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...बज्मे नाज में जाना गजब हुआ
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बरेली। खानकाह नियाजिया में बीती रात भोर के तीन बजे महफिल-ए-गजल का आयोजन हुआ। शास्त्रीय संगीत पर आधारित इस महफिल में सहसवान घराने के मशहूर गजल गायक सखावत हुसैन ने सूफियाना कलाम पेश कर समा बांध दिया। सुनने वाले भी सुबह के साढ़े चार बजे तक महफिल का लुत्फ लेते रहे।
खानकाह में पिछले तीन दिनों से सिराजुस्सालेकीन हजरत सूफी शाह मुहीउद्दीन अहमद किबला का उर्स चल रहा था। सोमवार रात दो बजे बड़े कुल शरीफ की रस्म अदा की गई। खानकाही तबर्रुक की खास चाय और पान तकसीम किए जाने की रिवायत के बाद शास्त्रीय संगीत की महफिल सजाई गई। साज और आवाज की जुगलबंदी सुनने को बेताब संगीत के दीवाने बड़ी संख्या में मौजूद थे। इसी बीच साहिबे सज्जादा शाह हसनी मियां, नायब सज्जादा अल्हाज शाह मेंहदी मियां और मोहतमिम शब्बू मियां नियाजी सहित तमाम खानवादे समा खाने में मौजूद थे।
इसी बीच सखावत हुसैन ने साज की धुन के बीच अपनी दिलकश आवाज का आलाप बिखेरा और खानकाह के बुजुर्ग हजरत नसीर मियां उर्फ बाबा साहब की सूफियाना गजल से महफिल की शुरुआत की। जिसके बोल थे- पहले तो बज्मे नाज में जाना गजब हुआ, फिर उसके बाद लौट के आना गजब हुआ। सुनाकर खूब वाहवाही लूटी। दूसरे सूफी बुजुर्ग हजरत अजीज मियां किबला की गजल- सरे मयकदा बादाख्वारी में गुजरी, पसे मयकदा शर्मसारी में गुजरी... सुनाकर लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। यह सिलसिला सुबह की आजान पर जाकर रुका।
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खानकाह में पिछले तीन दिनों से सिराजुस्सालेकीन हजरत सूफी शाह मुहीउद्दीन अहमद किबला का उर्स चल रहा था। सोमवार रात दो बजे बड़े कुल शरीफ की रस्म अदा की गई। खानकाही तबर्रुक की खास चाय और पान तकसीम किए जाने की रिवायत के बाद शास्त्रीय संगीत की महफिल सजाई गई। साज और आवाज की जुगलबंदी सुनने को बेताब संगीत के दीवाने बड़ी संख्या में मौजूद थे। इसी बीच साहिबे सज्जादा शाह हसनी मियां, नायब सज्जादा अल्हाज शाह मेंहदी मियां और मोहतमिम शब्बू मियां नियाजी सहित तमाम खानवादे समा खाने में मौजूद थे।
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इसी बीच सखावत हुसैन ने साज की धुन के बीच अपनी दिलकश आवाज का आलाप बिखेरा और खानकाह के बुजुर्ग हजरत नसीर मियां उर्फ बाबा साहब की सूफियाना गजल से महफिल की शुरुआत की। जिसके बोल थे- पहले तो बज्मे नाज में जाना गजब हुआ, फिर उसके बाद लौट के आना गजब हुआ। सुनाकर खूब वाहवाही लूटी। दूसरे सूफी बुजुर्ग हजरत अजीज मियां किबला की गजल- सरे मयकदा बादाख्वारी में गुजरी, पसे मयकदा शर्मसारी में गुजरी... सुनाकर लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। यह सिलसिला सुबह की आजान पर जाकर रुका।
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