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जीवन के सौंदर्य को दिखाता है- जाना था रोशनपुरा
बरेली
Updated Thu, 28 Jan 2016 02:24 AM IST
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बरेली। जाना था रोशनपुरा नाटक तीन लोगों के रिश्तों की कहानी है जो एक बहुत ही सकारात्मक संदेश देती है। कई बार हम जीवन में जो सोचते हैं वो नहीं होता पर जो होता है वो भी बहुत अच्छा होता है। यानि जीवन आशंकाओं और अनिश्चितताओं से भरा होते हुए भी बहुत सुंदर है। यहां तक मौत को भी सकारात्मक रूप में लेने का संदेश देता है यह नाटक।
यह नाटक यहां दया दृष्टि रंग मंडल की ओर से आयोजित थियेटर फेस्ट में किस्सागो थियेटर ग्रुप मुंबई की ओर से प्रस्तुत किया गया। जो हास्य और इमोशन से भरपूर रहा। एक तरफ जहां इस नाटक के चुटीले संवाद दर्शकों को हंसाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। वहीं कहानी कई बार ऐसे मोड़ से गुजरती है जो दर्शकों की आंखों को नम कर देती हैं। इसकी झलक दर्शकों के चेहरे पर साफ दिखाई देती रही।
कहानी की बात करें तो ईश्वर प्रसाद अवस्थी अपने दामाद चंदन श्रीवास्तव के साथ एक साल से एक घर में रह रहे हैं । साथ रहने की वजह उनकी बेटी पंजा है जो कैंसर की वजह से इस दुनिया में नही रही। मृत्यु से पहले उसने उन दोनों से वादा ले लिया था कि वो एक साल तक एक दूसरे के साथ एक ही घर में रहेंगे और एक दूसरे को पता नही चलने देंगे कि वो ऐसा उसके कहने पर कर रहे हैं।
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नाटक उस पूरे दिन को अपने में समेटे है जो उनके साथ रहने का आखिरी दिन है। आपसी मतभेदों और बिल्कुल अलग किस्म के व्यक्तित्व के दो लोगों ने कैसे वो साल साथ में बिताया होगा ये नाटक में बखूबी दर्शाया गया है। ईश्वर प्रसाद और चंदन के आपसी जटिल रिश्ते का अंत सुखद होता है। ईश्वर प्रसाद जो कि अपनी बेटी खो चुके हैं चंदन के रूप में बेटा पा लेते हैं और चंदन जिसके अपने पिता से कभी अच्छे संबन्ध नही रहे वो पिता पा लेता है।
समता सागर के लिखे नाटक का निर्देशन वीरेंद्र सक्सेना का रहा। मुख्य अतिथि एसआर इंटरनेशनल के निदेशक डा. आरके शर्मा ने वीरेंद्र सक्सेना व समता को बुके व शाल देकर सम्मानित किया। दया दृष्टि के चेयरमैन डा. ब्रिजेश्वर सिंह ने आभार व्यक्त किया। सीईओ शिखा सिंह के अनुसार बुधवार को -कहां गए मेरे उगना- नाटक का मंचन शाम 6.30 बजे से किया जाएगा।
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यह नाटक यहां दया दृष्टि रंग मंडल की ओर से आयोजित थियेटर फेस्ट में किस्सागो थियेटर ग्रुप मुंबई की ओर से प्रस्तुत किया गया। जो हास्य और इमोशन से भरपूर रहा। एक तरफ जहां इस नाटक के चुटीले संवाद दर्शकों को हंसाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। वहीं कहानी कई बार ऐसे मोड़ से गुजरती है जो दर्शकों की आंखों को नम कर देती हैं। इसकी झलक दर्शकों के चेहरे पर साफ दिखाई देती रही।
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कहानी की बात करें तो ईश्वर प्रसाद अवस्थी अपने दामाद चंदन श्रीवास्तव के साथ एक साल से एक घर में रह रहे हैं । साथ रहने की वजह उनकी बेटी पंजा है जो कैंसर की वजह से इस दुनिया में नही रही। मृत्यु से पहले उसने उन दोनों से वादा ले लिया था कि वो एक साल तक एक दूसरे के साथ एक ही घर में रहेंगे और एक दूसरे को पता नही चलने देंगे कि वो ऐसा उसके कहने पर कर रहे हैं।
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नाटक उस पूरे दिन को अपने में समेटे है जो उनके साथ रहने का आखिरी दिन है। आपसी मतभेदों और बिल्कुल अलग किस्म के व्यक्तित्व के दो लोगों ने कैसे वो साल साथ में बिताया होगा ये नाटक में बखूबी दर्शाया गया है। ईश्वर प्रसाद और चंदन के आपसी जटिल रिश्ते का अंत सुखद होता है। ईश्वर प्रसाद जो कि अपनी बेटी खो चुके हैं चंदन के रूप में बेटा पा लेते हैं और चंदन जिसके अपने पिता से कभी अच्छे संबन्ध नही रहे वो पिता पा लेता है।
समता सागर के लिखे नाटक का निर्देशन वीरेंद्र सक्सेना का रहा। मुख्य अतिथि एसआर इंटरनेशनल के निदेशक डा. आरके शर्मा ने वीरेंद्र सक्सेना व समता को बुके व शाल देकर सम्मानित किया। दया दृष्टि के चेयरमैन डा. ब्रिजेश्वर सिंह ने आभार व्यक्त किया। सीईओ शिखा सिंह के अनुसार बुधवार को -कहां गए मेरे उगना- नाटक का मंचन शाम 6.30 बजे से किया जाएगा।