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जिले भर में आईआरसीटीसी के 750 कैफे, कई के रिन्यूवल नहीं
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बरेली। जिले में आईआरसीटीसी के करीब 750 कैफे हैं, जिनमें से ज्यादातर का नवीनीकरण ही नहीं हुआ है। कैफे संचालक नवीनीकरण कराने के बजाय पर्सनल आईडी पर धड़ल्ले से ई-टिकट बेचकर रेलवे को राजस्व का चूना लगा रहे हैं। अब आरपीएफ का अगला निशाना बिना रिन्यूवल संचालित हो रहे, आईआरसीटीसी के यह कैफे ही हैं। हालांकि, सात महीने में आरपीएफ और एसआईबी (क्राइम इंटेलिजेंस ब्रांच) एक दर्जन ऐसे इंटरनेट कैफे पर कार्रवाई कर चुकी है जो अपनी निजी आईडी पर टिकट बनाकर बेच रहे थे। बताया जाता है कि इनमें कुछ पूर्व में आईआरसीटीसी से संचालित भी रहे हैं।
आईआरसीटीसी के मानकों के मुताबिक, कैफे संचालक को स्लीपर टिकट पर 20 रुपये और एसी के रिजर्व ई-टिकट पर 40 रुपये मिलते हैं। लाइसेंस की फीस भी सालाना दस हजार रुपये है। आरपीएफ के क्राइम इंटेलीजेंस ब्रांच की मानें तो एक बार आईआरसीटीसी से लाइसेंस लेने के बाद कुछ संचालकों ने उसका नवीनीकरण नहीं कराया है। कारण, हर साल दस हजार रुपये की फीस भरना उन्हें कमाई के लिहाज से भारी पड़ता है। चूंकि उनके ग्राहक बंधे हुए होते हैं, जिनसे वे पर्सनल आईडी पर ही ई-टिकट बनाकर प्रति टिकट 200-300 रुपये तक वसूलते हैं। यहां बता दें कि आधार वैरीफाइड एक पर्सनल आईडी पर कैफे संचालक अपने परिवार या स्वयं के लिए महीने में केवल 12 टिकट ही निकाल सकता है। वहीं, बिना आधार वैरीफाइड पर्सनल आईडी पर केवल छह टिकट ही निकाले जा सकते हैं। इंटेलीजेंस ब्रांच के इंस्पेक्टर मयंक चौधरी ने बताया कि शिकायत आने पर ही कार्रवाई होती है, उनके पास ऐसा कोई जरिया नहीं है जिससे वह लाइसेंस का रिन्यूवल चेक कर सकें। ऐसे में कैफे संचालक धड़ल्ले से पर्सनल आईडी पर ई-टिकट बनाकर कालाबाजारी कर रहे हैं।
कासगंज के लोग बदायूं से कराते थे ई-रिजर्वेशन
सोमवार को बदायूं के गांव तेहरा मेें कैफे संचालक राजेश के पास कासगंज के लोगों के भी रिजर्वेशन मिले। बरेली और कासगंज के धंधेबाज मोबाइल पर उसके संपर्क रहते थे। फर्जी आईडी से आरक्षित टिकट मुहैया कराने के एवज में वह अतिरिक्त वसूली भी करता था। आरपीएफ बदायूं ने मंगलवार को राजेश को सिटी स्टेशन स्थित रेलवे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया। बदायूं के आरपीएफ इंस्पेक्टर सुभाष यादव की मानें तो बदायूं के अलावा आसपास के गांवों में भी पर्सनल आईडी पर ई-टिकट बेचने का धंधा फलफूल रहा है।
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आईआरसीटीसी के मानकों के मुताबिक, कैफे संचालक को स्लीपर टिकट पर 20 रुपये और एसी के रिजर्व ई-टिकट पर 40 रुपये मिलते हैं। लाइसेंस की फीस भी सालाना दस हजार रुपये है। आरपीएफ के क्राइम इंटेलीजेंस ब्रांच की मानें तो एक बार आईआरसीटीसी से लाइसेंस लेने के बाद कुछ संचालकों ने उसका नवीनीकरण नहीं कराया है। कारण, हर साल दस हजार रुपये की फीस भरना उन्हें कमाई के लिहाज से भारी पड़ता है। चूंकि उनके ग्राहक बंधे हुए होते हैं, जिनसे वे पर्सनल आईडी पर ही ई-टिकट बनाकर प्रति टिकट 200-300 रुपये तक वसूलते हैं। यहां बता दें कि आधार वैरीफाइड एक पर्सनल आईडी पर कैफे संचालक अपने परिवार या स्वयं के लिए महीने में केवल 12 टिकट ही निकाल सकता है। वहीं, बिना आधार वैरीफाइड पर्सनल आईडी पर केवल छह टिकट ही निकाले जा सकते हैं। इंटेलीजेंस ब्रांच के इंस्पेक्टर मयंक चौधरी ने बताया कि शिकायत आने पर ही कार्रवाई होती है, उनके पास ऐसा कोई जरिया नहीं है जिससे वह लाइसेंस का रिन्यूवल चेक कर सकें। ऐसे में कैफे संचालक धड़ल्ले से पर्सनल आईडी पर ई-टिकट बनाकर कालाबाजारी कर रहे हैं।
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कासगंज के लोग बदायूं से कराते थे ई-रिजर्वेशन
सोमवार को बदायूं के गांव तेहरा मेें कैफे संचालक राजेश के पास कासगंज के लोगों के भी रिजर्वेशन मिले। बरेली और कासगंज के धंधेबाज मोबाइल पर उसके संपर्क रहते थे। फर्जी आईडी से आरक्षित टिकट मुहैया कराने के एवज में वह अतिरिक्त वसूली भी करता था। आरपीएफ बदायूं ने मंगलवार को राजेश को सिटी स्टेशन स्थित रेलवे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया। बदायूं के आरपीएफ इंस्पेक्टर सुभाष यादव की मानें तो बदायूं के अलावा आसपास के गांवों में भी पर्सनल आईडी पर ई-टिकट बेचने का धंधा फलफूल रहा है।
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