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नहीं मिली एंबुलेंस सेवा, गई जान
Updated Tue, 11 Sep 2018 11:58 PM IST
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नहीं मिली एंबुलेंस, मरीज की मौत
प्वाइंटर
हादसे के बाद तीमारदारों ने 108 एंबुलेंस सेवा के लिए किया था फोन
दूसरे जिले में रेफर होने पर जटिल प्रक्रिया के चलते नहीं मिली सेवा
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। दुर्घटना हो या फिर कोई गंभीर बीमारी। अस्पताल तक पहुंच गए तो भी यह तय नहीं कि जीवन बच जाएगा, क्योंकि तमाम ऐसे रोग हैं, जिनका इलाज हर अस्पताल में संभव नहीं है। ऐसे में मरीज को डॉक्टर रेफर करता है। रेफर के बाद एंबुलेंस मिलने की जटिल प्रक्रिया में जान चली जाती है। ऐसा ही कुछ हुआ सब्जी बेच कर जीवन यापन करने वाले सफीउल्लाह (55) के साथ। एंबुलेंस नहीं मिली तो उसकी जान अस्पताल में ही चली गई।
दूसरे जनपद के लिए रेफर करने के बाद लखनऊ से एंबुलेंस आईडी दी जाती है। इस प्रक्रिया में करीब आधा घंटा लग जाता है। मरीज के परिवार के लोगों के सामने मुश्किल तब आती है, जब डॉक्टर लखनऊ रेफर करते हैं। रेफर करने के बाद 108 एंबुलेंस को फोन होते ही लखनऊ से पहले डॉक्टर से संपर्क किया जाता है। इसके बाद एसआईसी अथवा सीएमएस से अप्रूवल लेता है। इसके बाद लखनऊ आईडी जारी करता है और आईडी मिलने के बाद रेफर मरीज को एंबुलेंस संबंधित अस्पताल तक पहुंचाती है। इस प्रक्रिया के फेर में सोमवार को जिला अस्पताल में नरियांव निवासी सफीउल्लाह की मौत हो गई। सफीउल्लाह नरियांव चौराहे पर डीसीएम की चपेट में आ गए थे। परिवार के लोग जिला अस्पताल पहुंचाए। यहां तबीयत बिगड़ने पर उन्हें मेडिकल कॉलेज गोरखपुर रेफर कर दिया गया। प्रक्रिया से अंजान परिवार के लोगों ने 108 एंबुलेंस को फोन किया, मगर मरीज को घंटे भर से ज्यादा समय तक एंबुलेंस उपलब्ध नहीं हो सकी। नतीजतन, दोपहर दो बजे सफीउल्लाह ने दम तोड़ दिया।
सफीउल्लाह की दो पत्नियां हैं। दोनों से आठ बच्चे हैं। सभी नाबालिग हैं। मां वशीरन ने बताया कि सफीउल्लाह ही कमाते थे। एक पत्नी बोलने में असमर्थ है। ग्राम प्रधान नूरुलहुदा ने बताया कि मां को ही वृद्धावस्था पेंशन मिलती है। किसी प्रकार के सरकारी लाभ के लिए सफीउल्लाह ने कभी आवेदन ही नहीं किया था।
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हादसे के बाद तीमारदारों ने 108 एंबुलेंस सेवा के लिए किया था फोन
दूसरे जिले में रेफर होने पर जटिल प्रक्रिया के चलते नहीं मिली सेवा
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। दुर्घटना हो या फिर कोई गंभीर बीमारी। अस्पताल तक पहुंच गए तो भी यह तय नहीं कि जीवन बच जाएगा, क्योंकि तमाम ऐसे रोग हैं, जिनका इलाज हर अस्पताल में संभव नहीं है। ऐसे में मरीज को डॉक्टर रेफर करता है। रेफर के बाद एंबुलेंस मिलने की जटिल प्रक्रिया में जान चली जाती है। ऐसा ही कुछ हुआ सब्जी बेच कर जीवन यापन करने वाले सफीउल्लाह (55) के साथ। एंबुलेंस नहीं मिली तो उसकी जान अस्पताल में ही चली गई।
दूसरे जनपद के लिए रेफर करने के बाद लखनऊ से एंबुलेंस आईडी दी जाती है। इस प्रक्रिया में करीब आधा घंटा लग जाता है। मरीज के परिवार के लोगों के सामने मुश्किल तब आती है, जब डॉक्टर लखनऊ रेफर करते हैं। रेफर करने के बाद 108 एंबुलेंस को फोन होते ही लखनऊ से पहले डॉक्टर से संपर्क किया जाता है। इसके बाद एसआईसी अथवा सीएमएस से अप्रूवल लेता है। इसके बाद लखनऊ आईडी जारी करता है और आईडी मिलने के बाद रेफर मरीज को एंबुलेंस संबंधित अस्पताल तक पहुंचाती है। इस प्रक्रिया के फेर में सोमवार को जिला अस्पताल में नरियांव निवासी सफीउल्लाह की मौत हो गई। सफीउल्लाह नरियांव चौराहे पर डीसीएम की चपेट में आ गए थे। परिवार के लोग जिला अस्पताल पहुंचाए। यहां तबीयत बिगड़ने पर उन्हें मेडिकल कॉलेज गोरखपुर रेफर कर दिया गया। प्रक्रिया से अंजान परिवार के लोगों ने 108 एंबुलेंस को फोन किया, मगर मरीज को घंटे भर से ज्यादा समय तक एंबुलेंस उपलब्ध नहीं हो सकी। नतीजतन, दोपहर दो बजे सफीउल्लाह ने दम तोड़ दिया।
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सफीउल्लाह की दो पत्नियां हैं। दोनों से आठ बच्चे हैं। सभी नाबालिग हैं। मां वशीरन ने बताया कि सफीउल्लाह ही कमाते थे। एक पत्नी बोलने में असमर्थ है। ग्राम प्रधान नूरुलहुदा ने बताया कि मां को ही वृद्धावस्था पेंशन मिलती है। किसी प्रकार के सरकारी लाभ के लिए सफीउल्लाह ने कभी आवेदन ही नहीं किया था।
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