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महिला अस्पताल में लल्ला को लावारिस मिला था हामिद
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महिला अस्पताल में लल्ला को लावारिस मिला था हामिद
- आईआरसीटीसी का सॉफ्टवेयर बेचने का मामला, मामा से गैंग के सरगना ने सीखा था रेलवे की टिकट दलाली का गुर
वीरेंद्र पांडेय
बस्ती। आईआरसीटीसी की अभेद्य मानी जाने वाली तकनीकी सुरक्षा को भेदकर करोड़ों की संपत्ति बना लेने वाला हामिद अशरफ जिला महिला अस्पताल में जमीरुल हसन उर्फ लल्ला को लावारिस मिला था। दो बेटियां होने के कारण कप्तानगंज निवासी लल्ला से अपने घर ले आया। बेटे की तरह परवरिश की।
मंगलवार को लल्ला ने जेल जाने से पूछताछ में बताया कि 15 वर्ष की उम्र होने पर दक्षिण दरवाजा निवासी अपने साले के पास हामिद अशरफ को पढ़ने भेज दिया। हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान ही तत्काल टिकटों की दलाली करने वाले साले से कुछ ही महीनों में धंधे की बारीकियां सीख ली। वेबसाइट हैक करने वाला सॉफ्टवेयर भी बना डाला। एसपी हेमराज मीणा का कहना है कि हामिद अपने पिता और अन्य करीबियों से व्हाट्सएप कॉल से बात करता है। इस कारण वह अब तक ट्रेस नहीं हो सका।
लल्ला के अनुसार, 2015-16 के समय आईआरसीटीसी की वेबसाइट काफी स्लो चलती थी। तत्काल टिकट बनाने में मुश्किलें आती थीं। हामिद ने खुराफाती दिमाग लगाकर खुद का अपना सॉफ्टवेयर बना डाला।
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2016 में पकड़ा गया था, जमानत पर छूटने के बाद अब तक नहीं गिरफ्तार हुआ
सबसे पहले उसने ब्लैक टीएस, नियो और रेड मिर्ची सॉफ्टवेयर बनाया। इसके बाद पूरे देश के आईआरसीटीसी के नेटवर्क से जुड़े टिकट बनाने वालों से साठगांठ करके उन्हें अपना सॉफ्टवेयर बेचने लगा। इससे रेलवे की आईआरसीटीसी की सरकारी वेबसाइट लगभग ध्वस्त हो गई। चंद मिनटों में तत्काल कोटे का टिकट बन जाने की भनक लगते ही रेलवे की खुफिया एजेंसिया सक्रिय र्हुइं। जांच में सॉफ्टवेयर का मुख्य सर्वर और सरगना बस्ती में होना पाया गया। 28 अप्रैल 2016 को हामिद के ही सुपर सेलर शमशेर की मुखबिरी पर बंगलूरू की सीबीआई टीम और मुंबई की विजिलेंस टीम ने संयुक्त रूप से पुरानी बस्ती थाना क्षेत्र से हामिद अशरफ को गिरफ्तार कर लिया। जमानत पर रिहा हुआ तो सुरक्षा एजेंसियों से बचने के लिए नेपाल चला गया। पुलिस सूत्र बताते हैं कि कुछ दिनों तक नेपाल के नवलपरासी जिले में रहने के बाद हामिद ने काठमांडू को स्थाई ठिकाना बना लिया।
रायल्टी न मिलने पर होल्ड कर देता था सॉफ्टवेयर
रेलवे के तत्काल टिकट की काला बाजारी और ई-टिकट के नकली के सॉफ्टवेयर से करोड़ों की संपत्ति बनाने वाला हामिद साइबर और आईटी तकनीकी में माहिर है। रेडमिर्ची और एएनएसएस नाम के सॉफ्टवेयर के जरिए आईआरसीटीसी की साइट खुलते ही हैक कर लेता था। इस साफ्टवेयर की लोकप्रियता बढ़ने पर उसने यह सॉफ्टवेयर देश भर में फैले एजेंट्स को रायल्टी के आधार बेच दिया था। हालांकि, कंट्रोल लॉग-इन के जरिए वह सभी सॉफ्टवेयर की कमांड अपने पास रखता था। एजेंट्स से बुकिंग पर कमीशन लेता था मगर किसी ने चेन तोड़ी तो उसका सॉफ्टवेयर हैक कर देता था। यानी बिना उसके चाहे कोई भी उस सॉफ्टवेयर को इस्तेमाल नहीं कर सकता था।
कंपनियों के माध्यम से रकम को करता था वैध
एसपी हेमराज मीणा का कहना है कि हामिद का दाहिना हाथ कहे जाने वाले योगेंद्र विश्वकर्मा ने गोल्ड मीडिया और केवाईआर नाम की कंपनी खोलकर रखीं हैं। इसी के सहारे वह अवैध कमाई को वैध करता था। चकमा देने के लिए उन कंपनियों का आयकर रिटर्न भरता था। उधर, हामिद ने अपने एजेंट्स को एक खाता नंबर दे रखा था। इसे माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के माध्यम से संचालित करता था। उसके पास उन खातों का एटीएम है। रायल्टी की रकम मंगलवार को गिरफ्तार भदोही जनपद के सुरियांव थानाक्षेत्र निवासी योगेंद्र विश्वकर्मा के हाथ अपने पिता लल्ला के पास भेज देता था। इसका इस्तेमाल जमीन जायदाद खरीदने में करता था।
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- आईआरसीटीसी का सॉफ्टवेयर बेचने का मामला, मामा से गैंग के सरगना ने सीखा था रेलवे की टिकट दलाली का गुर
वीरेंद्र पांडेय
बस्ती। आईआरसीटीसी की अभेद्य मानी जाने वाली तकनीकी सुरक्षा को भेदकर करोड़ों की संपत्ति बना लेने वाला हामिद अशरफ जिला महिला अस्पताल में जमीरुल हसन उर्फ लल्ला को लावारिस मिला था। दो बेटियां होने के कारण कप्तानगंज निवासी लल्ला से अपने घर ले आया। बेटे की तरह परवरिश की।
मंगलवार को लल्ला ने जेल जाने से पूछताछ में बताया कि 15 वर्ष की उम्र होने पर दक्षिण दरवाजा निवासी अपने साले के पास हामिद अशरफ को पढ़ने भेज दिया। हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान ही तत्काल टिकटों की दलाली करने वाले साले से कुछ ही महीनों में धंधे की बारीकियां सीख ली। वेबसाइट हैक करने वाला सॉफ्टवेयर भी बना डाला। एसपी हेमराज मीणा का कहना है कि हामिद अपने पिता और अन्य करीबियों से व्हाट्सएप कॉल से बात करता है। इस कारण वह अब तक ट्रेस नहीं हो सका।
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लल्ला के अनुसार, 2015-16 के समय आईआरसीटीसी की वेबसाइट काफी स्लो चलती थी। तत्काल टिकट बनाने में मुश्किलें आती थीं। हामिद ने खुराफाती दिमाग लगाकर खुद का अपना सॉफ्टवेयर बना डाला।
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2016 में पकड़ा गया था, जमानत पर छूटने के बाद अब तक नहीं गिरफ्तार हुआ
सबसे पहले उसने ब्लैक टीएस, नियो और रेड मिर्ची सॉफ्टवेयर बनाया। इसके बाद पूरे देश के आईआरसीटीसी के नेटवर्क से जुड़े टिकट बनाने वालों से साठगांठ करके उन्हें अपना सॉफ्टवेयर बेचने लगा। इससे रेलवे की आईआरसीटीसी की सरकारी वेबसाइट लगभग ध्वस्त हो गई। चंद मिनटों में तत्काल कोटे का टिकट बन जाने की भनक लगते ही रेलवे की खुफिया एजेंसिया सक्रिय र्हुइं। जांच में सॉफ्टवेयर का मुख्य सर्वर और सरगना बस्ती में होना पाया गया। 28 अप्रैल 2016 को हामिद के ही सुपर सेलर शमशेर की मुखबिरी पर बंगलूरू की सीबीआई टीम और मुंबई की विजिलेंस टीम ने संयुक्त रूप से पुरानी बस्ती थाना क्षेत्र से हामिद अशरफ को गिरफ्तार कर लिया। जमानत पर रिहा हुआ तो सुरक्षा एजेंसियों से बचने के लिए नेपाल चला गया। पुलिस सूत्र बताते हैं कि कुछ दिनों तक नेपाल के नवलपरासी जिले में रहने के बाद हामिद ने काठमांडू को स्थाई ठिकाना बना लिया।
रायल्टी न मिलने पर होल्ड कर देता था सॉफ्टवेयर
रेलवे के तत्काल टिकट की काला बाजारी और ई-टिकट के नकली के सॉफ्टवेयर से करोड़ों की संपत्ति बनाने वाला हामिद साइबर और आईटी तकनीकी में माहिर है। रेडमिर्ची और एएनएसएस नाम के सॉफ्टवेयर के जरिए आईआरसीटीसी की साइट खुलते ही हैक कर लेता था। इस साफ्टवेयर की लोकप्रियता बढ़ने पर उसने यह सॉफ्टवेयर देश भर में फैले एजेंट्स को रायल्टी के आधार बेच दिया था। हालांकि, कंट्रोल लॉग-इन के जरिए वह सभी सॉफ्टवेयर की कमांड अपने पास रखता था। एजेंट्स से बुकिंग पर कमीशन लेता था मगर किसी ने चेन तोड़ी तो उसका सॉफ्टवेयर हैक कर देता था। यानी बिना उसके चाहे कोई भी उस सॉफ्टवेयर को इस्तेमाल नहीं कर सकता था।
कंपनियों के माध्यम से रकम को करता था वैध
एसपी हेमराज मीणा का कहना है कि हामिद का दाहिना हाथ कहे जाने वाले योगेंद्र विश्वकर्मा ने गोल्ड मीडिया और केवाईआर नाम की कंपनी खोलकर रखीं हैं। इसी के सहारे वह अवैध कमाई को वैध करता था। चकमा देने के लिए उन कंपनियों का आयकर रिटर्न भरता था। उधर, हामिद ने अपने एजेंट्स को एक खाता नंबर दे रखा था। इसे माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के माध्यम से संचालित करता था। उसके पास उन खातों का एटीएम है। रायल्टी की रकम मंगलवार को गिरफ्तार भदोही जनपद के सुरियांव थानाक्षेत्र निवासी योगेंद्र विश्वकर्मा के हाथ अपने पिता लल्ला के पास भेज देता था। इसका इस्तेमाल जमीन जायदाद खरीदने में करता था।