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सारे समीकरण ध्वस्त, कमलमय हुआ जिला

Sat, 11 Mar 2017 11:28 PM IST
ब्यूरो अमर उजाला/ बस्ती
ब्यूरो अमर उजाला/ बस्ती Updated Sat, 11 Mar 2017 11:28 PM IST
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All equation collapsed, lotus zilla
Modi - फोटो : Self
विधान सभा चुनाव में परिणाम से पहले राजनीतिक जानकार तमाम कयास लगा रहे थे। कहीं जातीयता का समीकरण तो कहीं ध्रुवीकरण को जीत का रास्ता बताया जा रहा था। लेकिन परिवर्तन की बयार कुछ ऐसी बही कि सारे समीकरण ध्वस्त हो गए। न तो जातीयता की गणित चल पाई और न धन व बल की ताकत। इस परिवर्तन की आंधी में आजादी के बाद पहली बार जिले की पांचों विधान सभा सीट पर कमल खिल गया। 
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बात शुरू करते हैं सदर सीट की। यहां बसपा के जितेंद्र कुमार उर्फ नंदू चौधरी जातीयता के बल पर दो बार विधायक बने थे। हालांकि जनता उनके कार्य से नाखुश थी, मगर पिछली बार भी जातीय गणित के सहारे विधान सभा चुनाव की वैतरणी पार कर ली थी। इस बार भी वे उसी फार्मूले पर चुनाव मैदान में उतरे थे, मगर यहां उनकी गणित बिगाड़ने के लिए भाजपा ने सजातीय उम्मीदवार मैदान में उतारा। दूसरी ओर सपा के महेंद्र नाथ यादव  पहली बार चुनाव मैदान में थे। हालांकि युवा चेहरा होने के कारण इन पर पार्टी ने दांव लगाया था, और ध्रुवीकरण के समीकरण को जीतने का रास्ता बनाकर वे आगे बढ़े जरूर, मगर उन्हें भी हार के सिवा कुछ नसीब नहीं हुआ। 
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कप्तानगंज विधान सभा से उम्मीदवार और बसपा सरकार में खाद्य रसद मंत्री रह चुके राम प्रसाद भी जातीय समीकरण के खिलाड़ी रह चुके हैं। इसी दांव के सहारे वे23 साल से विरोधियों को मात देते रहे हैं, मगर इस बार परिवर्तन की बयार में उनका दाव भी नहीं चला। सपा कांग्रेस के साझा उम्मीदवार राना कृष्ण किंकर सिंह भी दो बार अपने व्यक्तित्व के बलबूते निर्दल प्रत्याशी के रूप में विधान सभा का नेतृत्व कर चुके हैं। इस बार वे गठबंधन के सहारा लेकर मैदान में उतरे थे, मगर भाजपा की आंधी में एक न चली। सारे समीकरण ध्वस्त हो गए और जनता ने भाजपा उम्मीदवार सीपी शुक्ल पर भरोसा जता दिया। 
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हर्रैया विधान सभा से खम ठोकने वाले और प्रदेश सरकार में खासी दखल रखने वाले सपा के उम्मीदवार राजकिशोर सिंह जीत की हैट्रिक लगा चुके थे। लेकिन धन और बल और क्षेत्रीय विकास के सहारे अब तक चुनावी वैतरणी पार करने में सक्षम राजकिशोर को भाजपा के अजय सिंह ने बड़े मतों के अंतर से हरा दिया। यहां बसपा के विपिन शुक्ल का पांव मतदान में कहीं जम नहीं सका। हालांकि विपिन इस बार जातीय गणित के बदौलत अपनी जीत पक्की मान रहे थे, मगर जनता ने उन्हें तीसरे पायदान पर लाकर पटक दिया। 

महादेवा विधान सभा सीट पर भी भाजपा ने सभी दिग्गजों को पटखनी दी है। यहां प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री रामकरन आर्य व बसपा के दूधराम जातीयता के सहारे गणित बैठा रहे थे। यही नहीं अल्पसंख्यकों को लुभा कर अपनी रोटी सेंकने के चक्कर में बसपा व सपा ने कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी, मगर जनता ने इन दोनो पुराने चेहरों को नकार कर भाजपा के युवा नेता रवि सोनकर पर भरोसा जताते हुए विधान सभा की बागडोर थमा दी है। अब तक के हुए चुनावों मे यहां कभी सपा के रामकरन आर्य तो कभी दूधराम जीतते रहे हैं, मगर इस बार दोनो का दांव असफल रहा। उन्हें भाजपा ने यहां करारी शिकस्त दे दी है। 

विधान सभा रूधौली में यूं तो कांग्रेस सपा गठबंधन ने अल्पसंख्यक उम्मीदवार पर दांव लगाया। इसके गणित थी कि सपा के परंपरागत मतों के साथ मुस्लिम गठजोड़ कोई करिश्मा जरूर दिखाएगा, मगर बाजी पलट गई। उम्मीदवार को जनता ने नकारते हुए तीसरे नंबर पर पहुंचा दिया। वहीं दूसरी ओर अल्पसंख्यक, दलित व कुर्मी की तिकड़ी के सहारे चुनावी दंगल में भाग्य आजमाने उतरे पूर्व विधायक राजेंद्र चौधरी का सभी दांव विफल हो गया। यहां भी परिवर्तन ने कमल खिलाया। हालांकि पार्टी ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए विधायक संजय प्रताप पर दांव लगाया था, यह दांव कामयाब रहा। जनादेश भाजपा के पक्ष में रहा और बसपा के राजेंद्र चौधरी तथा गठबंधन के सईद अहमद चुनाव हार गए।
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