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UP: आमने-सामने की जंग पर ध्रुवीकरण की छाया... दो धड़ों में बंटे रहे मतदाता; कम हुए मत फीसदी ने बढ़ाई धड़कनें

Wed, 08 May 2024 03:20 PM IST
शाहरुख खान शशांक मिश्र, अमर उजाला, बरेली
शशांक मिश्र, अमर उजाला, बरेली Published by: शाहरुख खान Updated Wed, 08 May 2024 03:20 PM IST
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सार
यूपी की इस लोकसभा सीट पर मतदान केंद्रों से लेकर सड़कों तक मतदाता दो धड़ों में बंटे रहे। हिंदू और मुस्लिम मतों का रुख अलग-अलग दिखाई दिया। मैदान से बाहर हो चुकी बसपा के आधार मतों में भी बिखराव दिखाई दिया।
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UP Lok Sabha Election Head-to-Head Battle  Decreased Voting Percentage Raises Concern
UP Lok Sabha Election - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कड़े इम्तिहान के बीच बरेली लोकसभा सीट पर मंगलवार को मतदान के साथ ही नए सियासी समीकरणों ने अपने पांव फैला दिए हैं। आमने-सामने की जंग पर ध्रुवीकरण की छाया मंडराती रही। आलम यह था कि मतदान केंद्रों से लेकर सड़कों तक मतदाता दो धड़े में बंटे रहे। 


ध्रुवीकरण का असर ऐसा रहा कि हिंदू और मुस्लिम मतों का रुख बेहद साफ था। नामांकन पत्र खारिज होने के बाद मैदान से बाहर हो चुकी बसपा के आधार मतों में भी बिखराव दिखा। बरेली लोकसभा सीट पर सपा और भाजपा की रोमांचक जंग में बसपा के आधार मतों ने काफी हद तक परिणाम की इबारत लिख दी है।




मतदाताओं ने खामोशी के साथ अपना फैसला ईवीएम में लॉक कर दिया है। मगर, बरेली के सियासी आसमान में सुबह से ही ध्रुवीकरण की चादर साफ दिखाई दी। सपा के पाले में मुस्लिम पूरी एकजुटता के साथ खड़े रहे। दूसरी तरफ भाजपा के पक्ष में हिंदू मतों में भी एकजुटता देखने को मिली।

दरअसल, चुनाव की शुरुआत से लेकर मतदान तक कई बार सियासी समीकरण ने करवट ली। सपा ने राजनीति के माहिर खिलाड़ी प्रवीण सिंह ऐरन को मैदान में उतारा और भाजपा ने आठ बार के सांसद संतोष गंगवार का टिकट काटकर पूर्व विधायक छत्रपाल सिंह गंगवार को मौका दिया।

सपा और कांग्रेस गठबंधन के साथ ही बसपा के मैदान से बाहर होने के बाद मुस्लिम मतों का संशय पहले दिन से ही समाप्त था। बसपा के आधार मतों में ज्यादातर लाभार्थी वर्ग होने की वजह से उनकी बड़ी संख्या का रुख साफ तौर पर समझा जा सकता है। 

 

दूसरी तरफ, नए प्रत्याशी के मैदान में आने के बाद भाजपा की अंतरकलह सामने आई, मगर मतदान से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रोड शो, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जनसभाएं, गृहमंत्री अमित शाह की रैली और अलग-अलग जाति के नेताओं को सक्रिय कर भाजपा ने अपनी पकड़ मजबूत की। यही कारण है कि मतदान के दिन भाजपा भी पूरी ताकत से मैदान में डटी रही।

बरेली में भी मोदी ही मुद्दा, मुसलमानों को बदलाव की उम्मीद
ध्रुवीकरण का असर यह रहा कि यहां दो धड़ों में बंटे मतदाताओं के मुद्दे भी उसी तर्ज पर रहे। ज्यादातर हिंदू मतों की ओर से प्रधानमंत्री मोदी को तीसरी बार पीएम बनाना एक बड़े मुद्दे के रूप में सामने आया। इसके अलावा देश की सुरक्षा, राष्ट्रीयता और सरकार के काम काज को भी मत का आधार बताया गया।

दूसरी तरफ, मुस्लिम मतदाता सरकार के खिलाफ मुखर दिखे। सांप्रदायिक सौहार्द की बिगड़ी तस्वीर का हवाला देकर उन्होंने बदलाव की उम्मीद भी जताई। हालांकि कई जगहों पर हिंदू मतदाताओं ने मंहगाई, बेरोजगारी, पेपर लीक तक के मुद्दे पर अपना वोट दिया। कई जगहों पर मुस्लिम भी विकास की राजनीति के समर्थन में दिखाई दिए।

दलित और सवर्ण मतदाताओं का रुख बनेगा आधार
भले ही राजनीतिक दल बरेली सीट पर कुर्मी, मुस्लिम और अन्य जातियों के आधार पर परिणाम का आकलन कर रहे हैं। मगर, इस बार बदले हुए समीकरण में दलित मतदाताओं के साथ ही सवर्ण वोटर्स का रुख भी बहुत कुछ तय करेगा।

नवाबगंज के युवा मनीष दीक्षित कहते हैं कि चुनाव में सभी अपनी जाति की बात करते हैं, मगर पिछले कुछ समय से सवर्णों की अनदेखी हो रही है। हमारे परिवार ने यह तय किया कि हम इसी को मुद्दा बनाएंगे। वोट देकर निकले मीरगंज के दुनका गांव निवासी सुरेश कुमार का कहना है कि हमारा प्रत्याशी तो था नहीं। जो लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं, हमने उनके खिलाफ ही वोट किया है।

शहर के तिलक इंटर कालेज के बूथ पर मिले सीनियर सिटीजन कैलाश कुमार का कहना है कि पिछली सरकारों में अराजकता को हम लोगों ने देखा है। पिछले कुछ सालों से सुकून का जीवन जी रहे हैं। हम तो ऐसा ही माहौल आगे भी चाहते हैं।

कैंट विधानसभा के ओल्ड वुडरो सीनियर सेकेंडरी स्कूल में बनाए गए बूथ पर मिले साबिर अली कहना है कि देश में सांप्रदायिक माहौल कैसा है, वह जगजाहिर है। मुसलमानों के साथ अन्याय तो हो रहा है और अब बदलाव तो चाहिए ही।

कम हुए मत फीसदी ने बढ़ाई धड़कनें
वर्ष 2019 के मुकाबले इस बार कम मतदान ने भाजपा और सपा के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। फिलहाल, पुराने आंकड़ों को देखा जाए तो बरेली लोकसभा सीट पर भाजपा के संतोष गंगवार ने पहली बार 1989 में जीत दर्ज की थी। इस चुनाव में इन्हें 14.93 फीसदी मत मिले थे।

इसके बाद उनके मत फीसदी में बढ़ोतरी होती गई। मगर, 2009 में कम मतदान के बाद 19.81 फीसदी मत ही उन्हें मिले। इस बार उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था। इसके बाद भाजपा ने अपने गढ़ को मजबूत किया और वर्ष 2014 में 42 व 2019 में 52 फीसदी मत पाकर जीत हासिल की। इस बार कम मत फीसदी के साथ ही मुस्लिम मतों के उत्साह से भी धड़कने बढ़ी हैं।

 

ध्रुवीकरण की आंधी के बीच बिखराव का भी नजारा
ध्रुवीकरण की आंधी के बीच कई जगहों पर मतों में बिखराव का भी नजारा था। शहर के कई ऐसे इलाके रहे जहां पर मुस्लिमों ने कमल पर मुहर लगाई। किला क्षेत्र मुस्लिम बहुल इलाका है। यहां के कई मुस्लिमों ने भाजपा को वोट दिया। पुराना शहर के नई बस्ती, चक महमूद के दो परिवारों सहित दूसरे मुस्लिमों ने भी भाजपा को वोट दिया। वहीं, ग्रामीण इलाकों में सवर्ण मतदाताओं का रुझान सपा की ओर दिखाई दिया।
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