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आला हजरत का करेंसी पर दिया फतवा विश्व में रहा था चर्चित
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बरेली। आला हजरत ने तमाम मामलों पर फतवे दिए हैं। इसमेें करेंसी पर दिया फतवा विश्व भर मेें चर्चित रहा है, जो बाद में पूरे एक रिसाले के तौर पर प्रकाशित किया गया था।
बात तब की है जब सोने-चांदी की जगह कागज के नोट चले थे। उस वक्त इस्लामी दुनिया में बहस छिड़ गई थी और लोगों ने कागज के नोट को स्वीकार करने से मना कर दिया था। उस वक्त कुछ इस्लामी हुकूमतों और उलमा ने सनत करार देकर कागज के नोट को सही साबित करने की कोशिश की, मगर इसे हर मुल्क की मान्यता नहीं मिल पा रही थी। इसी दरमियान 1905 में आला हजरत इमाम अहमद रजा खां फाजिले बरेलवी हज पर गए। उस वक्त वहां के मुफ्ती-ए-मक्का शेख स्वालेह कमाल ने कागज के नोट को लेकर आला हजरत से सवाल किया था कि यह माल है या नहीं।
इस पर आला हजरत ने जवाब में लिखा, करेंसी नोट रसीद नहीं है। रसीद किसी खास शख्स या संस्था की ओर से किसी खास शख्स या संस्था को जारी की जाती है। करेंसी को किसी भी संस्था या व्यक्ति के जरिए कहीं भी चलाया जा सकता है। ऐसे में यह खुद माल है, क्योंकि इससे कुछ खरीदा या बेचा जा सकता है। यह खुद माल के कीमत वाली चीज है। कुछ बिक रहा है और खरीदने व बेचने वाले व्यक्ति राजी हैं तो लेनदेन कर सकते हैं। इस फतवे के बाद लोग धीरे-धीरे इसे माल के तौर पर स्वीकार कर पाए।
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इस्लामिक बैंकिंग का फार्मूला भी आला हजरत की देन
यहां बता दें कि इस्लामिक बैंकिंग का फारमूला भी आला हजरत की देन है। इस पर एक रिसाला भी है जिसमें वह एक अर्थशास्त्री नजर आते हैं। आला हजरत ने उस वक्त बैंकिंग की जरूरत को महसूस किया था जब इसका ज्यादा वजूद नहीं था। इस पर उन्होंने 1912 में रिसाला लिखा जो ‘रिसालतुल बैंक’ के नाम से प्रकाशित हुआ। दरगाह से जुड़े नासिर कुरैशी ने बताया कि यही नहीं आला हजरत ने लगभग 12 सौ किताबें लिखीं हैं। इसमें बैंकिंग, गणित , रसायन, अर्थशास्त्र, फिजिक्स, रेखा गणित जैसे विषय शामिल हैं। खासतौर से विज्ञान पर लिखी किताब ‘फौजे मुबीन दौलतुल मक्किया’ है, जो पैगंबरे इस्लाम के इल्म गैब के हवाले से है।
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बात तब की है जब सोने-चांदी की जगह कागज के नोट चले थे। उस वक्त इस्लामी दुनिया में बहस छिड़ गई थी और लोगों ने कागज के नोट को स्वीकार करने से मना कर दिया था। उस वक्त कुछ इस्लामी हुकूमतों और उलमा ने सनत करार देकर कागज के नोट को सही साबित करने की कोशिश की, मगर इसे हर मुल्क की मान्यता नहीं मिल पा रही थी। इसी दरमियान 1905 में आला हजरत इमाम अहमद रजा खां फाजिले बरेलवी हज पर गए। उस वक्त वहां के मुफ्ती-ए-मक्का शेख स्वालेह कमाल ने कागज के नोट को लेकर आला हजरत से सवाल किया था कि यह माल है या नहीं।
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इस पर आला हजरत ने जवाब में लिखा, करेंसी नोट रसीद नहीं है। रसीद किसी खास शख्स या संस्था की ओर से किसी खास शख्स या संस्था को जारी की जाती है। करेंसी को किसी भी संस्था या व्यक्ति के जरिए कहीं भी चलाया जा सकता है। ऐसे में यह खुद माल है, क्योंकि इससे कुछ खरीदा या बेचा जा सकता है। यह खुद माल के कीमत वाली चीज है। कुछ बिक रहा है और खरीदने व बेचने वाले व्यक्ति राजी हैं तो लेनदेन कर सकते हैं। इस फतवे के बाद लोग धीरे-धीरे इसे माल के तौर पर स्वीकार कर पाए।
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इस्लामिक बैंकिंग का फार्मूला भी आला हजरत की देन
यहां बता दें कि इस्लामिक बैंकिंग का फारमूला भी आला हजरत की देन है। इस पर एक रिसाला भी है जिसमें वह एक अर्थशास्त्री नजर आते हैं। आला हजरत ने उस वक्त बैंकिंग की जरूरत को महसूस किया था जब इसका ज्यादा वजूद नहीं था। इस पर उन्होंने 1912 में रिसाला लिखा जो ‘रिसालतुल बैंक’ के नाम से प्रकाशित हुआ। दरगाह से जुड़े नासिर कुरैशी ने बताया कि यही नहीं आला हजरत ने लगभग 12 सौ किताबें लिखीं हैं। इसमें बैंकिंग, गणित , रसायन, अर्थशास्त्र, फिजिक्स, रेखा गणित जैसे विषय शामिल हैं। खासतौर से विज्ञान पर लिखी किताब ‘फौजे मुबीन दौलतुल मक्किया’ है, जो पैगंबरे इस्लाम के इल्म गैब के हवाले से है।