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सुंदर स्कूल बना के दिया पर शिक्षक कौन देगा?
बरेली।
Updated Wed, 19 Apr 2017 01:33 AM IST
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सुंदर स्कूल बना के दिया पर शिक्षक कौन देगा?
- फोटो : Who will give the teacher a beautiful school?
शहर के उद्यमी हाजी शकील कुरैशी ने बुनियादी शिक्षा पर अपनी चिंता का इजहार करते एक सराहनीय पहल हुई। पुराने शहर में किराये के भवन में चल रहे प्राथमिक विद्यालय काजी टोला और शाहदाना के लिए उन्होंने करीब चालीस लाख रुपये खर्च कर एक साफ सुथरा नया भवन बनवा कर सरकार को भेंट किया। टाइल्स वाला फर्श, बच्चों के बैठने के लिए फर्नीचर, पंखे, साफ सुथरे शौचालय, एक आदर्श स्कूल की तस्वीर कैसी होती है यह स्कूल उसका उदाहरण कहा जा सकता है। बच्चे भी अच्छे और लगनशील हैं। उन्हें अपना स्कूल बहुत अच्छा लगता है। दो टीचर मेहनत से लगी हैं लेकिन जहां जिले के कई स्कूलों में बच्चे कम होने के बाद भी सुविधा शुल्क लेकर कई शिक्षकों को तैनाती दी गई है यहां 150 बच्चों की शिक्षा का जिम्मा सिर्फ दोे पर है।
पढ़ने की ललक है बच्चों मे
साफ सुथरे स्कूल कैंपस का बच्चों की मानसिकता और पढ़ने की ललक लगाने में कितना असरदार साबित होता है यहां के बच्चों का पढ़ाई का स्तर देखकर बखूबी पता किया जा सकता है। कक्षा तीन में पढ़ने वाला अदीब को अपने घर से ज्यादा स्कूल में अच्छा लगता है। अमूमन सरकारी स्कूलों में कक्षा छह सात के बच्चों को ठीक से पहाड़े नहीं आते पर अदीब को दस तक पहाड़े अच्छे से याद हैं। हिंदी अंग्रेजी लिखना जानता है। कक्षा पांच की मंतशा फातिमा से जब पूछा कि सबसे अच्छा क्या आता है उसने ब्लैकबोर्ड पर एक सुंदर ड्राइंग बना दी। नन्हीं शाकिबा कक्षा दो में पढ़ती है उसने अभी से ही ठान लिया कि उसे शिक्षक बनना है। कक्षा पांच की इलमा ने अपनी प्रतिभा को दिखाने के लिए झट से एक कविता सुना डाली। मंगलवार को यहां करीब 60 बच्चे मौजूद थे और औसतन सभी पढ़ने में ठीक हैं।
छुट्टी भी कैसे लें
प्राथमिक विद्यालय शाहदाना की इंचार्ज खुर्शीदा बेगम मोआल्लिम हैं। करीब सौ बच्चे शाहदाना स्कूल के नाम से पंजीकृत हैं। काजी टोला स्कूल की जिम्मेदारी सुनीता के पास हैं। एक शिक्षा मित्र है जो प्रसूति अवकाश पर है। दोनों शिक्षिकाओं के लिए 150 बच्चों को पढ़ाना मुश्किल होता है। कई बार बीएसए को लिखकर दिया लेकिन हल नहीं निकला। बच्चों को ठीक से पढ़ाया जा सके इसलिए दोनों ने अपनी तरकीब निकाली। दोनों स्कूलों के बच्चों को मिलाकर कक्षाएं लगाती हैं। खुर्शीदा बेगम कहती है कि कुछ माह पूर्व उनका ऑपेरशन हुआ पर स्कूल की खातिर उन्होंने ज्यादा आराम नहीं किया।
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कांवेंट स्कूल की तरह है भवन
पूरे कैंपस में टाइल्स का फर्श है। साफ सुथरे शौचालय हैं। छह पंखे लगे हैं। सभी छात्रों के बैठने के लिए फर्नीचर की व्यवस्था है। अच्छे ब्लैकबोर्ड हैं। पढ़ाई के साथ जो वक्त मिलता है बच्चों को एक्स्ट्रा कैरिकुलम एक्टिविटी कराई जाती हैं।
ग्रामीण क्षेत्र से शहर के स्कूलों में शिक्षकों को समायोजित करने की कोई नीति नहीं है। शहर में पहले से ही शिक्षक कम हैं। इसलिए इस तरह की दिक्कतें आ रही हैं। समायोजन की नीति आ जाती है तो दिक्कत ही खत्म हो जाएगी। मैं खुद इस स्कूल में जाऊंगी और जो बेहतर हो सकेगा किया जाएगा।
-चंदना राम इकबाल यादव, बीएसए
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पढ़ने की ललक है बच्चों मे
साफ सुथरे स्कूल कैंपस का बच्चों की मानसिकता और पढ़ने की ललक लगाने में कितना असरदार साबित होता है यहां के बच्चों का पढ़ाई का स्तर देखकर बखूबी पता किया जा सकता है। कक्षा तीन में पढ़ने वाला अदीब को अपने घर से ज्यादा स्कूल में अच्छा लगता है। अमूमन सरकारी स्कूलों में कक्षा छह सात के बच्चों को ठीक से पहाड़े नहीं आते पर अदीब को दस तक पहाड़े अच्छे से याद हैं। हिंदी अंग्रेजी लिखना जानता है। कक्षा पांच की मंतशा फातिमा से जब पूछा कि सबसे अच्छा क्या आता है उसने ब्लैकबोर्ड पर एक सुंदर ड्राइंग बना दी। नन्हीं शाकिबा कक्षा दो में पढ़ती है उसने अभी से ही ठान लिया कि उसे शिक्षक बनना है। कक्षा पांच की इलमा ने अपनी प्रतिभा को दिखाने के लिए झट से एक कविता सुना डाली। मंगलवार को यहां करीब 60 बच्चे मौजूद थे और औसतन सभी पढ़ने में ठीक हैं।
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छुट्टी भी कैसे लें
प्राथमिक विद्यालय शाहदाना की इंचार्ज खुर्शीदा बेगम मोआल्लिम हैं। करीब सौ बच्चे शाहदाना स्कूल के नाम से पंजीकृत हैं। काजी टोला स्कूल की जिम्मेदारी सुनीता के पास हैं। एक शिक्षा मित्र है जो प्रसूति अवकाश पर है। दोनों शिक्षिकाओं के लिए 150 बच्चों को पढ़ाना मुश्किल होता है। कई बार बीएसए को लिखकर दिया लेकिन हल नहीं निकला। बच्चों को ठीक से पढ़ाया जा सके इसलिए दोनों ने अपनी तरकीब निकाली। दोनों स्कूलों के बच्चों को मिलाकर कक्षाएं लगाती हैं। खुर्शीदा बेगम कहती है कि कुछ माह पूर्व उनका ऑपेरशन हुआ पर स्कूल की खातिर उन्होंने ज्यादा आराम नहीं किया।
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कांवेंट स्कूल की तरह है भवन
पूरे कैंपस में टाइल्स का फर्श है। साफ सुथरे शौचालय हैं। छह पंखे लगे हैं। सभी छात्रों के बैठने के लिए फर्नीचर की व्यवस्था है। अच्छे ब्लैकबोर्ड हैं। पढ़ाई के साथ जो वक्त मिलता है बच्चों को एक्स्ट्रा कैरिकुलम एक्टिविटी कराई जाती हैं।
ग्रामीण क्षेत्र से शहर के स्कूलों में शिक्षकों को समायोजित करने की कोई नीति नहीं है। शहर में पहले से ही शिक्षक कम हैं। इसलिए इस तरह की दिक्कतें आ रही हैं। समायोजन की नीति आ जाती है तो दिक्कत ही खत्म हो जाएगी। मैं खुद इस स्कूल में जाऊंगी और जो बेहतर हो सकेगा किया जाएगा।
-चंदना राम इकबाल यादव, बीएसए