{"_id":"59b6d2ac4f1c1be27f8b60bf","slug":"191505153708-basti-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"बच्चें हैं तो शिक्षक नहीं, लैब है मगर उपकरण नहीं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बच्चें हैं तो शिक्षक नहीं, लैब है मगर उपकरण नहीं
Updated Mon, 11 Sep 2017 11:45 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बच्चें हैं शिक्षक नहीं, लैब है, उपकरण नहीं
बस्ती।
105 साल पुराने राजकीय इंटर कॉलेज का बुरा हाल है। कभी इस कॉलेज में प्रवेश के लिए मारामारी होती थी, आज कोई अभिभावक कराना नहीं चाहता। 15 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में फैले इस कॉलेज के पढ़ने वाले सात सौ बच्चों के लिए एक भी शौचालय नहीं है। कॉलेज पूरी तरह असुरक्षित है, बाउंड्रीवाल तक नहीं हैं। शिक्षकों और गैर शिक्षणेतर कर्मियों का अभाव है। 19 साल से साइंस के प्रवक्ता नहीं हैं, अन्य विषयों का भी यही हाल है। लैब में बच्चे तो मिले मगर उपकरण का अभाव रहा। छात्रावास में कैंटीन नहीं है, बच्चे घरों से अनाज लाकर खुद भोजन बनाते हैं। एक बेड पर तीन-तीन छात्र सो रहे हैं। यहां तक कि बिजली का भुगतान बच्चों के चंदे से होता है। खेल मैदान को लोगों ने मोटर वाहन ट्रेनिंग सेंटर और राजनीतिक मंच बना लिया है। यही हाल कॉलेज के साफ-सफाई का भी है।
कभी पढ़ाई और अनुशासन के मामले में पूरे मंडल में अव्वल रहने वाला राजकीय इंटर कॉलेज आज सरकारी उपेक्षाओं का शिकार हो गया है। दो हजार से अधिक बच्चों की क्षमता वाले इस कॅालेज में वर्तमान में मात्र सात सौ बच्चे हैं। इस कॉलेज में सब कुछ है, मगर धन और शिक्षकों के अभाव में अपनी पहचान खोता जा रहा है। साइंस वर्ग के बच्चे शिक्षक और लैब में उपकरण के लिए तरस रहे हैं। लैब में खाली बोतलों के अलावा कुछ भी नहीं है।
19 साल से विज्ञान प्रवक्ता नहीं
राजकीय इंटर कॉलेज में सबसे अधिक अभाव विषय विशेषज्ञ का है। हालत यह है कि पिछले 19 साल से कॉलेज में एक भी साइंस के प्रवक्ता की तैनाती नहीं गई, बाहर के शिक्षक से काम चलाया जा रहा है। हिंदी, जीवविज्ञान, कृषि, अंग्रेजी, गणित, संस्कृत, अर्थशास्त्र, वाणिज्य और भौतिक शास्त्र सहित 10 प्रवक्ता पिछले कई साल नहीं हैं। इसी तरह हिंदी के दो, संस्कृत के एक, विज्ञान गणित के दो, जीव विज्ञान के दो, कला के एक, उर्दू, वाणिज्य व कृषि के एक-एक और पांच सामाजिक विषय के सहायक अध्यापक वर्षों से नहीं हैं।
विज्ञापन
शिक्षणेतर कर्मियों भी कमी
शिक्षेणतर कर्मियों की कमी से प्रशासनिक कार्य भी बाधित हो रहा है। एक वरिष्ठ सहायक और चार चतुर्थ श्रेणी कर्मी के पद रिक्त हैं।
हाई स्कूल का परीक्षा परिणाम गिरा
शिक्षकों के अभाव का प्रभाव परीक्षा परिणाम पर पड़ रहा है। कभी हाई स्कूल और इंटर में शत-प्रतिशत परीक्षा परिणाम देने वाले इस कॉलेज में वर्ष 2017 में हाईस्कूल में मात्र 82 फीसद ही छात्र पास हुए। जबकि इंटर का शत-प्रतिशत परिणाम रहा। सुविधाओं के अभाव में कॉलेज का माहौल पठन-पाठन लायक नहीं बन पा रहा है।
खेल मैदान बना वाहन ट्रेनिंग सेंटर
बाउंड्री और गेट न होने के कारण पांच एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में फैला खेल का मैदान पिछले कई सालों से वाहन ट्रेनिंग सेंटर बन गया है, जिसके चलते बच्चे खेल नहीं पाते। इतना ही नहीं इस मैदान के बीचों-बीच एक बड़ा सा स्थायी मंच बन दिया गया है, जहां पर सभी बड़े नेताओं का भाषण होता है।
लैब में उपकरणों का अभाव
साइंस वर्ग के बच्चों के लिए बनाए गए प्रयोगशाला में बच्चे तो मिले मगर उपकरण नहीं मिले। लैब में खाली बोतलों और बीकरों के अतिरिक्त अन्य सुविधाएं नदारद रहीं। वाटर सप्लाई तक व्यवस्था नहीं है।
एक भी शौचालय नहीं
सात सौ बच्चों के बीच एक भी शौचालय नहीं हें। मजबूरी में बच्चे झाड़ियों के बीच जाते हैं। एक अधूरा शौचालय अवश्य मिला, बताया गया कि विधानसभा चुनाव के समय से ही इसका निर्माण नगरपालिका की ओर से कराया जा रहा है।
मोटर चलने पर ही बच्चे पीते हैं जल
कॉलेज परिसर में चार इंडिया मार्का हैंडपंप लगा हुआ है, मगर चारों खराब हैं, जो ठीक हैं भी वे दूषित पानी दे रहे हैं। बताया गया कि जब भी आवश्यकता होती है, मोटर चला दिया जाता है।
एक बेड पर सो रहे तीन बच्चे
पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग की ओर से बनाए गए छात्रावास में कुल 20 कमरे हैं। प्रत्येक कमरे में 10 तख्तों का इंतजाम है। छात्रावास में रहने वाले बच्चों की संख्या 31 है। इस तरह 10 बेड और पर 31 बच्चे सोते हैं। भोजन सामग्री से लेकर बनाने तक की व्यवस्था बच्चे अपने संसाधन से करते हैं।
बच्चों के चंदे से होता है बिजली बिल का भुगतान
छात्रावास के वार्डेन हीरालाल शर्मा ने बताया कि पिछले माह 11 हजार रुपये का बिजली बिल आया था, जिसे बच्चों के चंदे से भरा गया। कहते हैं कि हॉस्टल में सुविधा देने के मद में किसी प्रकार का धन नहीं आता है।
उपलब्ध संसाधनों में ही बेहतर देने का प्रयास
जीआईसी के प्रभारी प्रधानाचार्य शिव बहादुर सिंह ने बताया कि उपलब्ध संसाधनों में बेहतर परिणाम देने का प्रयास किया जा रहा है। शौचालय, गेट निर्माण और चहारदीवारी से लेकर रिक्त पदों की भर्ती के लिए कई बार लिखा जा चुका है।
पठन-पाठन कार्य हो रहा प्रभावित
कक्षा 11 और 12 में पढ़ने वाले मो. सलमान, मो. इस्माइल, सत्यम और गोविंद कुमार प्रजापति ने बताया कि अगर सरकार स्कूल की व्यवस्था पर ध्यान दे तो परीक्षा परिणाम भी बेहतर होता स्कूल की कोई हुई छवि भी वापस होगी। कहते हैं शिक्षक का अभाव होने से पठन-पाठन प्रभावित हो रहा है।
छात्रावास के संचालन करने की जिम्मेदारी स्कूल की
पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के प्रभारी अधिकारी एजाजुल हक खान ने बताया कि विभाग की जिम्मेदारी सिर्फ छात्रावास भवन का निर्माण करते तक की थी। छात्रावास का संचालन करने की जिम्मेदारी स्कूल प्रबंधन की है।
विज्ञापन
बस्ती।
105 साल पुराने राजकीय इंटर कॉलेज का बुरा हाल है। कभी इस कॉलेज में प्रवेश के लिए मारामारी होती थी, आज कोई अभिभावक कराना नहीं चाहता। 15 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में फैले इस कॉलेज के पढ़ने वाले सात सौ बच्चों के लिए एक भी शौचालय नहीं है। कॉलेज पूरी तरह असुरक्षित है, बाउंड्रीवाल तक नहीं हैं। शिक्षकों और गैर शिक्षणेतर कर्मियों का अभाव है। 19 साल से साइंस के प्रवक्ता नहीं हैं, अन्य विषयों का भी यही हाल है। लैब में बच्चे तो मिले मगर उपकरण का अभाव रहा। छात्रावास में कैंटीन नहीं है, बच्चे घरों से अनाज लाकर खुद भोजन बनाते हैं। एक बेड पर तीन-तीन छात्र सो रहे हैं। यहां तक कि बिजली का भुगतान बच्चों के चंदे से होता है। खेल मैदान को लोगों ने मोटर वाहन ट्रेनिंग सेंटर और राजनीतिक मंच बना लिया है। यही हाल कॉलेज के साफ-सफाई का भी है।
कभी पढ़ाई और अनुशासन के मामले में पूरे मंडल में अव्वल रहने वाला राजकीय इंटर कॉलेज आज सरकारी उपेक्षाओं का शिकार हो गया है। दो हजार से अधिक बच्चों की क्षमता वाले इस कॅालेज में वर्तमान में मात्र सात सौ बच्चे हैं। इस कॉलेज में सब कुछ है, मगर धन और शिक्षकों के अभाव में अपनी पहचान खोता जा रहा है। साइंस वर्ग के बच्चे शिक्षक और लैब में उपकरण के लिए तरस रहे हैं। लैब में खाली बोतलों के अलावा कुछ भी नहीं है।
विज्ञापन
19 साल से विज्ञान प्रवक्ता नहीं
राजकीय इंटर कॉलेज में सबसे अधिक अभाव विषय विशेषज्ञ का है। हालत यह है कि पिछले 19 साल से कॉलेज में एक भी साइंस के प्रवक्ता की तैनाती नहीं गई, बाहर के शिक्षक से काम चलाया जा रहा है। हिंदी, जीवविज्ञान, कृषि, अंग्रेजी, गणित, संस्कृत, अर्थशास्त्र, वाणिज्य और भौतिक शास्त्र सहित 10 प्रवक्ता पिछले कई साल नहीं हैं। इसी तरह हिंदी के दो, संस्कृत के एक, विज्ञान गणित के दो, जीव विज्ञान के दो, कला के एक, उर्दू, वाणिज्य व कृषि के एक-एक और पांच सामाजिक विषय के सहायक अध्यापक वर्षों से नहीं हैं।
विज्ञापन
शिक्षणेतर कर्मियों भी कमी
शिक्षेणतर कर्मियों की कमी से प्रशासनिक कार्य भी बाधित हो रहा है। एक वरिष्ठ सहायक और चार चतुर्थ श्रेणी कर्मी के पद रिक्त हैं।
हाई स्कूल का परीक्षा परिणाम गिरा
शिक्षकों के अभाव का प्रभाव परीक्षा परिणाम पर पड़ रहा है। कभी हाई स्कूल और इंटर में शत-प्रतिशत परीक्षा परिणाम देने वाले इस कॉलेज में वर्ष 2017 में हाईस्कूल में मात्र 82 फीसद ही छात्र पास हुए। जबकि इंटर का शत-प्रतिशत परिणाम रहा। सुविधाओं के अभाव में कॉलेज का माहौल पठन-पाठन लायक नहीं बन पा रहा है।
खेल मैदान बना वाहन ट्रेनिंग सेंटर
बाउंड्री और गेट न होने के कारण पांच एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में फैला खेल का मैदान पिछले कई सालों से वाहन ट्रेनिंग सेंटर बन गया है, जिसके चलते बच्चे खेल नहीं पाते। इतना ही नहीं इस मैदान के बीचों-बीच एक बड़ा सा स्थायी मंच बन दिया गया है, जहां पर सभी बड़े नेताओं का भाषण होता है।
लैब में उपकरणों का अभाव
साइंस वर्ग के बच्चों के लिए बनाए गए प्रयोगशाला में बच्चे तो मिले मगर उपकरण नहीं मिले। लैब में खाली बोतलों और बीकरों के अतिरिक्त अन्य सुविधाएं नदारद रहीं। वाटर सप्लाई तक व्यवस्था नहीं है।
एक भी शौचालय नहीं
सात सौ बच्चों के बीच एक भी शौचालय नहीं हें। मजबूरी में बच्चे झाड़ियों के बीच जाते हैं। एक अधूरा शौचालय अवश्य मिला, बताया गया कि विधानसभा चुनाव के समय से ही इसका निर्माण नगरपालिका की ओर से कराया जा रहा है।
मोटर चलने पर ही बच्चे पीते हैं जल
कॉलेज परिसर में चार इंडिया मार्का हैंडपंप लगा हुआ है, मगर चारों खराब हैं, जो ठीक हैं भी वे दूषित पानी दे रहे हैं। बताया गया कि जब भी आवश्यकता होती है, मोटर चला दिया जाता है।
एक बेड पर सो रहे तीन बच्चे
पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग की ओर से बनाए गए छात्रावास में कुल 20 कमरे हैं। प्रत्येक कमरे में 10 तख्तों का इंतजाम है। छात्रावास में रहने वाले बच्चों की संख्या 31 है। इस तरह 10 बेड और पर 31 बच्चे सोते हैं। भोजन सामग्री से लेकर बनाने तक की व्यवस्था बच्चे अपने संसाधन से करते हैं।
बच्चों के चंदे से होता है बिजली बिल का भुगतान
छात्रावास के वार्डेन हीरालाल शर्मा ने बताया कि पिछले माह 11 हजार रुपये का बिजली बिल आया था, जिसे बच्चों के चंदे से भरा गया। कहते हैं कि हॉस्टल में सुविधा देने के मद में किसी प्रकार का धन नहीं आता है।
उपलब्ध संसाधनों में ही बेहतर देने का प्रयास
जीआईसी के प्रभारी प्रधानाचार्य शिव बहादुर सिंह ने बताया कि उपलब्ध संसाधनों में बेहतर परिणाम देने का प्रयास किया जा रहा है। शौचालय, गेट निर्माण और चहारदीवारी से लेकर रिक्त पदों की भर्ती के लिए कई बार लिखा जा चुका है।
पठन-पाठन कार्य हो रहा प्रभावित
कक्षा 11 और 12 में पढ़ने वाले मो. सलमान, मो. इस्माइल, सत्यम और गोविंद कुमार प्रजापति ने बताया कि अगर सरकार स्कूल की व्यवस्था पर ध्यान दे तो परीक्षा परिणाम भी बेहतर होता स्कूल की कोई हुई छवि भी वापस होगी। कहते हैं शिक्षक का अभाव होने से पठन-पाठन प्रभावित हो रहा है।
छात्रावास के संचालन करने की जिम्मेदारी स्कूल की
पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के प्रभारी अधिकारी एजाजुल हक खान ने बताया कि विभाग की जिम्मेदारी सिर्फ छात्रावास भवन का निर्माण करते तक की थी। छात्रावास का संचालन करने की जिम्मेदारी स्कूल प्रबंधन की है।