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संघ प्रमुख की अनकही बातें भी बहुत कुछ कह रही हैं

Tue, 21 Jan 2020 02:15 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Tue, 21 Jan 2020 02:15 AM IST
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mohan Bhagvat
देश को बदलने वाले कई महत्वपूर्ण बदलाव भी शामिल हैं भविष्य के भारत की परिकल्पना में
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बरेली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को जब रुहेलखंड विश्वविद्यालय के स्टेडियम में हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पेश की तो स्वतंत्रता आंदोलन का भी जिक्र किया जो 1857 में शुरू होकर 1947 में अपनी परिणति तक पहुंचा। करीब 54 मिनट के व्याख्यान में उन्होंने संघ से जुड़े विवादित मुद्दों पर बहुत कुछ कहा तो बहुत कुछ खुद समझने के लिए अनकहा छोड़ दिया। व्याख्यान खत्म होने के बाद कही हुई बातों के साथ अनकही बातें भी चर्चा का विषय बनीं। विश्लेषण हुए तो यही ध्वनि निकली कि संघ प्रमुख ने भविष्य के भारत पर जो नजरिया पेश किया, उसमें उन बदलावों का जिक्र छोड़ दिया जो भविष्य के भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
यह कहने में कोई दिक्कत नहीं कि संघ प्रमुख का व्याख्यान खासतौर पर मुसलमानों या यूं कहिए कि उन लोगों के लिए था जो अभी तक गैर हिंदू कहे जाते हैं। इन लोगों को उन्होंने जब यह कहकर सचेत किया कि अंग्रेजों की तरह आज भारत में जो वहम फैलाकर लड़ाने वाले लोग मौजूद हैं तो आशय यह भी था कि अंग्रेजों का भारत को दिया सबसे बड़ा जख्म भरने की जरूरत आज भी है। यह जख्म भरने के बाद ही भारत स्वस्थ होगा। भविष्य के भारत के लिए हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को ही संभवत: इस जख्म का उपचार माना गया है। संघ प्रमुख ने स्वतंत्रता आंदोलन के प्रारंभ और अंतिम बिंदु का उल्लेख करके यही जताया कि अपनी इस अवधारणा को फलीभूत होते देखने की बहुत जल्दबाजी भी संघ को नहीं है।
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विश्लेषकों का मानना है कि हिंदू राष्ट्र की अवधारणा में देश में सांप्रदायिक आधार पर होने वाली राजनीति पर भी चिंता झलकती है। हिंदू राष्ट्र का सपना पूरा हुआ तो इस राजनीति निश्चित तौर पर अंत हो जाएगा। वोट बैंक जैसी राजनीति भी सिमट सकती है और सबसे खास यह कि तुष्टिकरण की सियासत के अगुवा कहे जाने वाले वामपंथी दलों के साथ कांग्रेस की इस राजनीति की भी जमीन अप्रभावी स्तर तक कम हो सकती है। संघ की सोच कहने को इन्हीं बदलावों के बाद विश्व गुरु बनने के रास्ते पर आगे बढ़ने के सपने पर आधारित हो सकती है। हालांकि यह वही है जो फिलहाल ऊपरी स्तर पर दिखता है।
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