बरेली: हिंदुओं के साथ मुस्लिम भी बनाते हैं रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले, साझी विरासत की है मिसाल
बरेली में रामलीला के लिए रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले बनाने का काम शुरू हो गया है। खास बात यह है कि शहर में हिंदुओं के साथ मुस्लिम कारीगर भी रावण के पुतले बनाते हैं, जो यहां की साझी विरासत की मिसाल है।
विस्तार
बरेली शहर में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के छोटे-बड़े पुतले बनाने का काम दो सदी पुराना है। खास बात यह है कि इन पुतलों को हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदाय के हुनरमंद लोग बनाते आ रहे हैं। अब यह बरेली की साझी विरासत का हिस्सा बन चुका है।
ससुर ने शुरू किया काम, दामाद निभा रहे जिम्मेदारी
मलूकपुर में 200 साल पहले शंकरलाल ने पुतले बनाने की शुरुआत की। अब 20 साल से यह जिम्मेदारी परिवार के दामाद वीरेंद्र चंद्रा संभाल रहे हैं। वीरेंद्र ने बताया कि पत्नी के पूर्वज शंकरलाल गली के नुक्कड़ पर पाकड़ के पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठकर दशहरा के लिए पुतले बनाते थे। उनका काम इतना मशहूर हुआ कि गली का नाम ही रावण वाली गली पड़ गया।
उनके निधन के बाद ससुर विश्वनाथ ठाकुर ने यह सिलसिला जारी रखा। वीरेंद्र ने अपने ससुर विश्वनाथ से ही यह काम सीखा, फिर बाहर चले गए। साले मनोज भी पुतले बनाने लगे। मनोज के निधन के बाद पत्नी शिल्पी चंद्रा के कहने पर वीरेंद्र ने बरेली लौटकर यह काम शुरू किया।
अन्य दिनों में बेचते हैं मोमोज
वीरेंद्र ने बताया कि पुतले बनाने का काम 48 कारीगरों के साथ करते हैं। लेकिन, काम इतना होता है कि उनकी पत्नी शिल्पी भी हाथ बंटाती हैं। एक पुतला बनाने में सात दिन लग जाते हैं। इस बार 500 पुतलों का ऑर्डर मिला है। वह आमतौर पर 20 फुट ऊंचाई तक के पुतले बनाते हैं। 80 फुट के पुतले बनाने में भी कुशल हैं।
दशहरा के बाद अन्य दिनों में कारीगर चाट, मोमोज आदि का ठेला लगाकर जीविका चलाते हैं। बताया कि पहले की तुलना में अब बांस की खपच्ची, पन्नियां और कागज आदि माल-मजदूरी महंगी हो गई है। खानदानी काम है, इसलिए परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं।
मुस्लिम परिवार निभा रहा परंपरा
बड़ा बाजार के मोहल्ला फूटा दरवाजा में भी कल्लू मियां ने 35 साल पहले पुतले बनाने का काम शुरू किया। अब उनके बेटे शहंशाह अली, शबाब और शादाब सिलसिला बढ़ा रहे हैं। शहंशाह ने बताया कि 12 साल पहले पिता का निधन हो गया। तब से हर साल दशहरा से करीब एक माह पहले रोजगार के लिए पुतले बनाते हैं। पिता को नैनीताल और हल्द्वानी तक से पुतले बनाने के ऑर्डर मिलते थे, लेकिन अब स्थानीय काम ही बचा है। इसके अलावा मोहर्रम में ताजिये और दीपावली में कंडील बनाने का काम करते हैं।