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Basti News: बच्चों के कंधों पर भारी बस्ते से बिगड़ रहा संतुलन

Sun, 07 Apr 2024 01:52 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती Updated Sun, 07 Apr 2024 01:52 AM IST
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Children's balance is deteriorating due to heavy bags on their shoulders.
निजी स्कूलों की मनमानी, एनसीईआरटी के बजाय पढ़वा रहे महंगी किताबें
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संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। स्कूलों के भारी बैग के बोझ बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित कर रहे हैं। जबकि नेशनल कैरिकुलम फ्रेमवर्क (एनसीए) ने 2005 में सर्कुलर जारी कर बच्चों के शारीरिक और मानसिक दबाव को कम करने का सुझाव दिया था। इसके लिए एनसीईआरटी ने नए पाठ्यक्रम बनाया और किताबें तैयार की। जो केवल केंद्रीय विद्यालयों में ही पूरी तरह लागू है। अभिभावकों का कहना है कि कुछ स्कूलों ने दिखावे के लिए एनसीईआरटी की एक-दो पुस्तकें लगाई हैं। बाकी निजी पब्लिशर्स की किताबें महंगे दामों पर बिकवा रहे हैं।
एनसीए के अनुसार कक्षा एक और दो में बच्चों को भाषा और गणित केवल दो ही विषय पढ़ाना पर्याप्त है। जबकि निजी स्कूलों में कक्षा एक से ही कंप्यूटर साइंस, सोशल साइंस समेत अन्य विषय भी पढ़ाते हैं। वहीं कक्षा दो तक के बच्चों को होमवर्क देना जरूरी नहीं है। सिर्फ एक कॉपी ही कक्षा कार्य के लिए काफी है।और कक्षा तीन से पांच तक के लिए एक बार में केवल दो कॉपियों की अनुमति है। एक कक्षा कार्य और दूसरी गृहकार्य की।
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केंद्रीय विद्यालयों में एनसीईआरटी पैटर्न पर संचालित होती है। यहां मुख्य विषयों की नियमित पढ़ाई के अलावा वर्क एक्सपीरियंस, कंप्यूटर और आर्ट की कक्षाएं सप्ताह में दो दिन लगती हैं। किताबें एनसीईआरटी पर आधारित होने के कारण बच्चों पर बैग का बोझ नहीं पड़ता।
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एनसीए के अनुसार ये होना चाहिए स्कूल बैग का वजन
कक्षा एक और दो के बस्ते का वजन दो किलोग्राम से ज्यादा नहीं।
कक्षा तीन और चार के बस्ते का वजन तीन किलोग्राम से कम।
कक्षा पांच से आठ तक के बस्ते का वजन चार किलोग्राम से ज्यादा नहीं।
कक्षा नौ से बारहवीं तक के लिए अधिकतम सीमा छह किलोग्राम।
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अधिक वजन खिंच सकती हैं मसल्स
कंधे पर एक साइड बैग रखने से मसल्स खिंच सकती हैं। हाथ से बैग उठाने पर कलाई में दर्द शुरू हो जाता है। चलते समय संतुलन विगड़ने से चोट लग सकती है।
-डॉ. डीके गुप्ता, वरिष्ठ हड्डी रोग विशेषज्ञ
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बचपन को छीन रहे निजी स्कूल
मनो चिकित्सक डॉ. एके दुबे ने कहा कि निजी स्कूल संचालक बच्चों का बचपन छीन रहे हैं। बच्चों को सिखाने का सर्वश्रेष्ठ तरीका लर्निंग बाय डुइंग होता है, यानी बच्चे खुद करके सीखें। अधिकतर स्कूलों ने बच्चों को किताबी कीड़ा बना रखा है। इससे उन्हें खेलने का समय ही नहीं मिलता है।
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