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Basti News: पहले बाप से डर लगता था, अब बेटों से.
Wed, 29 Jan 2025 12:55 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Wed, 29 Jan 2025 12:55 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में शब्दांगन साहित्यिक संस्था की ओर से प्रेस क्लब सभागार में मंगलवार को कवि सम्मेलन-मुशायरे का आयोजन किया गया।
कवि डॉ. रामकृष्ण लाल ‘जगमग’ की अध्यक्षता में मुख्य अतिथि महेश प्रताप श्रीवास्तव और डाॅ. वीके वर्मा ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोेलन में साहित्यकारों की बड़ी भूमिका थी। उनके साहित्य, कविताओं ने वैचारिक ज्वाला पैदा किया, उससे अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिल गईं। संचालन विनोद कुमार उपाध्याय ने किया।
सरस्वती वंदना से आरंभ कवि सम्मेलन में डॉ. रामकृष्ण लाल ‘जगमग’ की पंक्तियां सूखा अब सरवर लगता है, मानव भी विषधर लगता है, पहले बाप से डर लगता था, अब बेटों से डर लगता है.. सुनाकर आज के वर्तमान परिदृश्य पर करारा व्यंग्य किया। डाॅ. वीके वर्मा ने कहा-पहले तो थे हम परतंत्र, लेकिन अब हो गए स्वतंत्र, श्रम की पूजा करो निरन्तर, श्रम ही है जीवन... का मंत्र सुनाकर वाहवाही लूटी।
महेश श्रीवास्तव की रचना आसान हैं पर इतने भी आसान नहीं हैं.. सुनाया। विनोद कुमार उपाध्याय ने कर-कर के याद कितने ही आंचल भिगोये थे, जाने वो बात क्या थी कि जी भर के रोये थे.. सुनाकर प्रेम के भाव को स्वर दिया।
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बस्ती। गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में शब्दांगन साहित्यिक संस्था की ओर से प्रेस क्लब सभागार में मंगलवार को कवि सम्मेलन-मुशायरे का आयोजन किया गया।
कवि डॉ. रामकृष्ण लाल ‘जगमग’ की अध्यक्षता में मुख्य अतिथि महेश प्रताप श्रीवास्तव और डाॅ. वीके वर्मा ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोेलन में साहित्यकारों की बड़ी भूमिका थी। उनके साहित्य, कविताओं ने वैचारिक ज्वाला पैदा किया, उससे अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिल गईं। संचालन विनोद कुमार उपाध्याय ने किया।
सरस्वती वंदना से आरंभ कवि सम्मेलन में डॉ. रामकृष्ण लाल ‘जगमग’ की पंक्तियां सूखा अब सरवर लगता है, मानव भी विषधर लगता है, पहले बाप से डर लगता था, अब बेटों से डर लगता है.. सुनाकर आज के वर्तमान परिदृश्य पर करारा व्यंग्य किया। डाॅ. वीके वर्मा ने कहा-पहले तो थे हम परतंत्र, लेकिन अब हो गए स्वतंत्र, श्रम की पूजा करो निरन्तर, श्रम ही है जीवन... का मंत्र सुनाकर वाहवाही लूटी।
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महेश श्रीवास्तव की रचना आसान हैं पर इतने भी आसान नहीं हैं.. सुनाया। विनोद कुमार उपाध्याय ने कर-कर के याद कितने ही आंचल भिगोये थे, जाने वो बात क्या थी कि जी भर के रोये थे.. सुनाकर प्रेम के भाव को स्वर दिया।
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