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जीते जी न अपनों की हो पाई न अपने वतन की
बरेली।
Updated Wed, 27 Sep 2017 02:12 AM IST
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जमरद
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पाकिस्तान में जाकर निकाह किया लेकिन पति ने जमरद बेगम को छह महीने बाद ही तलाक देकर मुफलिसी में जीने के लिए छोड़ दिया। किसी तरह पाक से पासपोर्ट बनवाकर जमरद बरेली आकर रहने लगीं। वालिद ने उनका दूसरा निकाह करके घर भी बसा दिया, लेकिन दूसरे शौहर को पता चला तो उसने भी उनका दर्द ठीक से नहीं समझा। हालांकि मरते दम तक वह साथ निभाता रहा। पाकिस्तान की नागरिक बनने के बाद अपनों के बीच पराई हुई जमरद अपने ही वतन के सिस्टम से दोबारा अपनाने को लड़ती रहीं, लेकिन उनकी हिंदुस्तानी होने की तमन्ना पूरी नहीं हो सकी। वह हिंदुस्तान में सुपुर्द-ए-खाक भी हुईं तो बतौर पाकिस्तानी नागरिक ही।
यह दर्द भरी कहानी बजरिया संदल खां के सिफातुल्ला खां की बेटी 56 वर्षीय जमरद बेगम की है। जमरद की खाला (मौसी) आयशा पाकिस्तान के करांची शहर की कलीरा कॉलोनी में रहती थीं। जमरद यहां से 1982 में खाला के घर चली गईं थीं। आयशा ने उनका अपने बेटे सलीम से निकाह करा दिया। छह महीने वह सलीम की दुल्हन बनकर पाकिस्तान में रहीं। इस बीच दोनों में विवाद हो गया तो सलीम ने जमरद को तलाक देकर खुद को उनसे अलग कर लिया। यह बात जब जमरद के वालिद को पता लगी तो वह अपनी साली रईसा बेगम को साथ लेकर पाकिस्तान गए। उन्होेंने सलीम से जमरद का भारत से बना पासपोर्ट मांगा लेकिन उसने नहीं दिया। इस पर वालिद जमरद को पाकिस्तान के पासपोर्ट पर हिंदुस्तान ले आए। इसके बाद से ही जमरद अपने ही मुल्क में पराई हो गई। पिता ने किसी तरह जमरद को समझाकर उनका यहां सलीम नाम के ही व्यक्ति से दूसरा निकाह कर दिया। सलीम इन दिनों बाकरगंज सराय में रहते हैं। सलीम को निकाह के बाद मालूम हुआ कि उनकी पत्नी पाकिस्तानी है तो उन्होंने भी जमरद को परेशान किया, लेकिन जमरद के व्यवहार के आगे वह हार गए। सलीम ने जमरद की नागरिकता के लिए लड़ाई भी लड़ी। दिल्ली में मंत्रियोें के यहां भी गुहार लगाई, लेकिन 30 साल बाद भी जमरद को भारत की नागरिकता नहीं मिल पाई। हिंदुस्तानी होने का सपना लिए ही जमरद ने मंगलवार सुबह 11 बजे दम तोड़ दिया।
भरा पूरा परिवार छोड़ गई
जमरद का बड़ा बेटा तसलीम 22 साल का है। उससे छोटा फहीम भी बीस साल की उम्र पार कर चुका है। 19, 15 और 14 साल की तीन बेटियां हैं। मां की मौत से सभी सदमे में हैं। बच्चों का कहना है कि खुदा हमारी मां की तरह मुसीबत किसी को मत देना। वह पाकिस्तान से लौटने के बाद की बातें उन्हें बताती थीं। कहती थीं- अच्छे लोग नहीं हैं वहां।
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जमरद के लिए मैंने भीख भी मांगी
सलीम का कहना है कि मैंने जमरद के पाकिस्तानी होने का पता लगने के बाद कभी-कभार गुस्सा भले ही किया है, लेकिन उसका साथ नहीं छोड़ा। दिल्ली में उसकी नागरिकता के लिए हम गए तो वहां जेब कट गई। दिल्ली से लौटने के लिए मुझे भीख मांगनी पड़ी। उसकी नागरिकता के लिए बहुत पैसा खर्च हुआ, लेकिन फिर भी उसका सपना पूरा नहीं कर पाया।
मिलने ही वाली थी नागरिकता
जमरद की मौत की सूचना मिलने पर खुफिया विभाग की टीम उनके घर पहुंची। सीओ एलआईयू यशवीर सिंह ने बताया कि जल्द ही जमरद को नागरिकता मिलने वाली थी। सारे कागजात पूरे हो गए थे। हमने पासपोर्ट जमा करने के लिए जमरद को नोटिस भी जारी कर दिया था, लेकिन वह पाकिस्तान और हिंदुस्तान के दूतावास में समय से पैसा जमा नहीं कर पाईं, इसलिए नागरिकता मिलने देरी हुई।
यह दर्द भरी कहानी बजरिया संदल खां के सिफातुल्ला खां की बेटी 56 वर्षीय जमरद बेगम की है। जमरद की खाला (मौसी) आयशा पाकिस्तान के करांची शहर की कलीरा कॉलोनी में रहती थीं। जमरद यहां से 1982 में खाला के घर चली गईं थीं। आयशा ने उनका अपने बेटे सलीम से निकाह करा दिया। छह महीने वह सलीम की दुल्हन बनकर पाकिस्तान में रहीं। इस बीच दोनों में विवाद हो गया तो सलीम ने जमरद को तलाक देकर खुद को उनसे अलग कर लिया। यह बात जब जमरद के वालिद को पता लगी तो वह अपनी साली रईसा बेगम को साथ लेकर पाकिस्तान गए। उन्होेंने सलीम से जमरद का भारत से बना पासपोर्ट मांगा लेकिन उसने नहीं दिया। इस पर वालिद जमरद को पाकिस्तान के पासपोर्ट पर हिंदुस्तान ले आए। इसके बाद से ही जमरद अपने ही मुल्क में पराई हो गई। पिता ने किसी तरह जमरद को समझाकर उनका यहां सलीम नाम के ही व्यक्ति से दूसरा निकाह कर दिया। सलीम इन दिनों बाकरगंज सराय में रहते हैं। सलीम को निकाह के बाद मालूम हुआ कि उनकी पत्नी पाकिस्तानी है तो उन्होंने भी जमरद को परेशान किया, लेकिन जमरद के व्यवहार के आगे वह हार गए। सलीम ने जमरद की नागरिकता के लिए लड़ाई भी लड़ी। दिल्ली में मंत्रियोें के यहां भी गुहार लगाई, लेकिन 30 साल बाद भी जमरद को भारत की नागरिकता नहीं मिल पाई। हिंदुस्तानी होने का सपना लिए ही जमरद ने मंगलवार सुबह 11 बजे दम तोड़ दिया।
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भरा पूरा परिवार छोड़ गई
जमरद का बड़ा बेटा तसलीम 22 साल का है। उससे छोटा फहीम भी बीस साल की उम्र पार कर चुका है। 19, 15 और 14 साल की तीन बेटियां हैं। मां की मौत से सभी सदमे में हैं। बच्चों का कहना है कि खुदा हमारी मां की तरह मुसीबत किसी को मत देना। वह पाकिस्तान से लौटने के बाद की बातें उन्हें बताती थीं। कहती थीं- अच्छे लोग नहीं हैं वहां।
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जमरद के लिए मैंने भीख भी मांगी
सलीम का कहना है कि मैंने जमरद के पाकिस्तानी होने का पता लगने के बाद कभी-कभार गुस्सा भले ही किया है, लेकिन उसका साथ नहीं छोड़ा। दिल्ली में उसकी नागरिकता के लिए हम गए तो वहां जेब कट गई। दिल्ली से लौटने के लिए मुझे भीख मांगनी पड़ी। उसकी नागरिकता के लिए बहुत पैसा खर्च हुआ, लेकिन फिर भी उसका सपना पूरा नहीं कर पाया।
मिलने ही वाली थी नागरिकता
जमरद की मौत की सूचना मिलने पर खुफिया विभाग की टीम उनके घर पहुंची। सीओ एलआईयू यशवीर सिंह ने बताया कि जल्द ही जमरद को नागरिकता मिलने वाली थी। सारे कागजात पूरे हो गए थे। हमने पासपोर्ट जमा करने के लिए जमरद को नोटिस भी जारी कर दिया था, लेकिन वह पाकिस्तान और हिंदुस्तान के दूतावास में समय से पैसा जमा नहीं कर पाईं, इसलिए नागरिकता मिलने देरी हुई।