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पुलिस ने पूरी नहीं होने दी सदर की परंपरा
ब्यूरो/अमर उजाला, बरेली
Updated Tue, 01 Nov 2016 01:36 AM IST
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कैंट सदर के यादवों की ओर से गोवर्धन पूजा के रूप में हर साल निभाई जाने वाली भैंसों-भैंसों को लड़ाने और गाय से सुअर वध कराने की पुरानी परंपरा पर इस बार पुलिस का डंडा चल गया। जिला और पुलिस प्रशासन के अधिकारियों के निर्देश पर कैंट थाना पुलिस ने परंपरा निभाने को इकट्ठे हुए सदर के यादव बिरादरी के लोगों को गोकुल नगरी से खदेड़ दिया। डंडों के बल पर भीड़ को कई बार दौड़ाया गया। कार्रवाई के दौरान भैंसों के मुकाबले का दूसरा राउंड शुरू होने जा रहा था। बताया गया कि पीएफए कार्यकर्ताओं की शिकायत पर केंद्रीय महिला कल्याण मंत्री मेनका गांधी ने एसएसपी से फोन पर इस परंपरा को रुकवाने के लिए कहा था। इस पर पुलिस प्रशासन ने यह कदम उठाया।
सोमवार को सुबह करीब दस बजे दो भैंसों को सदर में तालाब किनारे के मैदान में लाया गया। उनकी लड़ाई कराई गई, लेकिन दूसरे राउंड की लड़ाई शुरू होती उससे पहले ही कैंट थाना पुलिस मौके पर पहुंच गई और आयोजकों को भैंसों के साथ भगा दिया। मौके पर पुलिस का हल्का विरोध भी हुआ, जिस पर पुलिस ने डंडे फटकारकर लोगों को खदेड़ दिया।
आयोजनकर्ता बाद में सीओ और कैंट थाना प्रभारी से मिलने कलक्ट्रेट गए, लेकिन उन्होंने एसएसपी का निर्देश बताकर आयोजन होने देने से इंकार कर दिया। इसके बाद आयोजनकर्ता सर्किट हाउस पहुंचकर सपा जिलाध्यक्ष वीरपाल सिंह यादव से मिले। वीरपाल ने एसएसपी से फोन पर बात की और पुरानी परंपरा बताकर आयोजन न रोकने को कहा, लेकिन फिर भी कोई नतीजा नहीं निकला। मौके पर मुस्तैद पुलिस फोर्स ने शाम तक भी आयोजन नहीं होने दिया।
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आयोजकों का कहना था कि भैंसों को मनोरंजन के लिए लड़ाने और गाय से सुअर का वध कराने की परंपरा सदियों पुरानी है। इसको वे हर साल निभाते आए हैं। उनकी मान्यता है कि इस परंपरा से उनके पशु बीमार नहीं पड़ते हैं। पिछले साल सुअर का वध नहीं करने दिया गया था, सिर्फ भैंसों को ही लड़ाया गया। इस बार भी वे भैंसों की ही लड़ाई करा रहे थे। उधर, पीएफए के जिला अध्यक्ष धीरज पाठक का कहना है कि यह परंपरा पशु क्रूरता को प्रदर्शित करती है, इसलिए इसको रुकवाने की मांग प्रशासन से की गई।
गोवर्धन पूजा के आयोजन के लिए पूर्व में कोई अनुमति नहीं ली गई थी, इसलिए आयोजकों को समझा बुझाकर आयोजन नहीं करने दिया गया।
-अमर सिंह, कैंट थाना प्रभारी
यह एक परंपरा थी, जिसको हर साल निभाते आए हैं, इसलिए आयोजन की पूर्व में अनुमति कभी लेने की जरूरत नहीं पड़ी, लेकिन इस बार पुलिस ने जोर-जबरदस्ती की। कई लोगों की पिटाई की गई। कार्रवाई और डेयरी हटवाने की धमकी भी दी गई।
-अमर सिंह, आयोजक
आयोजक बोले, द्वापर युग से चली आ रही है परंपरा
आयोजक बताते हैं कि बात द्वापर युग की है। जब प्रभु श्रीकृष्ण को मारने के लिए एक राक्षस उनकी गायों के बीच घुस आया था, लेकिन प्रभु श्रीकृष्ण ने उसे पहचान लिया था। फिर बांसुरी बजाकर गायों को भी राक्षस की वास्तविकता बता दी थी, तो गायों ने ही सुअर वेशधारी राक्षस को मार डाला था। गाय-सुअर की लड़ाई सुअर को राक्षस का प्रतीक मानकर ही कराई जाती है। इसके अलावा माना जाता है कि इससे जानवरों में पूरे वर्ष खुरपका की बीमारी भी नहीं होती है। इसमें विजेता पशु मालिक को पुरस्कृत भी किया जाता है। हालांकि इस साल वह भैंसों-भैंसों में ही लड़ाई करवा रहे थे।
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सोमवार को सुबह करीब दस बजे दो भैंसों को सदर में तालाब किनारे के मैदान में लाया गया। उनकी लड़ाई कराई गई, लेकिन दूसरे राउंड की लड़ाई शुरू होती उससे पहले ही कैंट थाना पुलिस मौके पर पहुंच गई और आयोजकों को भैंसों के साथ भगा दिया। मौके पर पुलिस का हल्का विरोध भी हुआ, जिस पर पुलिस ने डंडे फटकारकर लोगों को खदेड़ दिया।
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आयोजनकर्ता बाद में सीओ और कैंट थाना प्रभारी से मिलने कलक्ट्रेट गए, लेकिन उन्होंने एसएसपी का निर्देश बताकर आयोजन होने देने से इंकार कर दिया। इसके बाद आयोजनकर्ता सर्किट हाउस पहुंचकर सपा जिलाध्यक्ष वीरपाल सिंह यादव से मिले। वीरपाल ने एसएसपी से फोन पर बात की और पुरानी परंपरा बताकर आयोजन न रोकने को कहा, लेकिन फिर भी कोई नतीजा नहीं निकला। मौके पर मुस्तैद पुलिस फोर्स ने शाम तक भी आयोजन नहीं होने दिया।
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आयोजकों का कहना था कि भैंसों को मनोरंजन के लिए लड़ाने और गाय से सुअर का वध कराने की परंपरा सदियों पुरानी है। इसको वे हर साल निभाते आए हैं। उनकी मान्यता है कि इस परंपरा से उनके पशु बीमार नहीं पड़ते हैं। पिछले साल सुअर का वध नहीं करने दिया गया था, सिर्फ भैंसों को ही लड़ाया गया। इस बार भी वे भैंसों की ही लड़ाई करा रहे थे। उधर, पीएफए के जिला अध्यक्ष धीरज पाठक का कहना है कि यह परंपरा पशु क्रूरता को प्रदर्शित करती है, इसलिए इसको रुकवाने की मांग प्रशासन से की गई।
गोवर्धन पूजा के आयोजन के लिए पूर्व में कोई अनुमति नहीं ली गई थी, इसलिए आयोजकों को समझा बुझाकर आयोजन नहीं करने दिया गया।
-अमर सिंह, कैंट थाना प्रभारी
यह एक परंपरा थी, जिसको हर साल निभाते आए हैं, इसलिए आयोजन की पूर्व में अनुमति कभी लेने की जरूरत नहीं पड़ी, लेकिन इस बार पुलिस ने जोर-जबरदस्ती की। कई लोगों की पिटाई की गई। कार्रवाई और डेयरी हटवाने की धमकी भी दी गई।
-अमर सिंह, आयोजक
आयोजक बोले, द्वापर युग से चली आ रही है परंपरा
आयोजक बताते हैं कि बात द्वापर युग की है। जब प्रभु श्रीकृष्ण को मारने के लिए एक राक्षस उनकी गायों के बीच घुस आया था, लेकिन प्रभु श्रीकृष्ण ने उसे पहचान लिया था। फिर बांसुरी बजाकर गायों को भी राक्षस की वास्तविकता बता दी थी, तो गायों ने ही सुअर वेशधारी राक्षस को मार डाला था। गाय-सुअर की लड़ाई सुअर को राक्षस का प्रतीक मानकर ही कराई जाती है। इसके अलावा माना जाता है कि इससे जानवरों में पूरे वर्ष खुरपका की बीमारी भी नहीं होती है। इसमें विजेता पशु मालिक को पुरस्कृत भी किया जाता है। हालांकि इस साल वह भैंसों-भैंसों में ही लड़ाई करवा रहे थे।