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टीहरखेड़ा टीले की खुदाई का लाइसेंस निरस्त इतिहासकार बैठे रहे और निकल गई उत्खनन की समय सीमा
बरेली
Updated Fri, 02 Jan 2015 09:53 PM IST
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इतिहास की खोज पर इतिहासकारों की लापरवाही भारी पड़ गई है। महाभारत काल के अवशेष समेटे टीहरखेड़ा किले के उत्खनन के लिए प्रदेश सरकार की एनओसी के बाद अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई के लाइसेंस की अवधि भी समाप्त हो गई। ऐसा दूसरी बार हुआ है जब टीले का लाइसेंस समय अवधि निकल जाने के बाद रद्द हुआ है। 2012 में भी लाइसेंस फिर से लेना पड़ा था।
राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित फतेहगंज पश्चिमी कस्बे से लगभग छह किलोमीटर दूर स्थित टीहरखेड़ा गांव के प्राचीन टीले के उत्खनन के लिए एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति विभाग के प्रोजेक्ट पर प्रदेश सरकार ने 31 अक्तूबर 2014 तक के लिए एनओसी जारी की थी। एएसआई ने 31 दिसंबर 2014 तक खुदाई शुरू करने को लाइसेंस दे दिया था लेकिन एनओसी की अवधि बीत गई पर विभाग के इतिहासकारों ने उत्खनन शुरू नहीं किया।
अगर दिसंबर में भी टीले पर काम शुरू हो जाता तो प्रदेश सरकार से एनओसी की अवधि बढ़ने की उम्मीद होती। विभाग के प्रभारी डॉ. अभय कुमार सिंह ने टीले के प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. श्यामबिहारी लाल को सौंपी थी। उन्हें ही टीले का उत्खनन कराना था लेकिन किसी ने भी एक बार भी वहां जाने की जरूरत नहीं समझी गई।
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इनसेट
टीले का महत्व
इतिहासकार टीहरखेड़ा गांव में दुजेरा नदी किनारे स्थित 30 हजार वर्ग मीटर दायरे में फैले 30 से 40 फिट ऊंचे इस टीले को पांच हजार साल पुराना मान रहे हैं। इसमें मिट्टी के बर्तन और काल भैरव की प्राचीन प्रतिमाएं मिल चुकी हैं। इन्हें महाभारत काल की होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इतिहासकारों का कहना है कि यह टीला प्राचीन संस्कृति का रहस्य सामने ला सकता है। उत्खनन पर लगभग 10 लाख रुपये के खर्च का अनुमान है।
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कोट
टीले का उत्खनन क्यों नहीं हो पाया, यह प्रोजेक्ट प्रभारी डॉ. श्याम बिहारी लाल ही बता सकते हैं। रही बात लाइसेंस और एनओसी रद्द होने की तो अब उसका रिन्यूवल कराना होगा।
-डॉ. अभय कुमार सिंह, विभागाध्यक्ष- प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति विभाग
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विभाग में और प्रोजेक्ट पर काम हो रहा था, जिसकी वजह से टीहरखेड़ा का उत्खनन नहीं हो सका। अब लाइसेंस रिन्यूवल कराकर जल्द ही उत्खनन शुरू करेंगे। इसी महीने टीले का सर्वे करेंगे।
-डॉ. श्याम बिहारी लाल, प्रोजेक्ट प्रभारी
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राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित फतेहगंज पश्चिमी कस्बे से लगभग छह किलोमीटर दूर स्थित टीहरखेड़ा गांव के प्राचीन टीले के उत्खनन के लिए एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति विभाग के प्रोजेक्ट पर प्रदेश सरकार ने 31 अक्तूबर 2014 तक के लिए एनओसी जारी की थी। एएसआई ने 31 दिसंबर 2014 तक खुदाई शुरू करने को लाइसेंस दे दिया था लेकिन एनओसी की अवधि बीत गई पर विभाग के इतिहासकारों ने उत्खनन शुरू नहीं किया।
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अगर दिसंबर में भी टीले पर काम शुरू हो जाता तो प्रदेश सरकार से एनओसी की अवधि बढ़ने की उम्मीद होती। विभाग के प्रभारी डॉ. अभय कुमार सिंह ने टीले के प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. श्यामबिहारी लाल को सौंपी थी। उन्हें ही टीले का उत्खनन कराना था लेकिन किसी ने भी एक बार भी वहां जाने की जरूरत नहीं समझी गई।
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टीले का महत्व
इतिहासकार टीहरखेड़ा गांव में दुजेरा नदी किनारे स्थित 30 हजार वर्ग मीटर दायरे में फैले 30 से 40 फिट ऊंचे इस टीले को पांच हजार साल पुराना मान रहे हैं। इसमें मिट्टी के बर्तन और काल भैरव की प्राचीन प्रतिमाएं मिल चुकी हैं। इन्हें महाभारत काल की होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इतिहासकारों का कहना है कि यह टीला प्राचीन संस्कृति का रहस्य सामने ला सकता है। उत्खनन पर लगभग 10 लाख रुपये के खर्च का अनुमान है।
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कोट
टीले का उत्खनन क्यों नहीं हो पाया, यह प्रोजेक्ट प्रभारी डॉ. श्याम बिहारी लाल ही बता सकते हैं। रही बात लाइसेंस और एनओसी रद्द होने की तो अब उसका रिन्यूवल कराना होगा।
-डॉ. अभय कुमार सिंह, विभागाध्यक्ष- प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति विभाग
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विभाग में और प्रोजेक्ट पर काम हो रहा था, जिसकी वजह से टीहरखेड़ा का उत्खनन नहीं हो सका। अब लाइसेंस रिन्यूवल कराकर जल्द ही उत्खनन शुरू करेंगे। इसी महीने टीले का सर्वे करेंगे।
-डॉ. श्याम बिहारी लाल, प्रोजेक्ट प्रभारी