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Bareilly News: कहानियों तक सिमटकर रह गई टेसू विवाह की परंपरा

Wed, 25 Oct 2023 12:59 AM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली Updated Wed, 25 Oct 2023 12:59 AM IST
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Tesu marriage tradition remained limited to stories
बरेली। कालीबाड़ी मंदिर के सामने रावण के पुतलों के साथ ही मिट्टी के सिर वाले छोटे-छोटे पुतले भी बिक रहे थे। बच्चों के मन में उत्सुकता हुई तो दुकानदारों से इन पुतलों के बारे में पूछा। इस पर जवाब मिला कि इन्हें टेसू कहते हैं। इनकी पूजा की जाती है। इस दौरान कम कीमत होने के कारण कई लोग इन्हें खरीदकर ले गए। उनमें से अधिकतर लोगों को इसके इतिहास के बारे में जानकारी नहीं थी।
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हिंदी लोक साहित्य में रुचि रखने वाले शहर के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. शरद अग्रवाल ने बताया कि नवरात्र के पहले दिन से लेकर शरद पूर्णिमा तक टेसू की पूजा की जाती है। शरद पूर्णिमा के दिन टेसू और सांझी का विवाह होता है। नवरात्र में छोटे लड़के तीन खपच्चियों पर टेसू का शीश सा बनाकर टोलियों में घर-घर घूमकर पैसे मांगते हैं। छोटी लड़कियां एक छेदों वाली छोटी मटकी में दिया जलाकार टेसू की पत्नी सांझी के नाम पर पैसे मांगती हैं। टेसू गीतों में बेसिर-पैर की तुकबंदी होती है।
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शरद पूर्णिमा की रात को जमा किए गए धन से टेसू की बरात निकाली जाती है। उधर लड़कियां भी जमा किए गए धन से सांझी के विवाह की तैयारी करती हैं। किसी सार्वजनिक स्थान पर धूमधाम से टेसू और सांझी का विवाह कर दिया जाता है। उसके बाद उनका विसर्जन कर दिया जाता है। कालीबाड़ी में पुतले बेचने वाले बाबू कुमार ने बताया कि टेसू की कीमत 100 रुपए से शुरू होती है। अधिकतर लोग बच्चों के लिए इन्हें खिलौने के रूप में खरीदते हैं। हालांकि कुछ घरों में अब भी पारंपरिक रूप से टेसू पूजन किया जाता है।
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करगैना निवासी सत्य प्रकाश ने बताया कि उन्हें इसका नाम पता है, लेकिन इसके पीछे की पूरी कहानी के बारे में जानकारी नहीं है। वहीं, मढ़ीनाथ निवासी दुष्यंत ने बताया कि बच्चों के लिए यह छोटा पुतला आकर्षण का केंद्र है। इसे देखा तो है पर इसके बारे में जानकारी नहीं है।


महाभारत से है जुुड़ाव
टेसू का नाता महाभारत से है। कहा जाता है कि टेसू जिनका वास्तविक नाम बर्बरीक था। वे परमवीर और महादानी थे। उन्होंने अपनी मां को वचन दिया था कि महाभारत में जिसकी सेना हार रही होगी, वह उसकी ओर से युद्ध लड़ेंगे। भगवान श्रीकृष्ण को पता था कि अगर बर्बरीक कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ेंगे तो वह एक दिन में ही महाभारत युद्ध समाप्त कर देंगे। पांडवों की हार होगी। इसलिए उन्होंने बर्बरीक से उनका सिर मांग लिया। बर्बरीक ने सिर भगवान को अर्पित कर दिया, लेकिन उन्होंने महाभारत का युद्ध देखने की इच्छा जाहिर की। इस पर बर्बरीक के सिर को तीन डंडियों के सहारे पर्वत पर रख दिया, जहां से उन्होंने पूरा महाभारत देखा। भगवान कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलयुग में खाटू श्याम के नाम से उनकी पूजा की जाएगी।
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