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संतान की रक्षाकर सुख समृद्धि देती हैं छठ मैया
बरेली।
Updated Wed, 25 Oct 2017 01:17 AM IST
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छठ पूजा
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कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की पष्ठी को मनाया जाने वाला पर्व छठ संतान की रक्षा, परिवार की सुख समृद्धि और मनोकामना पूरी करता है। बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल समाज में मान्यता है कि इस पर्व पर विधि विधान से व्रत रखकर छठ मैया और सूर्योपासना करने से परिवार में समृद्धि, ऐश्वर्य, आरोग्य और पुत्र की दीर्घायु होती है।
बिहार सीवान के रहने वाले और शंकर पार्वती मंदिर इज्जतनगर के पुजारी विजय महाराज ने बताया इस व्रत को स्त्री और पुरुष दोनों ही करते हैं। चार दिन चलने वाले इस पर्व का पहला दिन नहाए खाए के साथ होता है। इस दिन साफ सफाई करके मन को तामसिक भोजन से दूर करके शुद्ध और सात्विक भोजन किया जाता है। दूसरे दिन खरना, यानि पूरे दिन निर्जल व्रत रखकर शाम होने पर गन्ने के रस या गुड़ की खीर बनाकर बांटी जाती है। तीसरे दिन शाम को पूरे विधि विधान से अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। रात में जागरण करते हुए छठी मैया के गीत गाते हैं। व्रत कथा कही और सुनी जाती है। चौथे और अंतिम दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर छठ माता से परिवार की सुख शांति, संतान की रक्षा आदि का वर मांगकर व्रत का परायण किया जाता है। इस व्रत में शुद्धता और शुचिता का पूरा ख्याल रखा जाता है।
भगवान श्रीराम, माता सीता ने भी किया था व्रत
एक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद जब अयोध्या लौटे तो ऋषियों ने उन्हें रावण वध के पाप से मुक्त होनेे के लिए राजसूय यज्ञ करने का आदेश दिया। तब श्रीराम ने पूजा के लिए मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया। मुग्दल ऋषि ने गंगाजल छिड़कर सीता जी को पवित्र किया और उन्हें षष्ठी तिथि को व्रत रखकर भगवान सूर्य की उपासना कर उनका आशीर्वाद लेने का आदेश दिया। दूसरी मान्यता के मुताबिक द्वापर युग में द्रोपदी ने जुए में हारा राजपाठ पांडवों को वापस दिलाने के लिए छठ व्रत किया था। लोक परंपरा के अनुसार भगवान सूर्यदेव और छठ मैया का संबंध भाई-बहन का है। सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से पैदा होने के कारण ही उन्हें छठ माता कहा जाता है।
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बिहार सीवान के रहने वाले और शंकर पार्वती मंदिर इज्जतनगर के पुजारी विजय महाराज ने बताया इस व्रत को स्त्री और पुरुष दोनों ही करते हैं। चार दिन चलने वाले इस पर्व का पहला दिन नहाए खाए के साथ होता है। इस दिन साफ सफाई करके मन को तामसिक भोजन से दूर करके शुद्ध और सात्विक भोजन किया जाता है। दूसरे दिन खरना, यानि पूरे दिन निर्जल व्रत रखकर शाम होने पर गन्ने के रस या गुड़ की खीर बनाकर बांटी जाती है। तीसरे दिन शाम को पूरे विधि विधान से अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। रात में जागरण करते हुए छठी मैया के गीत गाते हैं। व्रत कथा कही और सुनी जाती है। चौथे और अंतिम दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर छठ माता से परिवार की सुख शांति, संतान की रक्षा आदि का वर मांगकर व्रत का परायण किया जाता है। इस व्रत में शुद्धता और शुचिता का पूरा ख्याल रखा जाता है।
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भगवान श्रीराम, माता सीता ने भी किया था व्रत
एक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद जब अयोध्या लौटे तो ऋषियों ने उन्हें रावण वध के पाप से मुक्त होनेे के लिए राजसूय यज्ञ करने का आदेश दिया। तब श्रीराम ने पूजा के लिए मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया। मुग्दल ऋषि ने गंगाजल छिड़कर सीता जी को पवित्र किया और उन्हें षष्ठी तिथि को व्रत रखकर भगवान सूर्य की उपासना कर उनका आशीर्वाद लेने का आदेश दिया। दूसरी मान्यता के मुताबिक द्वापर युग में द्रोपदी ने जुए में हारा राजपाठ पांडवों को वापस दिलाने के लिए छठ व्रत किया था। लोक परंपरा के अनुसार भगवान सूर्यदेव और छठ मैया का संबंध भाई-बहन का है। सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से पैदा होने के कारण ही उन्हें छठ माता कहा जाता है।
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