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जयंती विशेष: आजीवन राम में रमे रहे पंडित राधेश्याम कथावाचक, खड़ी बोली के रामायण ने दिलाई पहचान

Tue, 25 Nov 2025 03:10 PM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली Published by: बरेली ब्यूरो Updated Tue, 25 Nov 2025 03:10 PM IST
सार

बरेली के बिहारीपुर मोहल्ले में 25 नवंबर 1890 को जन्मे पंडित राधेश्याम कथावाचक ने खड़ी बोली में रामायण लिखी। उन्होंने अपनी रचनाओं में सरल शब्दों के चयन और भावपूर्ण शैली के जरिए अपनी पहचान बनाई। 

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Pandit Radheshyam got recognition for the narrator through the Khari Boli Ramayana
पंडित राधेश्याम कथावाचक की प्रतिमा - फोटो : संवाद

विस्तार

बरेली के रहने वाले पंडित राधेश्याम कथावाचक ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से बरेली ही नहीं, बल्कि पूरे देश को गौरवान्वित किया। वह आजीवन राम में रमे रहे। खड़ी बोली में लिखी गई रामायण ने उनको वैश्विक पहचान दिलाई। हिंदी नाटक, कथा-कीर्तन आदि के लिए वह पूरे उत्तर भारत में विख्यात रहे। उन्हें लोकभाषा में धार्मिक कथाओं को सरल और भावपूर्ण शैली में लिखने में महारत हासिल थी। 
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बरेली के बिहारीपुर मोहल्ले में 25 नवंबर 1890 को जन्मे पंडित राधेश्याम कथावाचक पारसी शैली के हिंदी नाटककारों में शीर्ष पर रहे। मंगलवार को उनकी जयंती है। इससे पहले ही प्रदेश सरकार ने यहां के राजकीय इंटर कॉलेज में स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत निर्मित ऑडिटोरियम का नाम उनके नाम पर रखने और उनके आवास पर संग्रहालय बनाने की घोषणा की है। जल्द ही मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ इसे जनता को समर्पित करने बरेली आएंगे। 
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यह भी पढ़ें- Bareilly News: पंडित राधेश्याम कथावाचक के नाम पर होगा जीआईसी ऑडिटोरियम, लगाई जाएगी प्रतिमा
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पंडित राधेश्याम के नाटक हुए लोकप्रिय 
माना जाता है कि पंडित राधेश्याम 20वीं सदी के शुरुआती दौर में प्रसिद्ध हिंदी नाटककार, कवि, कथावाचक रहे। उनकी सरल एवं प्रवाहपूर्ण भाषा लोगों के दिल में घर कर जाती थी। इसीलिए उनके नाटक गांव और शहर हर जगह लोकप्रिय हुए। उन्होंने कई धार्मिक और ऐतिहासिक नाटक लिखे। 

इनमें वीर अभिमन्यु, द्रौपदी चीरहरण, कर्ण-कुंती संवाद, हनुमान जी के प्रसंग पर आधारित नाट्य रूपांतर, रुद्रावतार और विदुर नीति आदि प्रमुख हैं। उनके लिखे संवाद आज भी रामलीलाओं सहित अन्य धार्मिक मंचों पर बोले जाते हैं, क्योंकि व बोलने में आसान और बेहद प्रभावशाली हैं। 

हिंदी नाट्य परंपरा को दिया आधुनिक रूप 
बरेली में डॉ. ब्रजेश्वर सिंह, राकेश रत्नाकर, अंबुज कुकरेती के प्रयासों से उनके नाटकों का मंचन किया जाता रहा है। दिवंगत जेसी पालीवाल, दिवंगत अधिवक्ता हृदय चरण जौहरी जैसे रंगमंच से जुड़े लोग राधेश्याम कथावाचक के नाटकों को बार-बार मंच तक पहुंचाते रहे। 

रंगकर्मी राकेश रत्नाकर ने बताया कि ‘राधेश्याम रामायण’ रामचरितमानस जैसा ही है, लेकिन इसे नाट्य संवाद और छंदों में लिखा गया है ताकि रामलीला में सीधे बोला जा सके। भाषा बहुत सरल, सहज और प्रवाहमय है। कथा इतनी भावनात्मक है कि मंचन के दौरान तुरंत प्रभाव डालती है। 

संवादों में वीर, करुण रस और भक्ति रस का सुंदर मिश्रण मिलता है। आज भी अधिकतर रामलीलाओं में राधेश्याम रामायण के संवाद बोले जाते हैं। हिंदी नाट्य परंपरा को आधुनिक रूप देने में पंडित राधेश्याम का बड़ा योगदान है। उनके लिखे लक्ष्मण-परशुराम संवाद, दशरथ-कैकेयी संवाद, रावण-अंगद संवाद आदि के प्रसंग अद्वितीय हैं।
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