जान चली जा रही है। नतीजा इधर से जीवित हालत में मरीज लेकर जाने वाले लोग उधर से शव के साथ लौट रहे हैं। यहीं नहीं गंभीर स्थिति में मरीज को भर्ती कराने के चक्कर में एक हायर सेंटर से दूसरे हायर सेंटर तक लोग दौड़ भी लगा रहे हैं। मगर, हर जगह टालने जैसा ही उत्तर पाकर उम्मीदें टूट जा रही है।
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जानिए, इनकी आपबीती
केस- एक
बनकटी क्षेत्र के रौता शुक्ल गांव के कपिलदेव शुक्ल भी इस तरह की दुश्वारियों के भुक्तभोगी है। उनकी बेटी की हालत गंभीर थी। गोरखपुर एम्स से इलाज के दौरान उसे लोहिया हॉस्पिटल लखनऊ रेफर कर दिया गया। वह किसी तरह बेटी को लेकर लोहिया में पहुंच गए। इमरजेंसी में पर्चा कटवाने के बाद उन्हें देखा गया और बेड न होने की बात कहकर केजीएमयू में ले जाने की सलाह दी गई। बिटिया की जान बचाने के लिए आनन-फानन वह केजीएमयू भी लेकर पहुंच गए। वहां भी एक जैसा उत्तर वेंटिलेटर उपलब्ध न होने का मिला। बकौल कपिल देव बहुत परेशान हुए तभी एक मरीज माफिया उनके करीब आ गया। हम दर्द बनकर उनके बेटी को एक निजी अस्पताल में ले गया। जहां दो दिन बाद उसने दम तोड़ दिया। वह लाखों का बिल अदाकर उधर से बिटिया का शव लेकर लौटे।
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केस- दो
दूसरी दास्तां सदर विकास खंड के रमवापुर के हरिओम की है। उनके पिता मार्ग दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। हरिओम के अनुसार, पहले वह पिता को जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। यहां उनकी हालत गंभीर बताते हुए केजीएमयू लखनऊ रेफर कर दिया गया। वह एंबुलेंस से पिता को लेकर केजीएमयू पहुंचे। वहां प्राथमिक उपचार के बाद बताया गया कि आईसीयू में जगह नहीं है। किसी अन्य हायर सेंटर पर ले जाइए। परेशान बेटा 24 घंटे तक इमरजेंसी के बाहर गंभीर पिता को लेकर हर आने-जाने वाले से भर्ती कराने की गुहार लगाता रहा। सुनवाई नहीं हुई तो लोहिया अस्पताल लेकर पहुंचा। यहां भी उनके पिता को 24 घंटे तक भर्ती नहीं किया गया। किसी तरह एक प्रभावशाली के प्रयास पर अगले दिन भर्ती हुए। मगर, तब तक देर हो चुकी थी। कुछ ही देर के बाद उनके पिता की मृत्यु हो गई और शव लेकर लौटे।
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हर कदम पर मिलती है चुनौती
पिकौरा के अशोक पांडेय, गांधीनगर के प्रभाकर का कहना है कि यहां से मरीज रेफर होने के बाद लखनऊ पहुंचाना ही विकल्प है। एसजीपीआई में तत्काल भर्ती करा पाना संभव ही नहीं है। इसलिए लोग लोहिया या केजीएमयू मरीज लेकर पहुंचते हैं। यहां पहले पर्चा कट जाता है। इसके आधार पर मरीज का प्राथमिक उपचार होता है। इसके बाद भर्ती की प्रक्रिया जटिल हो जाती है। अनजाने लोग बहुत कुछ जानते भी नहीं हैं। भर्ती कराने के लिए संबंधित विभाग का पता करते हुए दौड़ लगाते हैं। मगगर, उधर से बेड खाली न होने की दलील देकर वापस कर दिया जाता है।
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रिश्तेदारों के भी घनघनाने लगते हैं फोन
लखनऊ के शासकीय हायर मेडिकल सेंटरों के बारे में जानकारी रखने वाले लोग गंभीर मरीज को लेकर रवाना होने के समय से लेकर वहां पहुंचने तक अपने रसूखदार रिश्तेदारों एवं परिचितों का फोन घनघनाने लगते हैं। उनकी नजर में उतने समय तक लखनऊ से जुड़ाव रखने वाले लोग भगवान दिखते हैं। कुछ लोग तो अपने प्रभावशाली परिचितों या रिश्तेदारों के चलते इन सेंटरों पर मरीज भर्ती कराने में सफल भी हो जाते हैं। मगर, कुछ ऐसे भी हैं जिनकी बात नहीं बनती है। रुधौली के दीनानाथ ने बताया कि वह पत्नी को लेकर लोहिया अस्पताल पहुंचे थे। भर्ती नहीं हो रही थीं, तभी लखनऊ में रहने वाले उनके एक रिश्तेदार ने सचिवालय से फोन करवा दिया। इसके बाद मरीज का नाम पूछकर अस्पताल में भर्ती किया गया।
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बस्ती से हायर मेडिकल सेंटर लखनऊ में जाने वाले गंभीर मरीजों को नहीं मिल रहा त्वरित इलाज
डॉ. राम मनोहर लोहिया मेडिकल संस्थान, केजीएमयू जैसे हायर सेंटर पर दम तोड़ रहे मरीज
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। गंभीर मरीजों को जिले से रेफर होने के बाद राहत तो छोड़िए, नए तरह की चुनौती से आमना-सामना होने लगता है। परिजन किसी तरह रुपये, संसाधन आदि की जुगत कर लखनऊ के हायर शासकीय मेडिकल सेंटरों तक पहुंचा तो जा रहे हैं लेकिन, वहां मुसीबत और बढ़ जा रही है। मरीज को त्वरित इलाज की सुविधा दिलाने के लिए तीमारदार दो-दो दिन तक गिड़गिड़ा रहते हैं। वहां उनकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं है।
लखनऊ के हायर मेडिकल सेंटरों पर जिससे भी मिलों बस एक ही तरह का जवाब- अभी इमरजेंसी खाली नहीं है। आईसीयू फुल है..। आपका मरीज सीरियस है, कहीं और लेकर जाइए.. जहां वेंटिलेटर की सुविधा मिल जाए। यह सुनते-सुनते सामान्य व्यक्ति थक हारकर निराशा के गर्त में डूब जाता है। यह दास्तां एक की नहीं, कइयों की हैं। जिले से प्रतिदिन जाने वाले चार से पांच मरीजों में से दो-तीन मरीजों को इसी दौर से गुजरना पड़ रहा है।
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डॉ. राम मनोहर लोहिया संस्थान, बलरामपुर हॉस्पिटल, केजीएमयू और एसजीपीजीआई तक जिले से जाने वाले गंभीर रोगियों के साथ एक जैसी ही दुश्वारी खड़ी हो रही है। तत्काल बेड, आईसीयू, भर्ती आदि की सुविधा न मिलने से हायर सेंटरों के छत के नीचे ही कुछ मरीजों की जान चली जा रही है। नतीजा इधर से जीवित हालत में मरीज लेकर जाने वाले लोग उधर से शव के साथ लौट रहे हैं। यहीं नहीं गंभीर स्थिति में मरीज को भर्ती कराने के चक्कर में एक हायर सेंटर से दूसरे हायर सेंटर तक लोग दौड़ भी लगा रहे हैं। मगर, हर जगह टालने जैसा ही उत्तर पाकर उम्मीदें टूट जा रही है।
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केस- एक
बनकटी क्षेत्र के रौता शुक्ल गांव के कपिलदेव शुक्ल भी इस तरह की दुश्वारियों के भुक्तभोगी है। उनकी बेटी की हालत गंभीर थी। गोरखपुर एम्स से इलाज के दौरान उसे लोहिया हॉस्पिटल लखनऊ रेफर कर दिया गया। वह किसी तरह बेटी को लेकर लोहिया में पहुंच गए। इमरजेंसी में पर्चा कटवाने के बाद उन्हें देखा गया और बेड न होने की बात कहकर केजीएमयू में ले जाने की सलाह दी गई। बिटिया की जान बचाने के लिए आनन-फानन वह केजीएमयू भी लेकर पहुंच गए। वहां भी एक जैसा उत्तर वेंटिलेटर उपलब्ध न होने का मिला। बकौल कपिल देव बहुत परेशान हुए तभी एक मरीज माफिया उनके करीब आ गया। हम दर्द बनकर उनके बेटी को एक निजी अस्पताल में ले गया। जहां दो दिन बाद उसने दम तोड़ दिया। वह लाखों का बिल अदाकर उधर से बिटिया का शव लेकर लौटे।
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केस- दो
दूसरी दास्तां सदर विकास खंड के रमवापुर के हरिओम की है। उनके पिता मार्ग दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। हरिओम के अनुसार, पहले वह पिता को जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। यहां उनकी हालत गंभीर बताते हुए केजीएमयू लखनऊ रेफर कर दिया गया। वह एंबुलेंस से पिता को लेकर केजीएमयू पहुंचे। वहां प्राथमिक उपचार के बाद बताया गया कि आईसीयू में जगह नहीं है। किसी अन्य हायर सेंटर पर ले जाइए। परेशान बेटा 24 घंटे तक इमरजेंसी के बाहर गंभीर पिता को लेकर हर आने-जाने वाले से भर्ती कराने की गुहार लगाता रहा। सुनवाई नहीं हुई तो लोहिया अस्पताल लेकर पहुंचा। यहां भी उनके पिता को 24 घंटे तक भर्ती नहीं किया गया। किसी तरह एक प्रभावशाली के प्रयास पर अगले दिन भर्ती हुए। मगर, तब तक देर हो चुकी थी। कुछ ही देर के बाद उनके पिता की मृत्यु हो गई और शव लेकर लौटे।
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हर कदम पर मिलती है चुनौती
पिकौरा के अशोक पांडेय, गांधीनगर के प्रभाकर का कहना है कि यहां से मरीज रेफर होने के बाद लखनऊ पहुंचाना ही विकल्प है। एसजीपीआई में तत्काल भर्ती करा पाना संभव ही नहीं है। इसलिए लोग लोहिया या केजीएमयू मरीज लेकर पहुंचते हैं। यहां पहले पर्चा कट जाता है। इसके आधार पर मरीज का प्राथमिक उपचार होता है। इसके बाद भर्ती की प्रक्रिया जटिल हो जाती है। अनजाने लोग बहुत कुछ जानते भी नहीं हैं। भर्ती कराने के लिए संबंधित विभाग का पता करते हुए दौड़ लगाते हैं। मगगर, उधर से बेड खाली न होने की दलील देकर वापस कर दिया जाता है।
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रिश्तेदारों के भी घनघनाने लगते हैं फोन
लखनऊ के शासकीय हायर मेडिकल सेंटरों के बारे में जानकारी रखने वाले लोग गंभीर मरीज को लेकर रवाना होने के समय से लेकर वहां पहुंचने तक अपने रसूखदार रिश्तेदारों एवं परिचितों का फोन घनघनाने लगते हैं। उनकी नजर में उतने समय तक लखनऊ से जुड़ाव रखने वाले लोग भगवान दिखते हैं। कुछ लोग तो अपने प्रभावशाली परिचितों या रिश्तेदारों के चलते इन सेंटरों पर मरीज भर्ती कराने में सफल भी हो जाते हैं। मगर, कुछ ऐसे भी हैं जिनकी बात नहीं बनती है। रुधौली के दीनानाथ ने बताया कि वह पत्नी को लेकर लोहिया अस्पताल पहुंचे थे। भर्ती नहीं हो रही थीं, तभी लखनऊ में रहने वाले उनके एक रिश्तेदार ने सचिवालय से फोन करवा दिया। इसके बाद मरीज का नाम पूछकर अस्पताल में भर्ती किया गया।