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Bareilly News: काैड़ियों के भाव गई जमीन, कानूनी लड़ाई में अटका मुआवजा
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बरेली । बरेली विकास प्राधिकरण (बीडीए) ने 20-21 साल पहले जिन किसानों की जमीन ली, वह उचित मुआवजा पाने के लिए आज भी कोर्ट-कचहरी में धक्के खा रहे हैं। कई लोगों की तो पूरी खेती-किसानी बीडीए की आवासीय योजना में ही समा गई। उनकी दुकानों को भी जमींदोज कर दिया गया। आज वह भूमिहीन हो गए हैं। कोई टैक्सी चलाकर जीवन बिता रहा है तो कोई मजदूरी कर रहा है।
अधिवक्ता अश्वनी कुमार राना ने बताया कि ओमप्रकाश, रामप्रकाश और गुलशन देवी ने चंद्रपुर बिचपुरी में स्थित गाटा-902 व 748 की जमीन के मुआवजे के लिए बीडीए से लंबी न्यायिक लड़ाई लड़ी है।
इस मामले में लारा कोर्ट के न्यायाधीश ब्रजेंद्र कुमार त्यागी ने 25 जनवरी 2025 को फैसला दिया था। इसके विरुद्ध बीडीए ने हाईकोर्ट की शरण ली थी। वहां से बीडीए को कोई राहत नहीं मिली। कुल धनराशि का 50 प्रतिशत तत्काल किसानों को भुगतान करने का आदेश हुआ था। बीडीए ने इस पर अमल नहीं किया तो किसानों ने 10 जून को दोबारा बीडीए के विरुद्ध केस कर दिया है। चंद्रपुर बिचपुरी के ही महेंद्र प्रताप व उनके भाई देवेंद्र सिंह के मामले में भी लारा कोर्ट ने नौ अगस्त 2024 को बीडीए के विरुद्ध फैसला दिया था। इन दोनों भाइयों की कुल 83.44 बीघा जमीन बीडीए ने ली थी।
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इनके मामले में भी हुए फैसले को बीडीए ने अभी तक स्वीकार नहीं किया है, जबकि पीड़ित किसान मुआवजे के लिए दर-बदर भटकने के लिए मजबूर हैं। संवाद
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अधिवक्ता अश्वनी कुमार राना ने बताया कि ओमप्रकाश, रामप्रकाश और गुलशन देवी ने चंद्रपुर बिचपुरी में स्थित गाटा-902 व 748 की जमीन के मुआवजे के लिए बीडीए से लंबी न्यायिक लड़ाई लड़ी है।
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इस मामले में लारा कोर्ट के न्यायाधीश ब्रजेंद्र कुमार त्यागी ने 25 जनवरी 2025 को फैसला दिया था। इसके विरुद्ध बीडीए ने हाईकोर्ट की शरण ली थी। वहां से बीडीए को कोई राहत नहीं मिली। कुल धनराशि का 50 प्रतिशत तत्काल किसानों को भुगतान करने का आदेश हुआ था। बीडीए ने इस पर अमल नहीं किया तो किसानों ने 10 जून को दोबारा बीडीए के विरुद्ध केस कर दिया है। चंद्रपुर बिचपुरी के ही महेंद्र प्रताप व उनके भाई देवेंद्र सिंह के मामले में भी लारा कोर्ट ने नौ अगस्त 2024 को बीडीए के विरुद्ध फैसला दिया था। इन दोनों भाइयों की कुल 83.44 बीघा जमीन बीडीए ने ली थी।
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इनके मामले में भी हुए फैसले को बीडीए ने अभी तक स्वीकार नहीं किया है, जबकि पीड़ित किसान मुआवजे के लिए दर-बदर भटकने के लिए मजबूर हैं। संवाद