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Basti News: हमदर्द बनकर मरीजों का ‘दर्द’ बढ़ा रहे दलाल
Mon, 17 Mar 2025 12:10 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Mon, 17 Mar 2025 12:10 AM IST
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बस्ती। सरकारी अस्पतालों में नक्कालों से सावधान जैसा बोर्ड तो नहीं है, लेकिन इस पर ध्यान देना जरूरी है। क्योंकि धोखा देने वालों ने यहां भी अपना जाल बिछा रखा है।
यदि कोई अपरिचित हमदर्द बनकर दर्द बांटने या कम करने के लिए कुछ सलाह दे तो उसे मानने से पहले एक बार जरूर सोच-समझ लीजिए। वरना आप मरीज माफिया के चंगुल में फंस जाएंगे।
सरकारी अस्पतालों में चिकित्सक के इर्द-गिर्द से लेकर परिसर तक मरीज माफियाओं के एजेंट घूम रहे हैं। यह किसी न किसी बहाने मरीज और तीमारदार के संपर्क में आ ही जा रहे हैं। मुकम्मल इलाज का भरोसा देकर यह मरीज को निजी अस्पताल पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
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पिछले कुछ माह में सामनेे आए मामले इसकी गवाही दे रहे हैं। जिला महिला चिकित्सालय, जिला अस्पताल और ओपेक चिकित्सालय कैली हर जगह यह खेल चल रहा है। इन मरीज माफिया की जाल में फंसने वाले ग्रामीण क्षेत्र के ज्यादातर मरीज होते हैं। इनके बहकावे में प्रतिदिन 20 से 25 मरीज आते हैं।
झांसे में आकर निजी अस्पताल पहुंचे मरीज के तीमारदारों से इलाज के नाम पर जमकर उगाही की जाती है। इसमें इन दलालों का अच्छा खासा कमीशन शामिल रहता है।
ओपीडी से लेकर इमरजेंसी सेवा तक कैरियर के रूप में दलाल मौजूद रह रहे हैं। डॉक्टरों एवं चिकित्सकीय स्टाफ के इर्द-गिर्द इन्हें अक्सर देखा जाता है। अस्पताल में नए मरीज के आते ही यह सक्रिय हो जाते हैं। पहले तीमारदारों के करीब पहुंचकर सेवा भाव का दिखावा करते हैं। विश्वास जमते ही अमुक निजी अस्पताल में चलने का सुझाव देते हैं।
जिला महिला चिकित्सालय में निजी अस्पतालों की ओर से महिला एजेंट मौजूद रहती हैं। प्रसूताओं के दाखिल होते ही तीमारदार से बातचीत के दौरान घुलने-मिलने की कोशिश करतीं हैं। अस्पताल के अंदर की बदइंतजामी बयां करके उसे टटोलती हैं। अगर उसने थोड़ी भी दिलचस्पी दिखाई तो मरीज को निजी अस्पताल में भर्ती कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देती हैं।
यही हाल ओपेक चिकित्सालय और जिला चिकित्सालय का भी है। इन अस्पतालों के ओपीडी में ज्यादा मेडिकल स्टोर के कैरियर मौजूद रहते हैं। यह मरीज को दिखाने से लेकर जांच कराने तक का जिम्मा लेते हैं।
एंबुलेंस चालकों की भी रहती है भूमिका ः सरकारी अस्पतालों के बाहर निजी एंबुलेंस चालकों की भी मरीजों को निजी अस्पतालों में पहुंचाने की अहम भूमिका रहती है। तीमारदार इन्हें गोरखपुर या लखनऊ के लिए बुक करते हैं तो वे मरीज को चहेते अस्पताल में ले जाने के लिए दिमागी कसरत शुरू कर देते हैं। यदि सफल हो गए तो बिना लंबी दूरी तय किए ही इनका भी काम बन जाता है।
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यदि कोई अपरिचित हमदर्द बनकर दर्द बांटने या कम करने के लिए कुछ सलाह दे तो उसे मानने से पहले एक बार जरूर सोच-समझ लीजिए। वरना आप मरीज माफिया के चंगुल में फंस जाएंगे।
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सरकारी अस्पतालों में चिकित्सक के इर्द-गिर्द से लेकर परिसर तक मरीज माफियाओं के एजेंट घूम रहे हैं। यह किसी न किसी बहाने मरीज और तीमारदार के संपर्क में आ ही जा रहे हैं। मुकम्मल इलाज का भरोसा देकर यह मरीज को निजी अस्पताल पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
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पिछले कुछ माह में सामनेे आए मामले इसकी गवाही दे रहे हैं। जिला महिला चिकित्सालय, जिला अस्पताल और ओपेक चिकित्सालय कैली हर जगह यह खेल चल रहा है। इन मरीज माफिया की जाल में फंसने वाले ग्रामीण क्षेत्र के ज्यादातर मरीज होते हैं। इनके बहकावे में प्रतिदिन 20 से 25 मरीज आते हैं।
झांसे में आकर निजी अस्पताल पहुंचे मरीज के तीमारदारों से इलाज के नाम पर जमकर उगाही की जाती है। इसमें इन दलालों का अच्छा खासा कमीशन शामिल रहता है।
ओपीडी से लेकर इमरजेंसी सेवा तक कैरियर के रूप में दलाल मौजूद रह रहे हैं। डॉक्टरों एवं चिकित्सकीय स्टाफ के इर्द-गिर्द इन्हें अक्सर देखा जाता है। अस्पताल में नए मरीज के आते ही यह सक्रिय हो जाते हैं। पहले तीमारदारों के करीब पहुंचकर सेवा भाव का दिखावा करते हैं। विश्वास जमते ही अमुक निजी अस्पताल में चलने का सुझाव देते हैं।
जिला महिला चिकित्सालय में निजी अस्पतालों की ओर से महिला एजेंट मौजूद रहती हैं। प्रसूताओं के दाखिल होते ही तीमारदार से बातचीत के दौरान घुलने-मिलने की कोशिश करतीं हैं। अस्पताल के अंदर की बदइंतजामी बयां करके उसे टटोलती हैं। अगर उसने थोड़ी भी दिलचस्पी दिखाई तो मरीज को निजी अस्पताल में भर्ती कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देती हैं।
यही हाल ओपेक चिकित्सालय और जिला चिकित्सालय का भी है। इन अस्पतालों के ओपीडी में ज्यादा मेडिकल स्टोर के कैरियर मौजूद रहते हैं। यह मरीज को दिखाने से लेकर जांच कराने तक का जिम्मा लेते हैं।
एंबुलेंस चालकों की भी रहती है भूमिका ः सरकारी अस्पतालों के बाहर निजी एंबुलेंस चालकों की भी मरीजों को निजी अस्पतालों में पहुंचाने की अहम भूमिका रहती है। तीमारदार इन्हें गोरखपुर या लखनऊ के लिए बुक करते हैं तो वे मरीज को चहेते अस्पताल में ले जाने के लिए दिमागी कसरत शुरू कर देते हैं। यदि सफल हो गए तो बिना लंबी दूरी तय किए ही इनका भी काम बन जाता है।