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वीरेन डंगवाल की कर्मभूमि में वरिष्ठ साहित्यकारों ने सजायी यादों की महफिल

Sun, 21 Feb 2016 01:56 AM IST
बरेली
बरेली Updated Sun, 21 Feb 2016 01:56 AM IST
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Viren Dngwal Karmabhoomi senior litterateurs of the memories of the ceremony Sjayi
बरेली। कवि और पत्रकार स्वर्गीय वीरेन डंगवाल की कर्मभूमि बरेली में शनिवार को उनके मित्रों और चाहने वालों का मजमा जुटा। पहले उनकी यादें, थोड़ा विमर्श और रात में कवि सम्मेलन। पूरे दिन अपने प्रिय बरेली कॉलेज में वीरेन दा की यादें ताजा होती रहीं। उनके खास दोस्त आलोक धन्वा और मंगलेश डबराल ने संस्मरणों के साथ वीरेन डंगवाल के व्यक्तित्व को समग्र रूप में सामने रखा। लोगों ने वीरेन दा का पूरा परिचय ही नहीं पाया बल्कि उनकी कविताओं के अर्थ और संदर्भ भी विस्तार से जाने।
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मंच पर बैनर टंगा था- रहूंगा भीतर नमी की तरह। वीरेन दा कि इस लाइन पर उनके बारे में छपी पहली पुस्तक के विमोचन के लिए यह टांगा गया था लेकिन माहौल ऐसा बना कि वीरेन डंगवाल की वो नमी हर कोई महसूस करने लगा। कई बार कंठ अवरुद्ध भी हुए लेकिन घनघोर आशावादी वीरेन दा जैसे खुद ही दूसरों के मुंह से कहने लगे कि इतने कम वक्त में इतनी जी लिया ये क्या कम है।
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 आयोजन की शुरुआत प्रो. यूपी अरोड़ा के स्वागत वक्तव्य से हुई। उन्होंने वीरेन के बरेली से गहरे जुड़ाव को याद किया और बताया कि बरेली की गौरवशाली सहिष्णु साझी परंपरा उनके व्यक्तित्व में रची-बसी थी। आलोक धन्वा की शुरुआत काफी भावुक थी। वह बोले-हेमिंग्वे की तरह मेरा दोस्त कैंसर से लड़ा। मैंने उससे संपूर्ण जीवन व्यवहार सीखा। वीरेन सिर्फ खास तरह की राजनीति के कवि नहीं थे। वह ‘भारत दुर्दशा’ के कवि थे।  मीरा, कबीर और सूर की तरह ही वीरेन ने कविता का कठिन रास्ता चुना था। जिनके भीतर जिंदगी कम होती थी, वीरेन और उनकी कविताएं उनको संभालती थीं। वीरेन की कविताओं में फिल्म, नाटक, चित्रमयता, शृंगार की अनगिनत छायाएं मौजूद हैं। हिन्दी खड़ी बोली को जिस तरह से उन्होंने अपनी कविताओं में बरता, वह अद्वितीय है। इसी भाषा राशि से उन्होंने प्रेम के विरले छंद रचे, समाज की विडंबनाओं को चित्रित किया। वे कबीर की तरह ‘इश्क़ मस्ताना’ थे। जनांदोलनों से उनका गहरा आंतरिक रिश्ता था।
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 मंगलेश डबराल ने उनके साथ इलाहाबाद में बिताए, झंझावाती दिनों की याद करते हुए बताया कि हमने तीन साल में तीस साल का जीवन जिया। 70 के दशक के बदलावकारी हवाओं ने उसी समय मन-मिजाज और बोध को बदल दिया। वीरेन की रचनात्मकता के बहुत से छोर थे, कभी क्लासिकल, कभी तोड़फोड़ करने वाला। परस्पर विरोधी धाराएं उनके व्यक्तित्व में शामिल थीं। वीरेन ने अपनी कविता में नगण्यता का गुणगान किया। समोसा, जलेबी, पपीता जैसी चीजों पर उन्होंने कविताएं लिखीं। वह हमारे पीढ़ी का सबसे बड़ा आशावादी था।
वीरेन जी की पत्नी रीता डंगवाल ने उन्हें याद करते हुए कहा कि उनका जाना झूठ लगता है, लगता नहीं है कि वे चले गए हैं। अब मैं उनके विचारों को आगे बढ़ा सकूं, यही मेरा संकल्प है। वे इसी रूप में अब हमारे साथ हैं।
प्रख्यात आलोचक मधुरेश ने कहा कि स्वाद, दृश्य, गंध आदि के प्रति  वीरेन जी का अद्भुत लगाव था। वह बरेली से गहरे जुड़े रहे। यहां की संस्कृति के अछूते पहलुओं को उन्होंने पत्रकार के रूप में समझा और ऐसे लेखन को लगातार एक संपादक के रूप में बढ़ावा दिया। वीरेन डंगवाल ने जिस अंधेरी सत्ता की चेतावनी दी थी, वह आज सच साबित हो गई है।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए हिंदी के वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशी ने  कहा कि उनकी छोटी-छोटी कविताएं बेहद प्रभावशाली हैं। उनकी कविताओं का फलक बहुत बड़ा है। वह साहित्य के एक्टिविस्ट थे।
इस मौके बरेली कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सोमेश यादव समेत शहर के कई बुद्धिजीवी और  रचनाकार मौजूद रहे। इस सत्र का संचालन समकालीन जनमत पत्रिका के संपादक केके पांडेय ने किया।


 मेरा शिलाखंड गिर गया : सईद शेख
दूसरे सत्र ‘मानी पैदा करता जीवन’ में बोलते हुए वरिष्ठ साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी ने कहा कि वीरेन डंगवाल को बरेली के क्रांतिकारी इतिहास से गहरा जुड़ाव था और वे लगातार इस उद्यम में लगे रहते थे कि बरेली के इलाके की समृद्ध क्रांतिकारी विरासत को लोगों तक पहुंचाया जाए। वरिष्ठ कवि इब्बार रब्बी ने कहा कि जीवन को समझना और मनुष्य को जानना वीरेन को बेहद पसंद था। उनके काव्य संग्रह का प्रकाशन हिंदी की क्रांतिकारी घटना थी। वे अलमस्त दिखते जरूर थे, लेकिन उनमें मनुष्य, समाज और क्रांति के प्रति गहरी प्रतिबद्धता थी। आंदोलनों से उनका लगातार सक्रिय संबंध रहा। उनको याद करना मेरे लिए अपने सुनहरे दिनों की याद करना है। कवि एवं चित्रकार सईद शेख ने कहा, मैं दोस्तों को ऐसे शिलाखंडों की तरह देखता हूं, जिसके सहारे मैं टिका हूं। वीरेन के निधन से मैंने वह जमीन खो दी है। कथाकार प्रियदर्शन मालवीय ने कहा कि वीरेन उनके लिए ऐसे रंगरेज थे, जिन्होंने  उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया।  सत्र का संचालन जन संस्कृति मंच के प्रदेश अध्यक्ष कौशल किशोर ने की।   
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