{"_id":"59c180b94f1c1bac688b56d7","slug":"many-builders-disappeared-after-the-note-offs","type":"story","status":"publish","title_hn":"नोटबंदी के बाद कई बिल्डर लापता हो गए","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
नोटबंदी के बाद कई बिल्डर लापता हो गए
बरेली
Updated Wed, 20 Sep 2017 02:10 AM IST
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नोटबंदी के बाद जीएसटी लागू होने से सरिया, सीमेंट, रेत-बजरी और मिट्टी जैसा घर बनाने का ज्यादातर सामान मंहगा हो जाने से रियल स्टेट की कमर टूट गई है। हजारों लोगों का घर का सपना टूट गया है और उनकी यह दीवाली काली हो गई है। बिल्डरों को भी बड़ा नुकसान हुआ है। बीसलपुर रोड, डोहरा रोड, बदायूं रोड, आईवीआरआई रोड और नैनीताल रोड पर जिन फ्लैटों का कब्जा उन्हें दो दीवाली पहले ही दे देना चाहिए था, उन्हें वे इस दीवाली पर भी अपने ग्राहकों को देने की स्थिति में नहीं है। मंदी के इस दौर में कई छोटे बिल्डर तकादों से परेशान होकर शहर छोड़कर चले गए हैं। बरेली में कभी आते भी हैं तो काले शीशों की कार से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।
धनराज बिल्डर्स ने ठिरिया निजावत खां में नकटिया नदी के किनारे लकी होम के नाम से कालोनी बनाने का प्रोजेक्ट शुरू किया था जिसमें लोगों को 5.25 लाख रुपये में घर देने का सपना दिखाया था। यहां अभी तक एक भी ग्राहक को घर नहीं मिल पाया है। जहां कालोनी बननी थी, वहां पहले के मुकाबले इन दिनों हलचल भी कम हो गई है। इसी बिल्डर ने पीलीभीत रोड पर भी सिर्फ पांच हजार रुपये की मासिक योजना में लोगों को प्लाट का मालिक बनाने का दावा किया था, लेकिन यहां भी किसी को प्लाट नहीं मिल पाया है। इसी बिल्डर्स ने बड़ा बाईपास पर झुमका एस्टेट के नाम से दो कालोनियों की शुरूआत की थी, लेकिन दोनों की कालोनी अभी तक पूरी नहीं हो पाई हैं।
पीलीभीत रोड पर ही साइनी ग्रीन के नाम से साइनी इफ्राजोन प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने 2.75 लाख रुपये में प्लाट देने का दावा किया था। इसमें भी निवेश करने वाले किसी ग्राहक का सपना पूूरा नहीं हुआ है। जिन लोगों ने दीवाली से पहले गृह पूजन करने का सपना देखा था वे अब कालोनाइजर को तलाशते घूम रहे हैं। इसी तरह बीसलपुर रोड पर कामाख्या रेजिडेंसी में भी अभी तक किसी को प्लाट नहीं मिल पाया है। साक्षी बिल्डर की इस्कॉन कालोनी भी विकसित नहीं हो पाई है।
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नोटबंदी के बाद यह है मंहगाई का हाल
मिट्टी: पहले 120 रुपये प्रति घनमीटर मिलती थी, अब 400 रुपये घनमीटर में भी बमुश्किल मिल रही है।
रेत: पहले 70 रुपये प्रति क्विंटल मिल जाता था, अब 160 रुपये प्रति क्विंटल मिलना भी मुश्किल है।
सीमेंट: पहले 250 रुपये प्रति बोरी मिल जाती थी, अब 300 रुपये से भी ज्यादा कीमत हो गई है।
टायल्स: 40 रुपये से 200 रुपये फुट तक मिल जाती है मगर जीएसटी से महंगी हो गई है।
सरिया: नोटबंदी से पहले सरिया 3 हजार रुपये प्रति क्विंटल से भी कम था, अब 4300 सौ हो गया है।
ये हैं रेरा की मुख्य शर्तें
रक्षा मंत्रालय के त्रिशूूल एयरबेस से बीस किमी की दूरी पर किसी का नक्शा पास न होने के आदेश से शहर का विकास पूरी तरह थम गया है। रेरा ने बिल्डरों की मुसीबत और बढ़ा दी है। अब बीडीए से एप्रूवल के बाद रेरा में पंजीकरण करना होगा। पांच साल तक आवंटियों के घरों का मेंटीनेंस करना होगा। आवंटी जिस स्थान पर मकान लेने के लिए पैसा जमा करेंगे, उसका 70 फीसदी हिस्सा उसी प्रोजेक्ट में खर्च करना होगा। बरेली के सात बिल्डरों ने रेरा में पंजीकरण के लिए आवेदन किया है। यह बिल्डर वे हैं, जिनके प्रोजेक्ट चल रहे है।
मिट्टी और रेत-बजरी के लिए हाय तौबा, सिस्टम मौज में
सरकार की खनन नीति स्पष्ट न होने से मिट्टी, रेता और बजरी के लिए हाय-तौबा मची हुई है, लेकिन सिस्टम इसका खूब फायदा उठा रहा है। किसानों के नाम से खनन के लिए दस ट्राली मिट्टी की परमीशन लेने के बाद अधिकारियों और पुलिस से साठगांठ करके धड़ल्ले से कारोबार हो रहा है। सैकड़ों ट्राली मिट्टी बेचने के बाद भी दस ट्राली पूरी नहीं होती हैं। एसडीएम की परमीशन की आड़ में दिन भर माफिया के ट्रैक्टर चल रहे हैं। पुलिस को भी इसके लिए मोटी रकम मिलती है। नेेताओं की मदद से खनन का धंधा खूब फल फूल रहा है। सिफारिश के साथ नेताओं के लोग भी मिट्टी और बालू ब्लैक करने के काले कारोबार में माफियाओं के साथ रहकर मोटी कमाई कर रहे हैं।
फोटो--
देश में मकान सस्ता होने का सपना देखना बेकार है। नोटबंदी के बाद जीएसटी ने बिल्डिंग मैटेरियल को और मंहगा कर दिया है। रेरा की वजह से भी घर और अधिक मंहगे होंगे। बिल्डर ही नहीं रहेंगे तो मकान कम बनेंगे। इससे मकान सस्ता होने की बजाए मंहगा ही होना है। किसी भी भवन का पांच साल तक मेंटीनेंस करना मुश्किल है। - सुनील गुप्ता, सचिव, क्रेडाई, बरेली
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मंदी और महंगाई के इस दौर में घर बनाकर बेचना बेहद मुश्किल है। रेता, बजरी, सरिया, सीमेंट घर बनाने का हर सामान मंहगा है। रियल स्टेट की मंदी से कई कारोबारों पर असर पड़ा है। हम ऐसी स्थिति में भी लोगों को घर बनाकर देंगे। शहर के कोहाड़ापीर इलाके में हमें अगली दिवाली पर 58 लोगों को घर बनाकर देना है। -भावेश अग्रवाल, एमडी, नंदी हाइट्स
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मंहगाई और भ्रष्टाचार के बीच हम नैनीताल रोड पर पार्क रेजीडेंसी एवेन्यू कालोनी में 250 मकान बनाए हैं। रेता, बजरी और सीमेंट के दामों में जीएसटी के बाद और वृद्धि हुई है। बीडीए की कागजी कार्रवाई के दौरान तमाम मुश्किलों से गुजरना पड़ा है। इसके बावजूद हम दीवाली से पहले इनमें से 100 मकानों पर कब्जा देने जा रहे हैं। नवरात्र से लोगों का सपना पूरा होना शुरू हो जाएगा। -धर्मेंद्र कुमार गुप्ता, डेवलपर्स
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मंदी की वजह से रियल स्टेट से जुड़े कई ट्रेडों का अभी भी बुरा हाल है। अगले महीने नदी खुलेगी तो रेता-बजरी के रेटों में कमी आने की संभावना है। सैकड़ों ट्रक की इसके बाद डिमांड निकलेगी। मिट्टी मिलना मुश्किल हो रहा है। खनन की नीति पर भी सरकार के विकास की रफ्तार बढ़ाने के लिए दोबारा विचार करना होगा। - रंजीत सिंह बग्गा, रेता-बजरी, कारोबारी
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नोटबंदी के बाद जीएसटी ने मंहगाई और बढ़ा दी है। रेता-बजरी ही नहीं बिल्डिंग मैटेरियल का सारा सामान और ज्यादा मंहगा हो गया है। ऐसे में बिल्डरों का तो बुरा हाल है ही। आम आदमी को घर बनाना मुश्किल है। यही वजह है कि इस बार नवरात्रों पर आधा काम भी नहीं है। तमाम लोगों को इस दीवाली पर घर नहीं मिल पाना मुश्कि ल हैं। - इंद्रजीत सिंह, कान्ट्रैक्टर
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धनराज बिल्डर्स ने ठिरिया निजावत खां में नकटिया नदी के किनारे लकी होम के नाम से कालोनी बनाने का प्रोजेक्ट शुरू किया था जिसमें लोगों को 5.25 लाख रुपये में घर देने का सपना दिखाया था। यहां अभी तक एक भी ग्राहक को घर नहीं मिल पाया है। जहां कालोनी बननी थी, वहां पहले के मुकाबले इन दिनों हलचल भी कम हो गई है। इसी बिल्डर ने पीलीभीत रोड पर भी सिर्फ पांच हजार रुपये की मासिक योजना में लोगों को प्लाट का मालिक बनाने का दावा किया था, लेकिन यहां भी किसी को प्लाट नहीं मिल पाया है। इसी बिल्डर्स ने बड़ा बाईपास पर झुमका एस्टेट के नाम से दो कालोनियों की शुरूआत की थी, लेकिन दोनों की कालोनी अभी तक पूरी नहीं हो पाई हैं।
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पीलीभीत रोड पर ही साइनी ग्रीन के नाम से साइनी इफ्राजोन प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने 2.75 लाख रुपये में प्लाट देने का दावा किया था। इसमें भी निवेश करने वाले किसी ग्राहक का सपना पूूरा नहीं हुआ है। जिन लोगों ने दीवाली से पहले गृह पूजन करने का सपना देखा था वे अब कालोनाइजर को तलाशते घूम रहे हैं। इसी तरह बीसलपुर रोड पर कामाख्या रेजिडेंसी में भी अभी तक किसी को प्लाट नहीं मिल पाया है। साक्षी बिल्डर की इस्कॉन कालोनी भी विकसित नहीं हो पाई है।
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नोटबंदी के बाद यह है मंहगाई का हाल
मिट्टी: पहले 120 रुपये प्रति घनमीटर मिलती थी, अब 400 रुपये घनमीटर में भी बमुश्किल मिल रही है।
रेत: पहले 70 रुपये प्रति क्विंटल मिल जाता था, अब 160 रुपये प्रति क्विंटल मिलना भी मुश्किल है।
सीमेंट: पहले 250 रुपये प्रति बोरी मिल जाती थी, अब 300 रुपये से भी ज्यादा कीमत हो गई है।
टायल्स: 40 रुपये से 200 रुपये फुट तक मिल जाती है मगर जीएसटी से महंगी हो गई है।
सरिया: नोटबंदी से पहले सरिया 3 हजार रुपये प्रति क्विंटल से भी कम था, अब 4300 सौ हो गया है।
ये हैं रेरा की मुख्य शर्तें
रक्षा मंत्रालय के त्रिशूूल एयरबेस से बीस किमी की दूरी पर किसी का नक्शा पास न होने के आदेश से शहर का विकास पूरी तरह थम गया है। रेरा ने बिल्डरों की मुसीबत और बढ़ा दी है। अब बीडीए से एप्रूवल के बाद रेरा में पंजीकरण करना होगा। पांच साल तक आवंटियों के घरों का मेंटीनेंस करना होगा। आवंटी जिस स्थान पर मकान लेने के लिए पैसा जमा करेंगे, उसका 70 फीसदी हिस्सा उसी प्रोजेक्ट में खर्च करना होगा। बरेली के सात बिल्डरों ने रेरा में पंजीकरण के लिए आवेदन किया है। यह बिल्डर वे हैं, जिनके प्रोजेक्ट चल रहे है।
मिट्टी और रेत-बजरी के लिए हाय तौबा, सिस्टम मौज में
सरकार की खनन नीति स्पष्ट न होने से मिट्टी, रेता और बजरी के लिए हाय-तौबा मची हुई है, लेकिन सिस्टम इसका खूब फायदा उठा रहा है। किसानों के नाम से खनन के लिए दस ट्राली मिट्टी की परमीशन लेने के बाद अधिकारियों और पुलिस से साठगांठ करके धड़ल्ले से कारोबार हो रहा है। सैकड़ों ट्राली मिट्टी बेचने के बाद भी दस ट्राली पूरी नहीं होती हैं। एसडीएम की परमीशन की आड़ में दिन भर माफिया के ट्रैक्टर चल रहे हैं। पुलिस को भी इसके लिए मोटी रकम मिलती है। नेेताओं की मदद से खनन का धंधा खूब फल फूल रहा है। सिफारिश के साथ नेताओं के लोग भी मिट्टी और बालू ब्लैक करने के काले कारोबार में माफियाओं के साथ रहकर मोटी कमाई कर रहे हैं।
फोटो--
देश में मकान सस्ता होने का सपना देखना बेकार है। नोटबंदी के बाद जीएसटी ने बिल्डिंग मैटेरियल को और मंहगा कर दिया है। रेरा की वजह से भी घर और अधिक मंहगे होंगे। बिल्डर ही नहीं रहेंगे तो मकान कम बनेंगे। इससे मकान सस्ता होने की बजाए मंहगा ही होना है। किसी भी भवन का पांच साल तक मेंटीनेंस करना मुश्किल है। - सुनील गुप्ता, सचिव, क्रेडाई, बरेली
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मंदी और महंगाई के इस दौर में घर बनाकर बेचना बेहद मुश्किल है। रेता, बजरी, सरिया, सीमेंट घर बनाने का हर सामान मंहगा है। रियल स्टेट की मंदी से कई कारोबारों पर असर पड़ा है। हम ऐसी स्थिति में भी लोगों को घर बनाकर देंगे। शहर के कोहाड़ापीर इलाके में हमें अगली दिवाली पर 58 लोगों को घर बनाकर देना है। -भावेश अग्रवाल, एमडी, नंदी हाइट्स
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मंहगाई और भ्रष्टाचार के बीच हम नैनीताल रोड पर पार्क रेजीडेंसी एवेन्यू कालोनी में 250 मकान बनाए हैं। रेता, बजरी और सीमेंट के दामों में जीएसटी के बाद और वृद्धि हुई है। बीडीए की कागजी कार्रवाई के दौरान तमाम मुश्किलों से गुजरना पड़ा है। इसके बावजूद हम दीवाली से पहले इनमें से 100 मकानों पर कब्जा देने जा रहे हैं। नवरात्र से लोगों का सपना पूरा होना शुरू हो जाएगा। -धर्मेंद्र कुमार गुप्ता, डेवलपर्स
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मंदी की वजह से रियल स्टेट से जुड़े कई ट्रेडों का अभी भी बुरा हाल है। अगले महीने नदी खुलेगी तो रेता-बजरी के रेटों में कमी आने की संभावना है। सैकड़ों ट्रक की इसके बाद डिमांड निकलेगी। मिट्टी मिलना मुश्किल हो रहा है। खनन की नीति पर भी सरकार के विकास की रफ्तार बढ़ाने के लिए दोबारा विचार करना होगा। - रंजीत सिंह बग्गा, रेता-बजरी, कारोबारी
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नोटबंदी के बाद जीएसटी ने मंहगाई और बढ़ा दी है। रेता-बजरी ही नहीं बिल्डिंग मैटेरियल का सारा सामान और ज्यादा मंहगा हो गया है। ऐसे में बिल्डरों का तो बुरा हाल है ही। आम आदमी को घर बनाना मुश्किल है। यही वजह है कि इस बार नवरात्रों पर आधा काम भी नहीं है। तमाम लोगों को इस दीवाली पर घर नहीं मिल पाना मुश्कि ल हैं। - इंद्रजीत सिंह, कान्ट्रैक्टर