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Basti News: प्राधिकरण के कागज में हरित पट्टी... धरा से हरियाली गायब
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- हाईवे और कुआनों के किनारे चिह्नित ग्रीन बेल्ट में पर्यावरण पोषण के इंतजाम नहीं
- हरियाली न होने से शहर में बढ़ रहा प्रदूषण का स्तर, हवा में घुल रही विषैली गैस
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। शहर एवं पास के क्षेत्र में हरियाली गायब होती जा रही है। विकास की रफ्तार में पर्यावरण का झटका लग रहा है। कंकरीट की बढ़ती काॅलोनियां एवं सड़कों के निर्माण से पेड़-पौधे नष्ट हो रहे हैं, लेकिन दोबारा इन्हें पनपाया नहीं जा रहा है। शहरी क्षेत्र में हरित पट्टी सिर्फ बस्ती विकास प्राधिकरण के अभिलेख में है। धरा पर हरियाली ढूंढने पर नहीं मिल रही है। निचाट सड़कों पर गाड़ियों की धुआंधार आवाजाही से प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। शुद्ध पर्यावरण वाले क्षेत्र में एक्यूआई 180 तक पहुंचना चिंताजनक है।
शहर का दायरा लगातार बढ़ रहा है। जंगल और जल क्षेत्र की जमीनों पर भी निर्माण तेजी से हो रहे हैं। पेड़- पौधे कटते जा रहे हैं। हरियाली गायब हो रही है। पर्यावरण के लिए पोषक तालाब, पोखरे एवं अन्य जलाशय भी कम होते जा रहे हैं। शहरी क्षेत्र में तो पर्यावरण के लिए फायदेमंद जंगल और जल क्षेत्र का दायरा तेजी के साथ घट रहा है। नए सिरे से इन्हें पनपाने की योजना सिर्फ कागज में है। यही वजह है कि प्रदूषण का लगातार स्तर बढ़ रहा है। बड़े शहरों की तरह यहां भी हवा जहरीली बनी हुई है।
वायु गुणवत्ता सूचकांक 180 पर पहुंचा हुआ है। लोगों को सांस लेने में कठिनाई हो रही है। हालांकि बीडीए के महायोजना- 2031 में हरित पट्टी का नियोजन बड़े पैमाने पर है, लेकिन इसके दृष्टिगत धरातल पर हरियाली बिखेरने के कहीं प्रयास नहीं हुए हैं। प्राधिकरण के 151 वर्ग किलोमीटर के नवीन परिक्षेत्र में सेटेलाइट सर्वे के जरिये कुल 1069.54 हेक्टेयर जमीन ग्रीन बेल्ट/ ग्रीन जोन और पार्क के रूप में चिह्नित है। इसमें तालाब, पोखरे, चारागाह, सरोवर, चकमार्ग जैसी प्रकृति के जमीनों का स्पष्ट उल्लेख है, लेकिन इन भूखंडों के मूल प्रकृति में बने रहने का कोई उपाय नहीं किया जा रहा है। विकास की आड़ में इनसे लगातार छेड़छाड़ की जा रही है। शुद्ध पर्यावरण एवं आबोहवा की दृष्टि से चिह्नित इन जमीनों पर निर्माण धड़ल्ले से हो रहा है। बीडीए खुद इस तरह की जमीनों में जुर्माना आदि जमा कराकर मानचित्र को स्वीकृति दे रहा है।
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खतरे में आ गया इन जलाशयों का वजूद
शहर के चर्चित जलाशयों में शुमार पांडेय पोखरा, लैबुड़वा ताल, महदेव ताल, खीरीघाट ताल, भुजैनी पोखरा समेत एक दर्जन तालाब पोखरों का वजूद खतरे में आ गया है। डेढ़ दशक से यहां भू-माफियाओं का संजाल बिछा तो जलाशय पाटकर टुकड़ों में जमीन बिकने लगी। वर्तमान में इन जलाशयों के अधिकतर हिस्से में कंकरीट की कॉलोनियां विकसित हो चुकी हैं, जबकि बीडीए के अभिलेख में यह सभी जगह ग्रीन जोन में चिह्नित हैं। इन जलाशयों के किनारे कभी दिखने वाली हरियाली को भी कंकरीट की कॉलोनियों ने निगल लिया।
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निचाट फोरलेन पर दौड़ रहे 40 हजार वाहन
बीडीए परिक्षेत्र में डेढ़ दशक से सड़कों का संजाल बिछाया जा रहा है। गोरखपुर-लखनऊ हाईवे की दस किमी लंबाई बीडीए परिक्षेत्र में है। इस सड़क के दोनों किनारों पर 65.5 मीटर चौड़ाई की जमीन ग्रीन बेल्ट के रूप में चिह्नित है। पर्यावरण एवं अन्य सुरक्षा की दृष्टि से इसमें निर्माण प्रतिबंधित है, लेकिन इस जगह पर भी हरियाली नहीं दिख रही है। पुराने पेड़ काटकर सड़क बना दी गई। इसके बाद दोनों किनारों पर एनएचएआई ने भी पौधों को नए सिरे पनपाने की जहमत नहीं उठाई, जबकि एक अनुमान के मुताबिक प्रत्येक 24 घंटे में छोटे-बड़े 40 हजार वाहन इस रास्ते से गुजर रहे हैं, जिनसे निकलने वाला धुआं वायु की गुणवत्ता प्रभावित कर रहा है। इसी तरह लुंबिनी- दुद्धी मार्ग भी शहरी क्षेत्र में दस किमी लंबा है। इस सड़क के दोनों किनारों से भी हरियाली गायब है।
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कुआनों का तटीय क्षेत्र भी उजड़ा चमन
शहर के किनारे से होकर निकलने वाली कुआनों नदी के दोनों किनारों पर बीडीए ने 80 मीटर तक ग्रीन बेल्ट चिह्नित की है। मगर यहां से भी हरियाली गायब है। पेड़-पौधे न होने से नदी के किनारे कूड़ा, गंदगी आदि जलाने से प्रदूषण बढ़ रहा है।
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गर्मी की अपेक्षा ठंडी में एक्यूआई ज्यादा बढ़ता है। क्योंकि गर्मी हवा तेज चलती है उसमें गर्माहट भी होती है इसलिए प्रदूषण ऊंचाई तक उड़ जाते हैं। ठंड में हवा की तासीर ठंडी होने से और रफ्तार सामान्य होने से धूल, गर्दे, धुएं हवा में एक लेयर बना लेते हैं। जहां तक हरित पट्टी की बात है इसे विकसित करने के लिए सम्मिलित प्रयास की जरूरत है। यदि हरित पट्टी सुरक्षित करके दी जाए। ताकि उसमें पेड़- पौधे को संरक्षित किया जा सकें। पर्यावरण की शुद्धता में जलाशय, हरियाली सभी की भूमिका है। लगातार निर्माण होने से और अधिक वाहन चलने से कंकरीट के कण और धुएं हवा में घुल रहे हैं।
-प्रो. प्रदीप कुमार, अध्यक्ष, भूगोल विभाग, केडीसी
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इस तरह करें हरियाली एवं पर्यावरण शुद्ध बनाने का प्रयास
- सड़कों के किनारे सेफ गार्ड बनवाया जाएं।
- एक पौधा मां के नाम योजना की तरह प्रत्येक जागरूक व्यक्ति को जिम्मेदारी सौंपी जाए।
- यदि नदी और सड़क के किनारे हरित पट्टी है तो उसे सुरक्षित करके लोगों को पौधे विकसित करने के लिए प्रेरित किया जाए।
- कम से कम वाहनों का उपयोग किया जाए।
- खेतों में पराली कतई न जलाएं।
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कोट
प्राधिकरण गठित हुए अभी 5 साल ही हुआ है। नदी के किनारे एवं सड़कोें के किनारे हरित पट्टी चिह्नित है। यहां हरियाली विकसित करने की योजना अच्छी है। इस मुद्दे पर सम्मिलित प्रयास करने की रणनीति भविष्य में बनाई जाएगी।
-प्रतिपाल सिंह, सचिव, बस्ती विकास प्राधिकरण/ एडीएम।
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- हरियाली न होने से शहर में बढ़ रहा प्रदूषण का स्तर, हवा में घुल रही विषैली गैस
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। शहर एवं पास के क्षेत्र में हरियाली गायब होती जा रही है। विकास की रफ्तार में पर्यावरण का झटका लग रहा है। कंकरीट की बढ़ती काॅलोनियां एवं सड़कों के निर्माण से पेड़-पौधे नष्ट हो रहे हैं, लेकिन दोबारा इन्हें पनपाया नहीं जा रहा है। शहरी क्षेत्र में हरित पट्टी सिर्फ बस्ती विकास प्राधिकरण के अभिलेख में है। धरा पर हरियाली ढूंढने पर नहीं मिल रही है। निचाट सड़कों पर गाड़ियों की धुआंधार आवाजाही से प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। शुद्ध पर्यावरण वाले क्षेत्र में एक्यूआई 180 तक पहुंचना चिंताजनक है।
शहर का दायरा लगातार बढ़ रहा है। जंगल और जल क्षेत्र की जमीनों पर भी निर्माण तेजी से हो रहे हैं। पेड़- पौधे कटते जा रहे हैं। हरियाली गायब हो रही है। पर्यावरण के लिए पोषक तालाब, पोखरे एवं अन्य जलाशय भी कम होते जा रहे हैं। शहरी क्षेत्र में तो पर्यावरण के लिए फायदेमंद जंगल और जल क्षेत्र का दायरा तेजी के साथ घट रहा है। नए सिरे से इन्हें पनपाने की योजना सिर्फ कागज में है। यही वजह है कि प्रदूषण का लगातार स्तर बढ़ रहा है। बड़े शहरों की तरह यहां भी हवा जहरीली बनी हुई है।
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वायु गुणवत्ता सूचकांक 180 पर पहुंचा हुआ है। लोगों को सांस लेने में कठिनाई हो रही है। हालांकि बीडीए के महायोजना- 2031 में हरित पट्टी का नियोजन बड़े पैमाने पर है, लेकिन इसके दृष्टिगत धरातल पर हरियाली बिखेरने के कहीं प्रयास नहीं हुए हैं। प्राधिकरण के 151 वर्ग किलोमीटर के नवीन परिक्षेत्र में सेटेलाइट सर्वे के जरिये कुल 1069.54 हेक्टेयर जमीन ग्रीन बेल्ट/ ग्रीन जोन और पार्क के रूप में चिह्नित है। इसमें तालाब, पोखरे, चारागाह, सरोवर, चकमार्ग जैसी प्रकृति के जमीनों का स्पष्ट उल्लेख है, लेकिन इन भूखंडों के मूल प्रकृति में बने रहने का कोई उपाय नहीं किया जा रहा है। विकास की आड़ में इनसे लगातार छेड़छाड़ की जा रही है। शुद्ध पर्यावरण एवं आबोहवा की दृष्टि से चिह्नित इन जमीनों पर निर्माण धड़ल्ले से हो रहा है। बीडीए खुद इस तरह की जमीनों में जुर्माना आदि जमा कराकर मानचित्र को स्वीकृति दे रहा है।
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खतरे में आ गया इन जलाशयों का वजूद
शहर के चर्चित जलाशयों में शुमार पांडेय पोखरा, लैबुड़वा ताल, महदेव ताल, खीरीघाट ताल, भुजैनी पोखरा समेत एक दर्जन तालाब पोखरों का वजूद खतरे में आ गया है। डेढ़ दशक से यहां भू-माफियाओं का संजाल बिछा तो जलाशय पाटकर टुकड़ों में जमीन बिकने लगी। वर्तमान में इन जलाशयों के अधिकतर हिस्से में कंकरीट की कॉलोनियां विकसित हो चुकी हैं, जबकि बीडीए के अभिलेख में यह सभी जगह ग्रीन जोन में चिह्नित हैं। इन जलाशयों के किनारे कभी दिखने वाली हरियाली को भी कंकरीट की कॉलोनियों ने निगल लिया।
निचाट फोरलेन पर दौड़ रहे 40 हजार वाहन
बीडीए परिक्षेत्र में डेढ़ दशक से सड़कों का संजाल बिछाया जा रहा है। गोरखपुर-लखनऊ हाईवे की दस किमी लंबाई बीडीए परिक्षेत्र में है। इस सड़क के दोनों किनारों पर 65.5 मीटर चौड़ाई की जमीन ग्रीन बेल्ट के रूप में चिह्नित है। पर्यावरण एवं अन्य सुरक्षा की दृष्टि से इसमें निर्माण प्रतिबंधित है, लेकिन इस जगह पर भी हरियाली नहीं दिख रही है। पुराने पेड़ काटकर सड़क बना दी गई। इसके बाद दोनों किनारों पर एनएचएआई ने भी पौधों को नए सिरे पनपाने की जहमत नहीं उठाई, जबकि एक अनुमान के मुताबिक प्रत्येक 24 घंटे में छोटे-बड़े 40 हजार वाहन इस रास्ते से गुजर रहे हैं, जिनसे निकलने वाला धुआं वायु की गुणवत्ता प्रभावित कर रहा है। इसी तरह लुंबिनी- दुद्धी मार्ग भी शहरी क्षेत्र में दस किमी लंबा है। इस सड़क के दोनों किनारों से भी हरियाली गायब है।
कुआनों का तटीय क्षेत्र भी उजड़ा चमन
शहर के किनारे से होकर निकलने वाली कुआनों नदी के दोनों किनारों पर बीडीए ने 80 मीटर तक ग्रीन बेल्ट चिह्नित की है। मगर यहां से भी हरियाली गायब है। पेड़-पौधे न होने से नदी के किनारे कूड़ा, गंदगी आदि जलाने से प्रदूषण बढ़ रहा है।
गर्मी की अपेक्षा ठंडी में एक्यूआई ज्यादा बढ़ता है। क्योंकि गर्मी हवा तेज चलती है उसमें गर्माहट भी होती है इसलिए प्रदूषण ऊंचाई तक उड़ जाते हैं। ठंड में हवा की तासीर ठंडी होने से और रफ्तार सामान्य होने से धूल, गर्दे, धुएं हवा में एक लेयर बना लेते हैं। जहां तक हरित पट्टी की बात है इसे विकसित करने के लिए सम्मिलित प्रयास की जरूरत है। यदि हरित पट्टी सुरक्षित करके दी जाए। ताकि उसमें पेड़- पौधे को संरक्षित किया जा सकें। पर्यावरण की शुद्धता में जलाशय, हरियाली सभी की भूमिका है। लगातार निर्माण होने से और अधिक वाहन चलने से कंकरीट के कण और धुएं हवा में घुल रहे हैं।
-प्रो. प्रदीप कुमार, अध्यक्ष, भूगोल विभाग, केडीसी
इस तरह करें हरियाली एवं पर्यावरण शुद्ध बनाने का प्रयास
- सड़कों के किनारे सेफ गार्ड बनवाया जाएं।
- एक पौधा मां के नाम योजना की तरह प्रत्येक जागरूक व्यक्ति को जिम्मेदारी सौंपी जाए।
- यदि नदी और सड़क के किनारे हरित पट्टी है तो उसे सुरक्षित करके लोगों को पौधे विकसित करने के लिए प्रेरित किया जाए।
- कम से कम वाहनों का उपयोग किया जाए।
- खेतों में पराली कतई न जलाएं।
कोट
प्राधिकरण गठित हुए अभी 5 साल ही हुआ है। नदी के किनारे एवं सड़कोें के किनारे हरित पट्टी चिह्नित है। यहां हरियाली विकसित करने की योजना अच्छी है। इस मुद्दे पर सम्मिलित प्रयास करने की रणनीति भविष्य में बनाई जाएगी।
-प्रतिपाल सिंह, सचिव, बस्ती विकास प्राधिकरण/ एडीएम।