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दूसरों का घर सजाने वालों के खुद के घर में नहीं जल रहे चूल्हे
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कुसुमा अपने दोनों बच्चों के साथ।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
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लॉकडाउन में शादियां न होने से टेंट कामगार भी हुए अब कर्जदार
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सरकार से मदद की उम्मीद कर रहे हैं दौली रघुवर दयाल के ग्रामीण
बरेली। शादी ब्याह का अनिवार्य हिस्सा मैरिज लॉन, गेस्ट हाउस, कैटरर्स, टेंट हाउस, शहनाई और बैंड बाजे वाले होते हैं। इन सभी को लॉकडाउन ने पूरी तरह लॉक कर दिया है। इस कारोबार से जुड़े लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। टेंट लगाने का काम करने वाले कामगार इस समय बेकार हो गए हैं। कर्जदार हो गए हैं, घर में एक समय की रोटी बनना भी इनके यहां मुश्किल हो गया है। बस घरों में बैठे सब कुछ सामान्य होने का इंतजार कर रहे हैं। कहीं कोई मजदूरी मिल जाती है तो कर लेते और किसी तरह घर की रोटी चला रहे हैं। सरकार से उम्मीद कर रहे हैं कि उन्हें शायद कुछ मदद मिल सके। अमर उजाला की टीम गुरुवार को जनपद के गांव दौली रघुवर दयाल पहुंची। यहां इस गांव में करीब दो सौ से अधिक लोग सिर्फ टेंट लगाने के काम से जुड़े हुए हैं। इस समय इनके यहां रोटी का संकट है। करन, अशोक ने बताया कि गांव के कामगार कानपुर, नैनीताल और हल्द्वानी तक काम करने जाते हैं।
लल्ला मेरो तो बस भगवान ही है...
करीब 70 वर्षीय दुलारी दिव्यांग नाती के साथ टूटी खपरैल नुमा झोपड़ी में रहती हैं। रोजी रोटी का कोई साधन नहीं। नाती सुनने और बोलने में अक्षम है, लेकिन गांव के अन्य कामगारों के साथ वह भी टोली में रहकर टेंट लगाने के काम में लगा रहता है। इससे उसे जो मजदूरी मिल जाती है उससे ही दोनों का गुजर बसर हो जाता है। दुलारी कहती हैं कि मेरो तो कोई नहीं, बस भगवान ही है। पहले नाती कुछ दिन काम करने जाता था तो रोटी चल जाती थी। इस बार सब बंद है तो रोटी का भी संकट है। बताया कि कई बार दो-दो दिनों तक घर में रोटी नहीं पकती। पड़ोसियों की मदद से किसी तरह रोटी का प्रबंध होता है। गुरुवार को सुबह नौ बजे तक सिर्फ आलू ही उबाले थे, आटा नहीं था कहा कि बस यही नमक के साथ खा लेंगे।
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पति रोजाना मजदूरों के अड्डे जा रहे हैं, पर नहीं मिल रहा काम
दिनेश पहले सहालग के समय टेंट लगाने के काम में लगे रहते थे। इससे जो जमा पूंजी होती थी। उससे घर परिवार चल रहा था। जब सहालग नहीं होती तो गांव के खेतों में या कहीं निर्माण स्थान पर मजदूरी कर लेते थे। इधर अब बेकार हो गए हैं कोई काम नहीं तो पत्नी कुसुमा ने रोटी भी एक समय ही बनाना शुरू कर दिया है। सरकारी राशन कार्ड में नाम भी नहीं है तो राशन की मदद भी नहीं मिल रही है। दिनेश के तीन बच्चे हैं, लेकिन इस समय सभी किसी तरह एक समय खाकर ही समय गुजार रहे हैं। सुबह दस बजे तक खाने का कोई प्रबंध नहीं हो सका था। कुसुमा ने बताया कि इस बार टेंट का काम नहीं हुआ तो पति रोज शहर में मजदूर अड्डे पर जाते हैं, लेकिन काम नहीं मिल रहा है। रोजाना खाली हाथ लौट आते हैं।
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मवेशियों तक को चारा नहीं बचो
सुशीला अपने दो मवेशियों को गंगा किनारे छोड़कर आ रही हैं। कहती हैं कि घर में दो बेटे हैं। दोनो टेंट कामगार से जुड़े थे। इस समय बेकार बैठे हैं। कहती हैं रोटी की किल्लत है। खुद तो भूखे रह भी लें, लेकिन घर में छोटे-छोटे चार बच्चे हैं। उन्हें कैसे भूखा रखें। कहती हैं कि सुबह होते ही मवेशियों को गंगा किनारे छोड़ आती हैं, जिससे वह कुछ घास खा लें। अब उन्हें खिलाने को घर में कुछ नहीं बचा है। शाम को मवेशियों को फिर ढूंढ लाती हैं। कहती हैं कि यही स्थिति और कुछ दिन रही तो जी भी नहीं सकेंगे। सरकार को हम जैसे कामगारों की कुछ मदद करनी चाहिए।
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सरकार से मदद की उम्मीद कर रहे हैं दौली रघुवर दयाल के ग्रामीण बरेली। शादी ब्याह का अनिवार्य हिस्सा मैरिज लॉन, गेस्ट हाउस, कैटरर्स, टेंट हाउस, शहनाई और बैंड बाजे वाले होते हैं। इन सभी को लॉकडाउन ने पूरी तरह लॉक कर दिया है। इस कारोबार से जुड़े लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। टेंट लगाने का काम करने वाले कामगार इस समय बेकार हो गए हैं। कर्जदार हो गए हैं, घर में एक समय की रोटी बनना भी इनके यहां मुश्किल हो गया है। बस घरों में बैठे सब कुछ सामान्य होने का इंतजार कर रहे हैं। कहीं कोई मजदूरी मिल जाती है तो कर लेते और किसी तरह घर की रोटी चला रहे हैं। सरकार से उम्मीद कर रहे हैं कि उन्हें शायद कुछ मदद मिल सके। अमर उजाला की टीम गुरुवार को जनपद के गांव दौली रघुवर दयाल पहुंची। यहां इस गांव में करीब दो सौ से अधिक लोग सिर्फ टेंट लगाने के काम से जुड़े हुए हैं। इस समय इनके यहां रोटी का संकट है। करन, अशोक ने बताया कि गांव के कामगार कानपुर, नैनीताल और हल्द्वानी तक काम करने जाते हैं।
लल्ला मेरो तो बस भगवान ही है...
करीब 70 वर्षीय दुलारी दिव्यांग नाती के साथ टूटी खपरैल नुमा झोपड़ी में रहती हैं। रोजी रोटी का कोई साधन नहीं। नाती सुनने और बोलने में अक्षम है, लेकिन गांव के अन्य कामगारों के साथ वह भी टोली में रहकर टेंट लगाने के काम में लगा रहता है। इससे उसे जो मजदूरी मिल जाती है उससे ही दोनों का गुजर बसर हो जाता है। दुलारी कहती हैं कि मेरो तो कोई नहीं, बस भगवान ही है। पहले नाती कुछ दिन काम करने जाता था तो रोटी चल जाती थी। इस बार सब बंद है तो रोटी का भी संकट है। बताया कि कई बार दो-दो दिनों तक घर में रोटी नहीं पकती। पड़ोसियों की मदद से किसी तरह रोटी का प्रबंध होता है। गुरुवार को सुबह नौ बजे तक सिर्फ आलू ही उबाले थे, आटा नहीं था कहा कि बस यही नमक के साथ खा लेंगे।
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पति रोजाना मजदूरों के अड्डे जा रहे हैं, पर नहीं मिल रहा काम
दिनेश पहले सहालग के समय टेंट लगाने के काम में लगे रहते थे। इससे जो जमा पूंजी होती थी। उससे घर परिवार चल रहा था। जब सहालग नहीं होती तो गांव के खेतों में या कहीं निर्माण स्थान पर मजदूरी कर लेते थे। इधर अब बेकार हो गए हैं कोई काम नहीं तो पत्नी कुसुमा ने रोटी भी एक समय ही बनाना शुरू कर दिया है। सरकारी राशन कार्ड में नाम भी नहीं है तो राशन की मदद भी नहीं मिल रही है। दिनेश के तीन बच्चे हैं, लेकिन इस समय सभी किसी तरह एक समय खाकर ही समय गुजार रहे हैं। सुबह दस बजे तक खाने का कोई प्रबंध नहीं हो सका था। कुसुमा ने बताया कि इस बार टेंट का काम नहीं हुआ तो पति रोज शहर में मजदूर अड्डे पर जाते हैं, लेकिन काम नहीं मिल रहा है। रोजाना खाली हाथ लौट आते हैं।
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