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Bareilly News: समय के साथ बरेली कॉलेज में सिमटा फुटबॉल का खेल
Tue, 02 Jun 2026 12:34 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Updated Tue, 02 Jun 2026 12:34 AM IST
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बरेली। बरेली कॉलेज की पहचान एक समय पर खेल हुआ करते थे, जिसमें से एक पहचान फुटबॉल का खेल था। यहां तीन बजे के बाद खेल का माहौल था, जब कालीबाड़ी, सिटी, सुभाषनगर व स्टेशन समेत आसपास के क्षेत्र के युवा फुटबॉल खेलने व देखने के लिए लोगों की भीड़ जुट जाती थी। इसी मैदान से निकलकर खिलाड़ी संतोष ट्रॉफी व राष्ट्रीय स्तर के रेफरी तक पहुंचे। इन खिलाड़ियों का कहना है कि वर्तमान में जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो लगता है कि फुटबॉल की स्थिति बरेली कॉलेज में खत्म हो गई है। यहां न तो खेल का माहौल रह गया है न ही खिलाड़ी निकल रहे हैं।
वर्तमान में बदायूं में पुलिस विभाग में कार्यरत मनोज कुमार शर्मा 1994 में बरेली कॉलेज के फुटबॉल की पहचान रहे। उन्होंने 1994 में संतोष ट्रॉफी में भी प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया। मनोज का मानना है कि आज के समय में जिले में फुटबॉल के प्रति प्रेम कम होने का एक कारण बरेली कॉलेज का खेलों से दूरी बनाना है। एक समय था जब कॉलेज में तीन बजे के बाद आसपास से लड़कें फुटबॉल का अभ्यास करने आते थे। उन्हें निशुल्क एंट्री दी जाती। यदि वर्तमान में फिर से खेलों के लिए माहौल बनाया जाए तो यहां से खिलाड़ी निश्चित ही निकलेंगे।
बरेली कॉलेज के पूर्व कर्मचारी व फुटबॉल प्रशिक्षक एवं रेफरी रहे कमलेश पांडेय का भी मानना है कि कॉलेज में खेल का माहौल अब नाम मात्र रह गया है। करीब तीन साल पहले तक भी यहां से टीमें नॉर्थ जोन में जाया करती थी। बरेली कॉलेज से पूर्व में सबसे बड़ा नाम फुटबॉल में मुश्ताक अली का भी रहा है। यहां सुभाषनगर व आस-पास के निम्न वर्ग के बच्चे आकर खेलते थे, लेकिन वर्तमान में टीमें जुटाना भी काॅलेज के लिए मुश्किल होता है। वर्तमान में मात्र क्रिकेट के अलावा खिलाड़ी नहीं मिल रहे हैं। कमलेश ने बताया कि वह अपनी नौकरी के दौरान ही कॉलेज से राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में रेफरी की भूमिका निभा चुके हैं।
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वर्तमान में बदायूं में पुलिस विभाग में कार्यरत मनोज कुमार शर्मा 1994 में बरेली कॉलेज के फुटबॉल की पहचान रहे। उन्होंने 1994 में संतोष ट्रॉफी में भी प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया। मनोज का मानना है कि आज के समय में जिले में फुटबॉल के प्रति प्रेम कम होने का एक कारण बरेली कॉलेज का खेलों से दूरी बनाना है। एक समय था जब कॉलेज में तीन बजे के बाद आसपास से लड़कें फुटबॉल का अभ्यास करने आते थे। उन्हें निशुल्क एंट्री दी जाती। यदि वर्तमान में फिर से खेलों के लिए माहौल बनाया जाए तो यहां से खिलाड़ी निश्चित ही निकलेंगे।
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बरेली कॉलेज के पूर्व कर्मचारी व फुटबॉल प्रशिक्षक एवं रेफरी रहे कमलेश पांडेय का भी मानना है कि कॉलेज में खेल का माहौल अब नाम मात्र रह गया है। करीब तीन साल पहले तक भी यहां से टीमें नॉर्थ जोन में जाया करती थी। बरेली कॉलेज से पूर्व में सबसे बड़ा नाम फुटबॉल में मुश्ताक अली का भी रहा है। यहां सुभाषनगर व आस-पास के निम्न वर्ग के बच्चे आकर खेलते थे, लेकिन वर्तमान में टीमें जुटाना भी काॅलेज के लिए मुश्किल होता है। वर्तमान में मात्र क्रिकेट के अलावा खिलाड़ी नहीं मिल रहे हैं। कमलेश ने बताया कि वह अपनी नौकरी के दौरान ही कॉलेज से राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में रेफरी की भूमिका निभा चुके हैं।
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