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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Bareilly News ›   Sarvesh Gangwar a progressive farmer of Nawabganj in Bareilly is getting success by doing organic farming.

बुलंद इरादे: 'जवान' न बन सके सर्वेश तो प्रगतिशील किसान बन चमकाई किस्मत, कामयाब बन 250 किसानों को भी दिया 'उन्नति का मंत्र'

Mon, 06 Jun 2022 06:23 PM IST
आकाश दुबे अजीत प्रताप सिंह, बरेली
अजीत प्रताप सिंह, बरेली Published by: आकाश दुबे Updated Mon, 06 Jun 2022 06:23 PM IST
सार

बरेली के नवाबगंज के ग्रेम के रहने वाले सर्वेश गंगवार के अनुसार वह फौजी बनना चाहते थे। लेकिन सफलता नहीं बनने पर उन्होंने कृषि में रोजगार के उद्देश्य के साथ पूरी लगन से मेहनत की। सर्वेश ने जैविक खेती करके फसल में अच्छा मुनाफा कमाया। इसे बढ़ावा देने के लिए सर्वेश ने अब एक फर्म बनाकर लोगों को भी प्रशिक्षित कर रहे हैं। वह अब कृषि विभाग के कार्यक्रमों में किसानों को कृषि की नई तकनीक के बारे में समझाते हैं।

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Sarvesh Gangwar a progressive farmer of Nawabganj in Bareilly is getting success by doing organic farming.
प्रगतिशील किसान सर्वेश - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बरेली के सर्वेश का सपना था फौज में भर्ती होकर देश की सेवा करना। चार बार फौज की भर्ती में शामिल हुए। फिजिकल पास किया पर सफल नहीं हुए। निराश होने के बजाय उन्होंने गांव में खेती को रोजगार का जरिया बनाने की ठानी। जैविक खेती का तरीका सीखा। फसल लहलहाई तो उनकी किस्मत चमक गई। 26 साल की आयु में सर्वेश को कृषि विज्ञान केंद्र ने प्रगतिशील किसान का दर्जा प्रदान किया है।

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नवाबगंज के ग्रेम के रहने वाले सर्वेश गंगवार के मुताबिक इंटर पास कर वे फौज में भर्ती होना चाहते थे। चार बार बरेली समेत अलग-अलग जिलों में खुली भर्ती में शामिल हुए। हर बार शारीरिक परीक्षा पास की पर लिखित परीक्षा में फेल होते रहे। लगातार असफलता के बावजूद 'नर हो न निराश करो मन को' अवधारणा के साथ जुटे रहे। एमए करने के बाद खेती में ही कुछ अलग करने के उद्देश्य से वह आईवीआरआई स्थित कृषि विज्ञान केंद्र पहुंचे। वहां पूर्व में मौजूद प्रगतिशील किसानों से संपर्क हुआ तो उनसे प्रेरणा लेकर जैविक खेती की बारीकियां सीखीं।

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प्रशिक्षण के बाद उन्होंने जैविक खेती के लिए अपना पंजीकरण करा लिया। जैविक खेती करने से पहले गन्ने की फसल से कोई खास आय नहीं होती थी। प्रयोग के बाद अप्रत्याशित परिवर्तन नजर आया। गन्ने की वही फसल साल भर बाद तीन गुने दाम पर बिकी। उत्पादित गुड़ की कीमत बाजार में डेढ़ सौ रुपये किलो मिली। आमतौर पर बाजार में सामान्य गुड़ 40-50 रुपये किलो ही बिकता है। इसके अलावा गन्ने के रस से सिरका बनाकर भी अच्छी आमदनी की। इससे उत्साह दोगुना हो गया।

सहफसली खेती ने बढ़ाया मुनाफा

सर्वेश के मुताबिक गन्ने के साथ मेंथा, सरसों आदि फसलों की भी खेती की। इसे सहफसली खेती कहते हैं। इसका प्रशिक्षण भी कृषि विज्ञान केंद्र से प्राप्त किया। परिणाम रहा कि गन्ने की फसल में लगने वाली लागत सहफसली के तौर पर लगाई गई फसल से ही प्राप्त होने लगी। इसके अलावा मेंथा लगाने की वजह से गन्ने में आमतौर पर होने वाली बीमारियां भी नहीं हुई। पता चला कि मेंथा की फसल में कीटनाशी गुण होते हैं। बताया कि वर्तमान में वह करीब 16 बीघे में जैविक खेती कर रहे हैं। सालाना आय करीब पांच लाख रुपये से ज्यादा है।

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व्यापारियों को मुहैया कराने के लिए कम पड़ता है माल

उत्पादित फसलों की गुणवत्ता के आधार पर बिक्री अधिक होने की वजह से अब व्यापारियों की मांग के अनुसार माल की कमी हो जाती है। सर्वेश ने बताया कि पिछले साल उन्होंने ग्रेम फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड नाम से एक फर्म की शुरुआत भी कर दी है। इसके जरिए वह जैविक खेती को बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। उनकी फर्म से अब तक एक, दो बीघे वाले 250 किसान जुड़ चुके हैं। उनका उद्देश्य खेती को केमिकल से मुक्त करना है। इसके अलावा वह कृषि कॉलेजों, केंद्र और प्रदेश सरकार के कार्यक्रमों में व्याख्यान देने भी पहुंचते हैं।

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