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Bareilly News: ऑनलाइन ज्ञान से बने सफल किसान, जैविक खेती से बदली तकदीर
Sun, 28 Sep 2025 09:55 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Updated Sun, 28 Sep 2025 09:55 AM IST
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शेरगढ़। महंगे कीटनाशक, उर्वरक पर बढ़ते खर्च व इनके अंधाधुंध प्रयोग से बंजर हो चुकी जमीन की वजह से खेती में होने वाले घाटे से परेशान रम्पुरा गांव निवासी सुभाष चंद्र गंगवार ने जैविक खेती अपनाकर घाटे को मुनाफे में बदल दिया। इंटरनेट पर तौर-तरीके सीखने के बाद अब सुभाष अपनी पांच एकड़ जमीन से ही हर साल लाखों का मुनाफा कमा रहे हैं। वह दूसरे किसानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।
सुभाष चंद्र ने बताया कि वह कृषि विज्ञान से स्नातक हैं। बचपन से ही वह पिता के साथ खेतीबाड़ी कर रहे हैं। समय के साथ उर्वरक व कीटनाशकों पर महंगाई बढ़ने के साथ ही इनका खर्च बढ़ा तो खेती घाटे का सौदा बन गई। पूरे साल मेहनत करने के बाद भी घर चलाने लायक पर्याप्त आमदनी नहीं हो पाती थी। चूंकि उन्होंने कृषि विज्ञान से ही पढ़ाई की थी, ऐसे में नए तौर-तरीके अपनाने की ठानी।
वर्ष 2021 में उन्होंने इंटरनेट के जरिये खेती की आधुनिक तकनीक के बारे में जाना। इसके बाद परंपरागत तरीके छोड़कर जैविक तरीके से खेती करनी शुरू की। अब वह हर साल गोबर से तैयार देसी खाद फसल बोने से पहले खेत में डालते हैं। रासयनिक कीटनाशकों की जगह गाय के गोबर व मूत्र से जीवामृत व घनजीवन अमृत तैयार करके इसका ही छिड़काव करते हैं।
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यह दोनों ही तरीके काफी कारगर रहे। उर्वरक व कीटनाशक पर होने वाला खर्च 20 प्रतिशत भी नहीं बचा। चूंकि वो जैविक तरीके से खेती करते हैं, ऐसे में स्थानीय स्तर पर ही अच्छे दाम पर उनकी उपज बिक जाती। मूल्य भी अधिक मिलता है। सालाना एक जैसी फसल ही बोने की जगह वह अलग-अलग हिस्से में धान गेहूं के साथ ही अरहर, हल्दी आदि की खेती करने की भी तैयारी कर रहे हैं। अब दूसरे किसान भी उनके पास जैविक खेती के तौर-तरीके सीखने के लिए आते हैं। संवाद
90 किलो की जगह तीन क्विंटल प्रति बीघा हुई पैदावार
सुभाष ने बताया कि कीटनाशकों व उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से जमीन बंजर हो चुकी थी। वर्ष 2021 में उन्हें अपने खेत से 90 किलो प्रति बीघा की दर से गेहूं का उत्पादन मिला। जैविक तरीके अपनाने के बाद अब यह तीन क्विंटल प्रति बीघा तक पहुंच गया है।
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सुभाष चंद्र ने बताया कि वह कृषि विज्ञान से स्नातक हैं। बचपन से ही वह पिता के साथ खेतीबाड़ी कर रहे हैं। समय के साथ उर्वरक व कीटनाशकों पर महंगाई बढ़ने के साथ ही इनका खर्च बढ़ा तो खेती घाटे का सौदा बन गई। पूरे साल मेहनत करने के बाद भी घर चलाने लायक पर्याप्त आमदनी नहीं हो पाती थी। चूंकि उन्होंने कृषि विज्ञान से ही पढ़ाई की थी, ऐसे में नए तौर-तरीके अपनाने की ठानी।
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वर्ष 2021 में उन्होंने इंटरनेट के जरिये खेती की आधुनिक तकनीक के बारे में जाना। इसके बाद परंपरागत तरीके छोड़कर जैविक तरीके से खेती करनी शुरू की। अब वह हर साल गोबर से तैयार देसी खाद फसल बोने से पहले खेत में डालते हैं। रासयनिक कीटनाशकों की जगह गाय के गोबर व मूत्र से जीवामृत व घनजीवन अमृत तैयार करके इसका ही छिड़काव करते हैं।
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यह दोनों ही तरीके काफी कारगर रहे। उर्वरक व कीटनाशक पर होने वाला खर्च 20 प्रतिशत भी नहीं बचा। चूंकि वो जैविक तरीके से खेती करते हैं, ऐसे में स्थानीय स्तर पर ही अच्छे दाम पर उनकी उपज बिक जाती। मूल्य भी अधिक मिलता है। सालाना एक जैसी फसल ही बोने की जगह वह अलग-अलग हिस्से में धान गेहूं के साथ ही अरहर, हल्दी आदि की खेती करने की भी तैयारी कर रहे हैं। अब दूसरे किसान भी उनके पास जैविक खेती के तौर-तरीके सीखने के लिए आते हैं। संवाद
90 किलो की जगह तीन क्विंटल प्रति बीघा हुई पैदावार
सुभाष ने बताया कि कीटनाशकों व उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से जमीन बंजर हो चुकी थी। वर्ष 2021 में उन्हें अपने खेत से 90 किलो प्रति बीघा की दर से गेहूं का उत्पादन मिला। जैविक तरीके अपनाने के बाद अब यह तीन क्विंटल प्रति बीघा तक पहुंच गया है।