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नाम का पत्थर लगेगा तभी मिलेगा पानी
बरेली।
Updated Thu, 02 Nov 2017 01:43 AM IST
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सलीब
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बार एसोसिएशन की 90 साल पुरानी सबील के त्थर पर नाम लिखने को लेकर वकीलों के दो गुटों में तकरार चल रही है। नाराजगी इस बात पर हुई की एक वकील साहब का सबील पर लगने वाले पत्थर पर नाम नहीं लिखा गया। कुछ वकील बीच में पड़े तो तय हुआ कि पत्थर पर उन वकील साहब का भी नाम लिखा जाएगा, तभी सबील से पानी पिलाने की शुरुआत होगी।
बड़े वकालत खाने के पास एक सबील (प्याऊ)है । सन 1927 में किसी ने इसे बनवाया होगा। लकड़ी की कड़ियों की छत थी और उसमें एक नल लगा हुआ था। जिस वक्त यह सबील बनी थी, तब नल का पानी बहुत साफ और ठंडा होता था। वकीलों और मुवक्किलों की दिनभर भीड़ रहती थी। सुबह दस बजे सबील का दरवाजा खुलता था और शाम को बंद हो जाता था। वक्त गुजरा और कचहरी पर पानी पीने के लिए कई नल लग गए। ठंडे पानी की मशीनें भी लग गईं। सबील के नल का पानी खराब हो गया। यहां आने वालों की तादाद कम हो गई और छत भी गिरने लगी। तब एक वकील साहब ने इसके पुनर्निर्माण का फैसला किया। उनके साथ इस काम में और वकील भी शामिल हो गए।
सबील की छत की मरम्मत हुई और टाइल्स लगाई र्गइं, लेकिन जब सबील पर पत्थर लगाने का वक्त आया तो वकील आपस में ही भिड़ गए। पैसा खर्च करने वाले वकील फुरकान अहमद सिद्दीकी के साथ शौकत अली खां भी इस काम में लगे थे। पत्थर पर अपना नाम न देखकर वह भड़क गए। उन्होंने ठेकेदार को काम बंद करने की हिदायत दे दी। इस पर वकीलों की भीड़ इकट्ठा हो गई। काफी देर बहस हुई। शौकत अली ने कहा कि वकील साहब ने इस पत्थर पर अपने खानदान के लोगोें के नाम लिखा लिए। मुझसे वादा किया गया था कि मेरा नाम भी होगा, जबकि इस सबील में काम कराने का प्रस्ताव बार से मेरी कोशिशों से ही पास हुआ था। बाद में तय हुआ कि एक छोटा पत्थर और लगाया जाएगा, जिस पर उनका नाम भी होगा। उन्होंने कहा कि पानी मिलना तब ही शुरू होगा जब पत्थर लगेगा।
बड़े वकालत खाने के पास एक सबील (प्याऊ)है । सन 1927 में किसी ने इसे बनवाया होगा। लकड़ी की कड़ियों की छत थी और उसमें एक नल लगा हुआ था। जिस वक्त यह सबील बनी थी, तब नल का पानी बहुत साफ और ठंडा होता था। वकीलों और मुवक्किलों की दिनभर भीड़ रहती थी। सुबह दस बजे सबील का दरवाजा खुलता था और शाम को बंद हो जाता था। वक्त गुजरा और कचहरी पर पानी पीने के लिए कई नल लग गए। ठंडे पानी की मशीनें भी लग गईं। सबील के नल का पानी खराब हो गया। यहां आने वालों की तादाद कम हो गई और छत भी गिरने लगी। तब एक वकील साहब ने इसके पुनर्निर्माण का फैसला किया। उनके साथ इस काम में और वकील भी शामिल हो गए।
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सबील की छत की मरम्मत हुई और टाइल्स लगाई र्गइं, लेकिन जब सबील पर पत्थर लगाने का वक्त आया तो वकील आपस में ही भिड़ गए। पैसा खर्च करने वाले वकील फुरकान अहमद सिद्दीकी के साथ शौकत अली खां भी इस काम में लगे थे। पत्थर पर अपना नाम न देखकर वह भड़क गए। उन्होंने ठेकेदार को काम बंद करने की हिदायत दे दी। इस पर वकीलों की भीड़ इकट्ठा हो गई। काफी देर बहस हुई। शौकत अली ने कहा कि वकील साहब ने इस पत्थर पर अपने खानदान के लोगोें के नाम लिखा लिए। मुझसे वादा किया गया था कि मेरा नाम भी होगा, जबकि इस सबील में काम कराने का प्रस्ताव बार से मेरी कोशिशों से ही पास हुआ था। बाद में तय हुआ कि एक छोटा पत्थर और लगाया जाएगा, जिस पर उनका नाम भी होगा। उन्होंने कहा कि पानी मिलना तब ही शुरू होगा जब पत्थर लगेगा।
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