फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Bareilly News ›   No one taking pain for football in orphanage

अनाथालय में फुटबाल भी हो गया ‘अनाथ’  

Tue, 20 Feb 2018 06:33 PM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,बरेली
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,बरेली Updated Tue, 20 Feb 2018 06:33 PM IST
विज्ञापन
No one taking pain for football in orphanage
आर्य समाज अनाथालय में रहने वाले कुछ बच्चे फुटबाल में वो मुकाम छू गए, जहां तक तमाम सुविधाओं और संसाधनों के बावजूद खिलाड़ी नहीं पहुंच पाते हैं। आज इनमें से ज्यादातर सरकारी नौकरी में हैं। किस्मत ने उनको अनाथालय तक पहुंचाया और फुटबाल ने उनको अनाथालय से कामयाबी के शिखर तक लेकिन आज अनाथालय में फुटबाल खुद अनाथ हो गया। न खिलाने वालों में दिलचस्पी बची है और न खेलने वालेे रुचि ले रहे हैैं। फुटबाल एसोसिएशन ने कभी मदद को हाथ बढ़ाया था पर आज इन बच्चों को खेलों में आगे बढ़ने के लिए सहारा देने वाला कोई नहीं है।
विज्ञापन

आर्य समाज अनाथालय में ब्रजमोहन, सुनील, संदीप, शंकर लाल सहित बीस लड़के ऐसे थे जिन्होंने फुटबाल खेलने के लिए दयानंद आर्य फुटबाल क्लब बनाया था। अनाथालय के ग्राउंड पर तो यह फुटबाल खेलते ही थे साथ ही स्टेडियम में भी इनकी धमक थी। अपने शानदार खेल के दम पर ही यह लड़के स्पोर्ट्स हॉस्टल तक पहुंचे। इनमें से कई ने नेशनल लेवल तक टूर्नामेंट खेले और मेडल जीते। झारखंड के रहने वाले ब्रजमोहन आज सरकारी नौकरी में हैं। सुनील सेना में है। संदीप भी दो साल पहले एयरफोर्स में भर्ती हो गए। इन खिलाड़ियों को कामयाबी फुटबाल ने ही दिलाई। आज यहां के हालात बिल्कुल अलग हैं। अनाथालय के और भी बच्चे इनके नक्शे कदम पर चलकर कामयाबी की बुलंदी छू सकते थे, लेकिन उन्हें खेलने का मौका ही नहीं मिला। 
विज्ञापन


नियम भी बने बाधक
अनाथालय के प्रबंधक अमृतलाल नागर कहते हैं कि पहले तीन सौ बच्चों के रखने की अनुमति थी, लेकिन नए नियमों के तहत अब यहां 150 बच्चों को ही रख सकते हैं। इनमें भी 18 साल से ज्यादा उम्र के बच्चों को नहीं रख सकते। पहले जब बड़े बच्चे रहते थे और फुटबाल खेलते थे तो उन्हें देखकर छोटे बच्चे भी सीख लेते थे। आज खेलने का सारा सामान तो है पर बच्चों को सिखाए कौन। उन्होंने बताया कि अब अनाथालय में 22 लड़के और 22 लड़कियां हैं। बच्चे कक्षा छह तक यहां पढ़ते हैं, फिर दूसरे कॉलेजों में उनके एडमिशन करा दिए जाते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

 
एसोसिएशन ने तो बढ़ाया था मदद के लिए हाथ
फुटबाल एसोसिएशन के सचिव मून राबिंसन कहते हैं कि अनाथालय के बच्चे फुटबाल में काफी अच्छे थे। एसोसिएशन ने उनको पूरा सहयोग किया था। स्पोर्ट्स कॉलेज तक पहुंचाया। बाद में अनाथालय की तरफ से सहयोग नहीं मिल सका जिस कारण नए बच्चों को प्रशिक्षित नहीं कर पाए। वह कई बार अनाथालय भी गए। उन्होंने बताया कि अगर आज भी बच्चे फुटबाल खेलना चाहें तो वह उनको पूरा सहयोग करेंगे। 


हमें चाहिए एक मौका
राजकीय इंटर कॉलेज में कक्षा आठ में पढ़ने वाले अरविंद का कहना है कि क्रिकेट खेलते हैं। हमें क्रिकेट खेलना पसंद है, अगर स्टेडियम जाने का मौका मिले तो और अच्छा खेल सकते हैं। पवन, अपूर्व और सूरज पाल का भी यही कहना था कि खेलें तो पर कोई सिखाने वाला तो हो। खेलने के लिए अच्छे अवसर नहीं मिले तो बच्चे सिलाई सीख रहे हैं ताकि अनाथालय से जब बाहर निकलें तो किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। वह खुद कुछ कर सकें।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed