{"_id":"57b372964f1c1ba2506eb4c2","slug":"who-can-not-return-the-case-against-virpal","type":"story","status":"publish","title_hn":"ऐसे वापस नहीं हो सकते वीरपाल के खिलाफ मामले","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
ऐसे वापस नहीं हो सकते वीरपाल के खिलाफ मामले
ब्यूरो, अमर उजाला बरेली
Updated Wed, 17 Aug 2016 01:37 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अपर न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम) शक्ति सिंह ने सपा जिलाध्यक्ष वीर पाल सिंह और उनके भतीजे के खिलाफ अदालत में चल रहे मुकदमे वापस लेने की अनुमति को जनहित का मामला न मानते हुए खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा है कि सरकार को ऐसी अनुमति प्रदान करने से पूर्व लोकहित का उल्लेख करना आवश्यक है। अदालत बिना किसी आधार के इन मुकदमों को वापस करने की अनुमति नहीं दे सकती। कोर्ट ने दोनों मामलों में आरोपियों को एक सितंबर को तलब किया है।
बदायूं निवासी नीलम सक्सेना व दरवेशी ने सुरेश शर्मा नगर के निकट अमर सहकारी आवास समिति से भूखंड 19 व 20 खरीदे थे। इनका आरोप है कि इस जमीन पर 27 जनवरी 2007 को नाजायज कब्जा करने की नीयत से बाउंड्री बना दी गई। ये दोनों महिलाएं जब मौके पर पहुंचीं तो निर्माणकर्ता ने बताया कि ये प्लाट सांसद (वीरपाल सिंह)के हैं। इन महिलाओं ने तमाम प्रशासनिक अधिकारियों से गुहार की। बाद में आई जी से गुहार की तो एसएसपी ने हस्तक्षेप कर 28 जून 2007 को सपा जिलाध्यक्ष एवं पूर्व सांसद वीरपाल सिंह यादव और उनके भतीजे गुड्डू यादव उर्फ आदेश यादव के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई और 11 अगस्त को आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया ।
25 जून 2014 को विशेष सचिव उत्तर प्रदेश शासन ने जिला प्रशासन को पत्र भेजकर निर्देश दिए कि कि शासन ने इन दोनों वादों को वापस लिये जाने की अनुमति दी है। शासन के आदेश पर तत्कालीन एडीएम (सिटी) आरपी सिंह ने अभियोजन अधिकारी को निर्देश दिए कि वह मुकदमा वापसी के लिए अदालत में आवेदन करें। उसी के तहत अभियोजन अधिकारी ने शासन और एडीएम सिटी दोनों के पत्र को संलग्न करके धारा 321 के तहत मुकदमे वापस लेने को प्रार्थना पत्र दिए । उन्होंने कहा कि उक्त मामलों में नोटिस नहीं दिया गया है इसलिए भी वाद चलने योग्य नहीं है। एसीजेएम शक्ति सिंह ने उच्च न्यायालयों व उच्चत्तम न्यायालय की कई नजीरों को संदर्भित करते हुए लिखा है कि न्यायालय के द्वारा लोक अभियोजक के आवेदन को यांत्रिक तरीके से स्वीकार नहीं किया जा सकता है। ऐसा अनुमति प्रदान करने से पहले न्यायालय को सर्वप्रथम यह देखना है कि क्या वास्तव में लोकहित का प्रश्न निहित है तथा इससे किन उद्देश्यों की पूर्ति होगी। एसीजेएम ने आदेश में यह भी लिखा है कि अभियोजन अधिकारी तथा शासन के पत्र में कोई जनहित तथा लोक हित स्पष्ट रूप से दर्शित नहीं किया गया है। जहां तक धारा 441 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत नोटिस नहीं दिए जाने का प्रश्न है, अभियुक्तगण को यह अवसर प्राप्त है कि वह विचारण के स्तर पर यदि कोई प्रक्रियात्मक त्रुटि रह गई है तो उसको न्यायालय के संज्ञान में ला सकता है। इसलिए शासन के पत्र में विशिष्ट रूप से लोक हित का उल्लेख किये बिना वाद वापस लेने की अनुमति दिया जाना न्यायोचित नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन
बदायूं निवासी नीलम सक्सेना व दरवेशी ने सुरेश शर्मा नगर के निकट अमर सहकारी आवास समिति से भूखंड 19 व 20 खरीदे थे। इनका आरोप है कि इस जमीन पर 27 जनवरी 2007 को नाजायज कब्जा करने की नीयत से बाउंड्री बना दी गई। ये दोनों महिलाएं जब मौके पर पहुंचीं तो निर्माणकर्ता ने बताया कि ये प्लाट सांसद (वीरपाल सिंह)के हैं। इन महिलाओं ने तमाम प्रशासनिक अधिकारियों से गुहार की। बाद में आई जी से गुहार की तो एसएसपी ने हस्तक्षेप कर 28 जून 2007 को सपा जिलाध्यक्ष एवं पूर्व सांसद वीरपाल सिंह यादव और उनके भतीजे गुड्डू यादव उर्फ आदेश यादव के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई और 11 अगस्त को आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया ।
विज्ञापन
25 जून 2014 को विशेष सचिव उत्तर प्रदेश शासन ने जिला प्रशासन को पत्र भेजकर निर्देश दिए कि कि शासन ने इन दोनों वादों को वापस लिये जाने की अनुमति दी है। शासन के आदेश पर तत्कालीन एडीएम (सिटी) आरपी सिंह ने अभियोजन अधिकारी को निर्देश दिए कि वह मुकदमा वापसी के लिए अदालत में आवेदन करें। उसी के तहत अभियोजन अधिकारी ने शासन और एडीएम सिटी दोनों के पत्र को संलग्न करके धारा 321 के तहत मुकदमे वापस लेने को प्रार्थना पत्र दिए । उन्होंने कहा कि उक्त मामलों में नोटिस नहीं दिया गया है इसलिए भी वाद चलने योग्य नहीं है। एसीजेएम शक्ति सिंह ने उच्च न्यायालयों व उच्चत्तम न्यायालय की कई नजीरों को संदर्भित करते हुए लिखा है कि न्यायालय के द्वारा लोक अभियोजक के आवेदन को यांत्रिक तरीके से स्वीकार नहीं किया जा सकता है। ऐसा अनुमति प्रदान करने से पहले न्यायालय को सर्वप्रथम यह देखना है कि क्या वास्तव में लोकहित का प्रश्न निहित है तथा इससे किन उद्देश्यों की पूर्ति होगी। एसीजेएम ने आदेश में यह भी लिखा है कि अभियोजन अधिकारी तथा शासन के पत्र में कोई जनहित तथा लोक हित स्पष्ट रूप से दर्शित नहीं किया गया है। जहां तक धारा 441 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत नोटिस नहीं दिए जाने का प्रश्न है, अभियुक्तगण को यह अवसर प्राप्त है कि वह विचारण के स्तर पर यदि कोई प्रक्रियात्मक त्रुटि रह गई है तो उसको न्यायालय के संज्ञान में ला सकता है। इसलिए शासन के पत्र में विशिष्ट रूप से लोक हित का उल्लेख किये बिना वाद वापस लेने की अनुमति दिया जाना न्यायोचित नहीं है।
विज्ञापन