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लिवर ट्रांसप्लांट कराना हुआ सस्ता, जरूरत जागरूक होने की 

Sun, 18 Feb 2018 02:03 AM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,बरेली
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,बरेली Updated Sun, 18 Feb 2018 02:03 AM IST
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lever transplant becomes cheaper
Kidney
किडनी और लिवर खराब होने को आमतौर पर लाइलाज मान लिया जाता है, क्योंकि ट्रांसप्लांट बहुत ही महंगा हैं, लेकिन नई तकनीक से स्थितियां बदल रही हैं। दस साल पहले एक करोड़ में होने वाला लिवर ट्रांसप्लांट अब बीस लाख रुपये में हो जाता है। किडनी ट्रांसप्लांट में अब डोनर और मरीज का ब्लड ग्रुप अलग होने पर भी ट्रांसप्लांट संभव हो गया है। यह जानकारी अपोलो अस्पताल दिल्ली से आए तीन विशेषज्ञाें ने दी। शनिवार को आईएमए की ओर से एक होटल में आयोजित सीएमई (सतत चिकित्सा शिक्षा) में शहर के डॉक्टरों को ट्रांसप्लांट के बारे में बताया गया। इस अवसर पर आईएमए के सचिव डॉ. विमल भारद्वाज, साइंटिफिक चेयरमैन डॉ. सुदीप सरन और डॉ. भारती सरन मौजूद रहीं। 
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ब्रेन डेथ डोनर मिले तो बचेंगे 50 हजार मरीज 
बरेली। भारत में अंगदान के प्रति जागरूकता बहुत कम है, इसका असर ट्रांसप्लांट के लिए डोनर के इंतजार में कठिनाई से जीवन बिता रहे करीब पांच लाख मरीज कर रहे हैं। इस अनुपात में सिर्फ 1100 ट्रांसप्लांट ही भारत में हो रहे हैं। इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के लीवर ट्रांसप्लांट एवं गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के विशेषज्ञ डॉ. हितेंद्र गर्ग कहते हैं कि भारत में हादसों से होने वाली मौत की संख्या बहुत ज्यादा है। हादसे में ब्रेन डेथ की स्थिति वाले दानदाता की किडनी ट्रांसप्लांट के लिए उपयोगी है।  
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अब असमान ब्लड ग्रुप के दाता भी दे सकते हैं किडनी 
बरेली। यूं तो भारत में किडनी ट्रांसप्लांट वर्ष 1977 से हो रहे हैं पर एक समान ब्लड ग्रुप न होने के कारण मरीज के दानदाता सगे-संबंधी की किडनी नहीं ली जाती थी। नेफ्रोलॉजी के विशेषज्ञ डॉ. संजीव जसूजा ने बताया कि अब और विकसित विधि के जरिए असमान ब्लड ग्रुप के डोनर की किडनी भी ट्रांसप्लांट हो रही है, इसका नाम ए-बी-ओ इंकम्पेटिबल ट्रांसप्लांट है। ट्रांसप्लांट के बाद औसतन किडनी दस से 15 वर्ष तक काम करती है। डॉ. संजीव कहते हैं कि दोबारा ट्रांसप्लांट की चुनौतियां अब नई विधि के जरिए नियंत्रित की जा रही हैं। री-ट्रांसप्लांटेशन का खर्च बीस प्रतिशत अधिक है। 
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सूजन को पहचाने, यह हड्डी से जुड़ा रोग नहीं 
धमनियों से जुड़ी बीमारियां आमतौर पर लोग पहचान नहीं पाते। पैरों से लेकर शरीर तक में सूजन, दर्द की स्थिति में लोग हड्डी के डॉक्टर के पास पहुंच जाते हैं।  शहर में चिकित्सा विज्ञान की इस शाखा का कोई विशेषज्ञ नहीं है। वेस्कुलर सर्जन डॉ. जयसोम चोपड़ा कहते हैं कि जागरूकता की कमी के कारण आमतौर पर मरीज हड्डी के डॉक्टर के पास चला जाता है। यह असल में नसों के गुच्छे बनने की स्थिति है, धमनी विशेषज्ञ अल्ट्रासाउंड के बाद रेडियो फ्रीक्वेंसी के इस्तेमाल से इसका इलाज करते हैं। यह विशेषज्ञ हर माह के पहले शनिवार को बरेली आकर सेवा दे रहे हैं। 
 
ट्रांसप्लांट के नाम पर अंग तस्करी संभव नहीं 
विशेषज्ञ कहते हैं कि ट्रांसप्लांट के नाम पर अंग तस्करी संभव नहीं है। डॉ. हितेंद्र बताते हैं कि ट्रांसप्लांट के समय थियेटर में एक साथ दो ऑपरेशन चलते हैं। इनमें दाता से किडनी या लिवर लेकर चिकित्सा विधि से ट्रांसप्लांट किया जाता है। लिवर या किडनी बहुत कम अवधि में दाता के शरीर से मरीज के शरीर में ट्रांसप्लांट की जाती है, इसलिए अंग तस्करी संभव नहीं है। आईएमए के सचिव डॉ. विमल भारद्वाज ने कहा कि हम चाहते हैं कि लोग इस डर से निकलें ताकि दाताओं की समस्या भारत से खत्म हो। 


इन चुनौतियों से निपटना है जरूरी 
- दर्द निवारक दवाओं का बिना डॉक्टरी सलाह के इस्तेमाल करने से किडनी खराब हो रही है। अपोलो अस्पताल के आसपास के क्षेत्र में संस्थान की ओर से कराए गए सर्वे के परिणाम के मुताबिक, तीन प्रतिशत लोगों की पेन किलर दवाओं से किडनी खराब हुई है। 
- टीबी का इलाज करा रहे मरीजों को सतर्क रहने की आवश्यकता है। इसमें चलाई जाने वाली दवाओं का प्रभाव लिवर पर पड़ रहा है। गंभीर बात यह है कि इस प्रभाव को मापने के लिए हर सप्ताह जरूरी लिवर फंक्शन टेस्ट किए ही नहीं जा रहे हैं। 
- भारतीयों के शरीर के हिसाब से शराब की कितनी मात्रा को सुरक्षित माना जाए, इसका कोई आंकड़ा ही नहीं है। इससे शराब की नियंत्रित मात्रा को लेकर कोई दिशा-निर्देश नहीं है। इसके सेवन से लिवर खराब होने के भारत में सबसे अधिक केस हैं। विदेशों में शराब की मात्रा पुरुषों के लिए साठ मिलीलीटर और महिलाओं के लिए बीस मिलीलीटर है।  

- अगर आप शराब नहीं पीते हैं, लेकिन समय पर भोजन करने की आदत नहीं है तो भी सतर्क हो जाएं। ये कारक न सिर्फ लिवर प्रभावित कर रहे हैं बल्कि उसे पूरी तरह डैमेज भी कर रहे हैं।  
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