कारसेवा के साक्षी: मेरे सामने ही पुलिस की लाठी से घायल हुए थे सिंघल, बरेली के राकेश कुमार ने बताई आंखों देखी
बरेली के कारसेवक राकेश कुमार ने बताया कि 30 अक्तूबर 1990 को वह कारसेवा के लिए अयोध्या में मौजूद थे। उस दिन सुबह अयोध्या डर, आशंका और अनिश्चितता की गिरफ्त में थी। सड़कों पर अर्द्धसैनिक बलों का पहरा था।
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विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन कार्यकारी अध्यक्ष अशोक सिंघल मेरे सामने ही घायल हुए थे। कारसेवकों के साथ मैं हनुमानगढ़ी के पास बैठा था, तभी वहां से उनका काफिला गुजरा तो पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया। आंसूगैस के गोले भी छोड़े। सिर में लाठी लगने से अशोक सिंघल घायल हो गए पर कारसेवकों का जुनून कम न हुआ। पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़कर जत्था श्रीराम जन्मभूमि की ओर अग्रसर हुआ था। बरेली के अलीगंज गांव के 60 वर्षीय राकेश कुमार ने ये बातें बताईं।
उन्होंने कहा कि 30 अक्तूबर 1990 को वह कारसेवा के लिए अयोध्या में मौजूद थे। उस दिन सुबह अयोध्या डर, आशंका और अनिश्चितता की गिरफ्त में थी। सड़कों पर अर्द्धसैनिक बलों का पहरा था। पिछले चार दिनों से अयोध्या में कर्फ्यू लगा था। जन्मभूमि के दर्शन पर रोक नहीं थी, पर वहां किसी को जाने भी नहीं दिया जा रहा था।
सुबह से ही कारसेवकों ने चारों ओर से दबाव बनाकर श्रीराम जन्मभूमि परिसर की ओर बढ़ना शुरू कर दिया था। हनुमानगढ़ी चौराहे पर मौजूद फोर्स ने उनको खदेड़ दिया। कुछ कारसेवक गिरफ्तार भी हुए थे। इसके बाद हम लोग हनुमानगढ़ी के सामने आकर बैठ गए थे। हमारे जत्थे का नेतृत्व आंध्र प्रदेश के विधायक के. नरेंद्र कर रहे थे। कुछ ही देर में अशोक सिंघल के नेतृत्व में दूसरा जत्था वहां पहुंचा तो पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। अशोक सिंघल सहित कई कारसेवक घायल हो गए थे।
प्रशासन की चेतावनी को दरकिनार कर आगे बढ़ते रहे
प्रशासन लाउडस्पीकर से गोली चलाने की चेतावनी दे रहा था मगर हम पीछे नहीं हटे। लाठीचार्ज और चौकसी के बावजूद दोपहर 12 बजे काफी संख्या में कारसेवक नारेबाजी करते हुए विवादित परिसर में घुसने में कामयाब हो गए। गुंबद पर झंडा लगाया गया। शाम तक वहां झड़पें होती रहीं। कई कारसेवक घायल हुए। प्रशासन की बर्बर कार्रवाई के बाद भी हम कारसेवा करने के अपने मकसद में कामयाब हुए। दो नवंबर की कारसेवा के लिए हम लोग अयोध्या में रहकर ही रणनीति बनाते रहे। स्थानीय ग्रामीणों का भी सहयोग मिल रहा था। कई साथी कटरी के गांव में छिपकर रहे। उनके खाने पीने का इंतजाम स्थानीय लोगों ने किया था।
वर्दी में भी मिल गए थे सहयोगी
राकेश कुमार ने बताया कि 30 अक्तूबर और दो नवंबर 1990 को अयोध्या में प्रशासन की बर्बर कार्रवाई के बीच वर्दीधारी कई लोगों का सहयोग भी कारसेवकों को मिला था। कई पुलिस वाले लाठी चलाने से गुरेज कर रहे थे। कई जगह साथी कारसेवकों के पैर छूने पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान पीछे हट गए थे। कुछ मोर्चों पर हमने उन्हें खदेड़कर आगे बढ़ने का रास्ता बनाया।