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Basti News: हरनखा में विलुप्त होने के कगार पर पान की खेती, कम हुई मांग

Tue, 20 Jan 2026 12:27 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Tue, 20 Jan 2026 12:27 AM IST
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Betel cultivation on the verge of extinction in Harankha, demand has decreased
पान की खेती।
नगर बाजार। पान की खेती के लिए मशहूर नगर पंचायत नगर बाजार के हरनखा गांव अब अपनी पुरानी पहचान खोने लगा है। यहां पान की खेती धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। 80 से 90 के दशक तक गांव के प्रत्येक परिवार के लिए पान की खेती ही रोजी-रोटी का मुख्य साधन रही। यहां रहने वाले चौरसिया समाज के लोग ताजा पान के पत्तों की आपूर्ति बस्ती समेत आसपास के जिलों में करके अच्छी खासी कमाई करते थे। लेकिन, बाजार में डिमांड कम होने से इसकी खेती अब कम होने लगी है।
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भारत में पान का चलन वैदिक काल से माना जाता है। इसका उपयोग औषधि निर्माण से लेकर धार्मिक अनुष्ठान एवं मुंह को महकाने तक में किया जाता है। तीन-चार दशक पहले तक कोमल पान के पत्तों की खेती व्यापक स्तर पर हरनखा गांव में होती रही। पान की खेती के मामले में इस गांव की प्रदेश में एक अलग पहचान रही। गोंडा, बाराबंकी, आंबेडकरनगर, गोरखपुर आदि जनपदों के व्यापारी यहां पान के ताजे पत्तों की खरीदारी के लिए पहुंचते रहे।
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समय बदलने के साथ इस गांव के लोगों के पारंपरिक व्यवसाय पर संकट मंडराने लगा है। बाजार में गुटखा एवं अन्य सूखा नशा का चलन बढ़ने के कारण पान की डिमांड कम हो गई है। इसके कारण उत्पादन की बिक्री नहीं हो पा रही है। गांव में रहने वाले चौरसिया समाज के सैकड़ों परिवार अब अपने पेशागत पान की खेती से मोहभंग कर लिए हैं। गांव के 70 वर्षीय रामचंद्र चौरसिया कहते हैं कि पहले वह स्वयं पान की खेती मन लगाकर करते थे। इधर नए दौर में पान खाने के शौकीन कम हो गए। इससे डिमांड घट गई है।
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सीलिए हमारे गांव के इक्का-दुक्का लोग पान की खेती से जुड़े हैं। बताया कि पान के खेतों से हम लोग 200 पत्तों की एक ढोली, 50 पत्तों का एक पचासा और 112 ढोली का एक लेसो तैयार करते थे। आर्डर के हिसाब से व्यापारियों को उपलब्ध कराते रहे। इस खेती का एक विशेष फायदा भी था। पान की खेती वाले स्थान पर सांप या अन्य विषैले जानवर प्रवेश नहीं करते हैं। क्योंकि मान्यता के अनुसार पान की खेती वाले स्थान पर बाबा सोखा और शंभूनाथ की पूजा की जाती है।

अकेले रामचंद्र कर रहे पान की खेती

गांव के रामचंद्र चौरसिया ने बताया कि वर्तमान में वह अकेले ही गांव के बाहर छह बिस्वा जमीन में पान की खेती कर रहे हैं। पहले यहां का उत्पादित पान बस्ती, अंबेडकर नगर, खलीलाबाद सहित कई अन्य शहरों में भेजा जाता था। परिवार के सदस्य कड़ी मेहनत से पान की खेती कर पा रहे हैं।
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