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हिंदी हैं हमः फीकी पड़ेगी अंग्रेजी की चमक, बशर्ते हिंदी बोलने में न हो संकोच

Mon, 30 Aug 2021 12:54 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Mon, 30 Aug 2021 12:54 AM IST
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Hindi Hai Hum: The brightness of English will fade, provided there is no hesitation in speaking Hindi
हिंदी हैं हम - फोटो : Amar Ujala

शिक्षकों के मुताबिक, हिंदी के विकास को शासन की ओर से किए जा रहे हैं सार्थक प्रयास

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बरेली। ‘केंद्र और प्रदेश सरकार लगातार हिंदी के विकास और विस्तार के लिए प्रयास कर रही है। इसी का प्रभाव है कि अब सरकारी कामकाज की भाषा अंग्रेजी के बजाय हिंदी बन रही है। आदेश, निर्देेश आदि सब हिंदी में ही जारी हो रहे हैं। बस समाज के जागरूक होने की देर है।’ यह कहना है शिक्षकों का। उन्होंने लोगों से हिंदी बोलने में आड़े आ रहे संकोच को दूर करने सुझाव दिया है, ताकि हिंदी की पताका फहरा सके।
शहर के प्रमुख शिक्षकों का व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि छात्र अगर हिंदी में अपनी भावनाएं व्यक्त करें या सवालों के जवाब दें तो उन्हें कम नंबर मिलते हैं। उन्हीं सवालों के जवाब अंग्रेजी में लिखे जाएं तो ज्यादा अंक मिलते हैं। ठीक इसी तर्ज पर साक्षात्कार के दौरान हिंदी बोलने वाले पिछड़ते हैं और अंग्रेजी बोलकर लोग अच्छे अंक अर्जित कर लेते हैं। ज्यादातर मामलों में परीक्षक या साक्षात्कारकर्ता हिंदी भाषियों के साथ न्याय नहीं करते। इसी का परिणाम है कि अभिभावक बच्चों को अंग्रेजी सीखने, बोलने के लिए प्रेरित करते हैं और यही से ही हिंदी का पतन शुरू होता है। परीक्षकों को भी मानसिकता बदलने की जरूरत है।
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हिंदी लिखने पर नहीं मिले थे ज्यादा अंक

आलमपुर जाफराबाद जूनियर हाईस्कूल पथरा की इंचार्ज प्रधानाध्यापक सारिका सक्सेना का कहना है कि अंग्रेजी बोलने वालों को ही ज्यादा काबिल माना जाता है, जबकि भाषा योग्यता का पैमाना नहीं है। यह सभी को समझना होगा। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से हिंदी को बढ़ावा देने के लिए सार्थक प्रयास हो रहे हैं। कहा, उनका खुद का अनुभव है कि जब स्नातक की परीक्षा में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया तो अच्छे अंक मिले, जबकि हिंदी में कम। इससे स्पष्ट है कि परीक्षक अंग्रेजी भाषा से प्रभावित होते हैं। बीएड के दौरान जो विषय हिंदी में थे, उनमें भी कम अंक मिले और अंग्रेजी में ज्यादा अंक आए। परीक्षकों की ओर से इस तरह का भेदभाव होने पर विद्यार्थियों के मन में हिंदी के प्रति नकारात्मकता उत्पन्न होना स्वाभाविक है। परीक्षकों को चाहिए कि भाषा से प्रतिभा का आकलन करना बंद करें, तभी हिंदी का विकास होगा।
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हिंदी में ही अच्छे से व्यक्त कर सकते हैं भावनाएं

भदपुरा प्राइमरी स्कूल बौरिया की सहायक अध्यापक राखी गंगवार का कहना है कि पहले हिंदी के प्रति परीक्षकों में नकारात्मकता होती थी पर अब इसमें बदलाव हो रहा है। प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों में भी साक्षात्कार के दौरान अगर अभ्यर्थी हिंदी भाषा में बेहतर तरीके से सवालों के जवाब दें तो उन्हें अच्छे अंक मिलते हैं, जबकि पहले ऐसा नहीं था। बच्चों को अंग्रेजी भाषा की जंजीर से बांधने की अब जरूरत नहीं है। वह मातृ भाषा में खुद को बेहतर तरीके से साबित कर सकें, इसके लिए उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब हिंदी भाषा के आगे बाजार को झुकना पड़ा है। पहले जहां उत्पादों की भाषा अंग्रेजी होती थी वहीं अब हिंदी हो गई है। कई जाने माने उत्पादों पर विवरण हिंदी में भी प्रकाशित होने लगा है। वे जानते हैं कि भारत में बिकना है तो हिंदी बोलनी ही पड़ेगी।
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